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'पापा ने काम को ही मेरे इर्द-गिर्द बुन दिया, मुझे उनसे सादगी विरासत में मिली'

मैं बचपन से दो घरों में रही। एक पिताजी गुलज़ार और दूसरा मां राखी का घर। मुझे अपने पिता की सादगी बहुत पसंद है।

Bhaskar news | Last Modified - Jun 17, 2018, 11:06 PM IST

'पापा ने काम को ही मेरे इर्द-गिर्द बुन दिया, मुझे उनसे सादगी विरासत में मिली'

मुंबई।मैं बचपन से दो घरों में रही। एक पिताजी गुलज़ार और दूसरा मां राखी का घर। मुझे अपने पिता की सादगी बहुत पसंद है। उन्होंने हमेशा मुझे आज़ादी दी, बचपन में मेरी शैतानियों के बावजूद उन्होंने मुझसे कभी ऊंची आवाज में बात नहीं की। उन्हें कविताओं और लेखन पर लगातार मिलने वाली तारीफों पर मुझे हमेशा आश्चर्य होता था। लोग मुझसे पूछते हैं कि पिता की कोई खासियत जो आप जीवनसाथी में खोजती हों, मैं कहती हूं कि मैं इससे खुश हूं कि दोनों बिल्कुल अलग तरह की शख्सियत हैं।

मेरा मानना है कि पिताजी से मुझे सादगी विरासत में मिली है। मैंने उन्हें जिंदगी में हमेशा सच्चा और ईमानदार ही देखा है। भले ही कितने भी विपरीत हालात हों, वे अपने लेन-देन में हमेशा ईमानदार रहे हैं और मैं वैसा ही बनने की कोशिश करती हूं। लोग मुझसे पूछते हैं कि अगर आपके पिता पब्लिक फिगर नहीं होते तो आपको उनके साथ ज्यादा समय बिताने को मिलता। लेकिन मैंने वैसा खालीपन कभी महसूस ही नहीं किया।

उन्होंने अपने काम के जीवन को ही मेरे इर्द-गिर्द बुन दिया। वे मुझे स्कूल से लेने आते थे और हर खास मौके पर मेरे साथ होते थे। हमारे रिश्ते एक टिपिकल पिता-पुत्री के रिश्ते हैं। हम दोस्त नहीं हैं, क्योंकि बीच में सम्मान की एक रेखा हमेशा रही है, जिसे मैंने कभी लांघने की कोशिश नहीं की।

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