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कभी मुंबई की लोकल बस में नौकरी करते थे सुनील दत्त, 100 रुपए महीना थी तनख्वाह

गुजरे जमाने के मशहूर एक्टर सुनील दत्त की बुधवार को 90th बर्थ एनिवर्सरी है।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jun 06, 2018, 01:23 PM IST

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    बेटे संजय दत्त के साथ सुनील दत्त।

    मुंबई।गुजरे जमाने के मशहूर एक्टर सुनील दत्त की बुधवार को 90th बर्थ एनिवर्सरी है। 6 जून 1928 को उनका जन्म पंजाब प्रांत (अविभाजित भारत में) के झेलम जिले के खुर्दी गांव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। सुनील का बचपन खराब हालात में बीता। 5 साल की उम्र में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। जब वे 18 साल के थे, तो उन्हें भारत-पाकिस्तान बंटवारे की मार झेलनी पड़ी। विभाजन के दौरान भड़के दंगों में याकूब नामक एक मुस्लिम युवक ने सुनील और उनके परिवार की जान बचाई थी।

    बंटवारे के बाद सुनील अपने परिवार सहित हरियाणा के यमुना नगर स्थित मंडोली गांव में आकर बस गए। बाद में उन्होंने कुछ समय लखनऊ में भी बिताया, जहां से उन्होंने ग्रैजुएशन की डिग्री ली। सुनील ने मुंबई के जय हिंद कॉलेज से पढ़ाई की। जय हिंद कॉलेज से पढ़ाई खत्म करने के बाद कुछ समय उन्होंने मुंबई की लोकल बस सर्विस 'बेस्ट' में भी नौकरी की थी। सुनील दत्त ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था कि वो सुबह 10 बजे कॉलेज जाते थे। इसके बाद 2 बजे से रात 11 बजे तक वो मुंबई के बस डिपो में काम करते थे।


    बस डिपो में 100 रुपए महीना कमाते थे सुनील दत्त...
    सुनील दत्त के मुताबिक, बस डिपो में वो बसों का मेंटेनेंस देखते थे। किसी बस की घंटी टूटी है, तो उसका रिकॉर्ड रखना। डीजल कितना लगा उसका हिसाब रखना। यही सब करना पड़ता था। बस डिपो में काम करना सुनील दत्त की पहली नौकरी थी। यहां उन्हें महीने की 100 रुपए तनख्वाह मिलती थी।
    आगे की स्लाइड्स पर, जब डिपो की नौकरी छोड़ रेडियो अनाउंसर बन गए सुनील दत्त...
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    बाद में डिपो की नौकरी छोड़ रेडियो अनाउंसर बन गए...
    सुनील दत्त के मुताबिक, कॉलेज में एक डांस बैले था, जिसकी कमेंट्री के लिए प्रोफेसर ने मुझे कहा था। वहां कुछ विज्ञापन कंपनियों के बॉस आए हुए थे। उन्होंने मेरी आवाज सुनी, जो उन्हें बेहद पसंद आई। उस वक्त वो एक प्रोग्राम बना रहे थे और उसके लिए मुझे रख लिया। फिर मैंने बड़े-बड़े स्टार्स जैसे दिलीप कुमार, देव आनंद, सुरैया जी के इंटरव्यू किए। इसके बाद मैंने एक और प्रोग्राम शुरू किया 'फिल्मी खबरें'।
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    कैसे बने बलराज से सुनील दत्त...

    दिलीप कुमार की एक फिल्म आई थी 'शहीद'। मैं उस जमाने में दिलीप साहब का इंटरव्यू कर रहा था। मैं जब स्टूडियो गया तो मुझे कहा गया कि तुम इधर-उधर इंटरव्यू करते भागते हो, खुद क्यों हीरो नहीं बन जाते। मैंने कहा-अगर मौका मिला तो मैं बन जाऊंगा हीरो, लेकिन छोटा-मोटा रोल नहीं करना चाहता। इसके बाद मेरा टेस्ट लिया गया। इसके लिए मुझे दिलीप साहब के कपड़े पहनने को दिए गए। चूंकि मैं दिलीप साहब से लंबा था, इसलिए उनकी पैंट मेरे घुटनों तक ही आ रही थी। शर्ट के स्लीव्स भी छोटे पड़ गए। इसके बाद मैंने अपने डायलॉग बोले और चला गया। ये बात 1955 की है। उसके बाद धीरे-धीरे मुझे फिल्मों में काम मिलने लगा।

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    सुनील दत्त को कैसे मिली 'मदर इंडिया'

    बीआर चोपड़ा की एक ही रास्ता और साधना जैसी फिल्मों में मैं काम कर चुका था और ये दोनों ही हिट हो गई थीं। उस दौर में कॉमेडियन मुकरी मेरे बड़े अच्छे दोस्त थे। एक दिन मेरे पास उनका फोन आया और बोले- तुम्हें मेहबूब साहब याद कर रहे हैं। मैंने कहा उस रोल के लिए तो उन्होंने हीरो चुन लिया है। तो वो बोले- नहीं तुम मिलना उनसे। इसके बाद मैं मेहबूब साहब से मिलने गया। उन्होंने कहा- तुम्हें हम रामू का रोल देते हैं, जो बड़ा भाई है। मैंने कहा- आपका इतना बड़ा नाम है, अगर आप मुझे एक्सट्रा का भी रोल देंगे तो मैं कर लूंगा। इस पर मेहबूब साहब बेहद खुश हुए।

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    हज्जाम से बाल कटवाए और मुंह पे पोत ली कालिख...

    इंटरव्यू में सुनील दत्त ने बताया - 'फिर एक दिन वो मुझे देखकर कुछ सोच रहे थे और अचानक बोले- मुझे लगता है तुम्हें बिरजू का रोल करना चाहिए। मैंने कहा- जैसी आपकी मर्जी। वो बोले- तुम्हारे बाल बड़े हैं, जिससे तुम गांव के नहीं लगोगे। इसके बाद मैं अपने हज्जाम के पास गया और उसको टैक्सी में बिठाकर स्टूडियो ले आया। उस वक्त महबूब साहब नमाज पढ़ रहे थे। फिर उन्होंने मेरे बाल कटवाए। इसके बाद बोले तुम्हारा रंग भी गोरा है। तो मैं मेकअप रूम में गया और जितनी भी काली चीजें थीं, सबको लपेटकर मुंह पर लगा ली। इसके बाद महबूब साहब ने मुझे देखा और बोले अब तू वाकई बिरजू लग रहा है। तो मैंने कहा- फिर मुझे यही रोल दे दो।'
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