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रीमिक्स गानों को लेकर गुस्सा हुईं लता मंगेशकर, ट्विटर पर खुला खत लिखकर जताई नाराजगी

गीत को उसके मूल स्वरूप में पेश करना अच्छी बात है। ऐसा करने से मूल गीत की सुंदरता और उसका अर्थ कायम रहेगा।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jun 02, 2018, 04:13 PM IST

रीमिक्स गानों को लेकर गुस्सा हुईं लता मंगेशकर, ट्विटर पर खुला खत लिखकर जताई नाराजगी

बॉलीवुड डेस्क। भारत रत्न लता मंगेशकर अक्सर अपने ट्विटर हैंडल पर संगीत और देश की हस्तियों से जुड़ी जानकारी ट्वीट करती रहती हैं। हाल ही में लता मंगेशकर की जावेद अख्तर से बात हुई जिसके बाद उन्होंने एक संदेश उन सभी गीतकाराें, संगीतकारों और गायकों के लिए लिखा, जो गोल्डन इरा के गीतों का रीमिक्स बना रहे हैं। चिर-परिचित अंदाज मेंwww.twitlonger.comपर एक खुला ख़त लिखते हुए लता मंगेशकर ने अपने लम्बे संदेश पत्र की शुरुआत कुछ इस तरह की…।

नमस्कार....
“नमस्कार.. जावेद अख़्तर साहब से मेरी टेलीफ़ोन पे बात हुई उसके बाद मुझे महसूस हुआ कि मुझे उसपर कुछ लिखना चाहिए, तो वो बात आप सबके सबके साथ साझा कर रही हूं। हिंदी चलचित्र संगीत का एक अनुपम दौर था। इसे गोल्डर इरा-स्वर्णिम युग कहा जाता है। इस दौर के सिनेमा गीत भारतीयों के हृदय में वर्षों से रचे-बसे हैं। आज भी यह गीत करोंड़ों रसिक पसंद करते हैं एवं आगे भी पसंद करते रहेंगे।

कुछ समय से मैं देख रही हूं कि स्वर्णिम युग से जुड़े गीतों को नए ढंग से रीमिक्स के माध्यम से पुन: पेश किया जा रहा है। कहते हैं कि यह गीत युवा श्रोताओं में लोकप्रिय हो रहे हैं। सच पूछिए तो इस में आपत्ति की कोई बात नहीं है। गीत का मूल स्वरूप कायम रख उसे नए परिवेश में पेश करना अच्छी बात है।

एक कलाकार के नाते मैं भी ये मानती हूं कि कई गीत, कई धुनें ऐसी होती हैं कि हर कलाकार को लगता है कि काश इसे गाने का मौक़ा हमें मिलता। ऐसा लगना भी स्वाभाविक है। परंतु, गीत को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना यह सरासर गलत बात है। और सुना है कि ऐसा ही आज हो रहा है। और मूल रचयिता के बदले और किसी का नाम दिया जाता है जो अत्यंत अयोग्य है।

गाने की मूल धुन को बिगाड़ना, शब्दों में मनचाहा परिवर्तन करना या फिर नए और सस्ते शब्द जोड़ना इस तरह की बेतुकी हरकतें देख-सुन सच में पीड़ा होती है।

गीत को उसके मूल स्वरूप में पेश करना अच्छी बात है। ऐसा करने से मूल गीत की सुंदरता और उसका अर्थ कायम रहेगा। नयी पीढ़ी को ऐसे गीत जरूर पसंद आएंगे।

स्वर्णिम युग के गीतों को बनाने में अनेक कलाकारों की--गायक-गायिका, गीतकार, संगीतकार, संगीत संयोजक एवं कुशल वादकों की, तंत्र विशारदों की मेहनत लगी है। उस दौर में मधुर गीतों का एक जुलूस निकल पड़ा। इस बात को हमें भूलना नहीं चाहिए कि अमीरबाई कर्नाटकी, जोहराबाई अंबालेवाली, तलत महमूद साहब, शमशाद बेगम, मोहम्मद रफ़ी साहब, मुकेश भाई, गीता दत्त, किशोर दा, मन्ना दा,आशा भोसले, उषा मंगेशकर,सुमन कल्याणपुर, येशुदास, एसपी बालसुब्रमण्यम जैसे असंख्य गायक-गायिकाओं ने अपने गीतों से समूचे देश को एकता के धागे में पिरोने का काम किया।

दादा साहाब फालके जी ने भारतीय सिनेमा की नींव रखी। मेहनत और प्रतिभा के बल पर उन्होंने इस देश के सामने स्वस्थ मनोरंजन का एक बढ़िया ज़रिया प्रस्तुत किया। व्ही शांताराम जी ने प्रभात फिल्म कंपनी के माध्यम से सामाजिक सरोकारों का रुपहले पर्दे पर सशक्त चित्रण किया। वहां कलकत्ते में (अभी का कोलकाता) देवकी बोस, नितिन बोस, प्रमथेश चंद्र बरुआ और कुंदनलाल जी सहगल ने सिनेमा को एक निहायत ऊंचा दर्जा दिया।

महबूब खान, बिमल राॅय, के आसिफ, चेतन आनंद, विजय आनंद, बीआर चोपड़ा, यश चोपड़ा, गुरू दत्त, राज कपूर, शक्ति सामंत, राज खोसला, नासिर हुसैन, ऋषिकेश मुखर्जी, गुलज़ार जैसे निर्माता-निर्देशकों ने भारतीय वास्तव का यथार्थ और मन लुभावन रूप दिखाया। उस दौर के हर निर्देशक की फिल्म में कहानी एवं गीतों का एक सुंदर ताना-बाना देखने मिलता है। यह गीत भारत के जनजीवन से जुड़ गए हैं।

महाराष्ट्र में निर्देशक भाल जी पेंढारकर जी ने श्री शिवाजी महाराज जी के जीवन एवं कार्य का निष्ठापूर्वक और सुंदर चित्रांकन कर मराठी लोक संस्कृति में सिनेमा को प्रस्थापित किया। उनकी फिल्मों से महाराष्ट्र की मिट्टी की खुशबू आती है।

एसएस वासन, एलव्ही प्रसाद, एमव्ही रमण, भीम सिंह जैसे स्वनाम धन्य फिल्मकारों ने दक्षिण भारत में हिंदी फिल्मों का निर्माण कर सिनेमा द्वारा देश में एकता कायम की जाती है इस सत्य को रेखांकित किया।

मास्टर गुलाम हैदर, खेमचंद प्रकाश, अनिल विश्वास, आरसी बोराल, पंकज मलिक, केसी डे, नौशाद, सी रामचंद्र, सज्जाद जी, शंकर-जयकिशन, एसडी बर्मन, मदनमोहन, रोशनलाल, हेमंतकुमार, सुधीर फडके, पं हृदयनाथ मंगेशकर, वसंत देसाई, जयदेव, खय्याम, सलिल चौधरी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आरडी बर्मन, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी, जतीन-ललित जैसे अनगिनत प्रतिभाशाली संगीतकारों ने सुर, ताल और लय का अनुपम उत्सव रचा।

हिंदी सिनेमा के गीतों को अमर बनाने में कवियों और शायरों का अमूल्य योगदान रहा है। साहिर लुधियानवी, मजरूह सुलतानपुरी, शैलेंद्र, राजेंद्र कृष्ण, पं. प्रदीप, पं. नरेंद्रजी शर्मा, पं. इंद्र, भरत व्यास, कैफ़ी आजमी, हसरत जयपुरी, इंदीवर, राजा मेहंदी अली खान, गुलजार, नीरज, आनंद बख्शी, जावेद अख्तर जैसे अनगिनत कवियों ने सिनेमा-गीतों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और भारत के बुनियादी मूल्यों का भरपूर संवर्धन किया। कई हिंदी सिनेमा-गीतों की पंक्तियों को हमारे लोक जीवन में मुहावरों का दर्जा मिला है। यह बहुत बड़ी बात है।

एक और बात कहती हूं जो आप को दिलचस्प लगे। उस जमाने में तकनीक का पक्ष मजबूत नहीं था। मोम की रिकाॅर्ड पर गाना ध्वनि मुद्रित किया जाता था। जरा-सी भूल हो जाए तो वह रिकाॅर्ड तोड़कर दूसरी बार गाना ध्वनिमुद्रित किया जाता था। पर हमारे गुणी वादक भाई और ,कौशिक जी मिनू कात्रक, भंसाली जी जैसे रिकार्डिस्ट पूरी कुशलता के साथ अपना काम करते थे। सुविधाओं का अभाव जरूर था, परंतु प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी।

काम में लगन थी, प्रतिबद्धता की भावना थी। एक-एक गाने को खूब तराशा जाता था। कई दिन रिहर्सलें होतीं थीं। गाना सुंदर और अर्थ पूर्ण हो इसलिए हर कोई हृदय पूर्वक कोशिश करता था। हर किसी पर सृजन का आशीर्वाद था। आज पीछे मुड़कर देखती हूं और सोचती हूं तो लगता है कि वह दिन अभिमंत्रित थे, वह समय जादुई था।

आज भी हिंदी सिनेमा में कितने ही कवि-गीतकार, संगीतकार, गायक-गायिकाएं, रिकाॅर्डिस्ट्स, म्यूजीशियन्स, तंत्रविशारद पूरी मेहनत और लगन से काम कर रहे हैं और उनके काम को लोग सराह रहे हैं।

अनगिनत गुणीजनों की प्रतिभा, तपस्या एवं मेहनत के फलस्वरूप हिंदी सिनेमा के गीत बने और बन रहे हैं। लोकप्रियता के शैल-शिखर पर विराजमान हुए हैं, हो रहे हैं। यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। मेरी प्रार्थना है इसके साथ खिलवाड़ न करें। संगीत यह समाज एवं संस्कृति का प्रथम उदगार है। उस के साथ विद्रोह न करें। ये समस्त संगीतकार, गीतकार और गायकों ने ये तय करना चाहिए कि केवल लोकप्रियता पाने के लिए वो इस संगीत के खजाने का दुरुपयोग ना करें।

हिंदी सिनेमा-गीतों की पवित्रता कायम रखने का और यह मसला योग्य तरह से हल करने का दायित्व रिकार्डिंग कंपनियों का है ऐसा मैं मानती हूं। लेकिन दुःख इस बात का है कि कंपनियां ये भूल गई हैं। यह कंपनियां अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करें, संगीत को केवल व्यावसायिक तौर पे देखने के बजाय देश की सांस्कृतिक धरोहर समझके क़दम उठाए ऐसा मेरा उनसे नम्र निवेदन है।


धन्यवाद।"


-लता मंगेशकर

ट्विटर पर एक्टिव
- लता मंगेशकर अक्सर अपने टि्वटर अकांउट पर ट्वीट्स करती रहती हैं। इनमें इंडियन फिल्म इंडस्ट्री की बड़ी हस्तियों के जन्मदिन, पुण्यतिथि, त्योहारों की बधाई, क्रिकेट अपडेट्स और निजी जीवन के मौके शामिल होते हैं।
- ट्विवटर पर उनके फॉलोअर्स की संख्या 12.7 मिलियन है। जबकि वे केवल 9 लोगोंं को फाॅलो करती हैं। इनमें सचिन तेंदुलकर, दलाई लामा, अमिताभ बच्चन, नरेन्द्र मोदी, आशा भोसले, ऊषा मंगेशकर, हृदयनाथ मंगेशकर, जनाई भोसले का नाम है।

एकस्ट्रा शॉट्स
- लता ने पहला हिन्दी गीत डायरेक्टर वसंत जोगलेकर की फिल्म ‘आपकी सेवा में’ गाया था। फिल्म 1946 में आयी थी।
- गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में लता के नाम को लेकर कई बार विवाद हुए। 20 भाषाओं में 25000 हजार गीतों के साथ उनका नाम जुड़ना था, लेकिन उस दौरान मोहम्मद रफी ने 28000 गीतों के साथ इस रिकॉर्ड को चुनौती दी थी।
- लता मंगेशकर ने 4 फिल्में भी प्रोड्यूस की हैं। वादल (मराठी), झांझर, कंचन और लेकिन (हिन्दी)।

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