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एक्सपर्ट की राय : मौत जैसे गंभीर सबजेक्ट पर भी हंसाती है 'मुक्ति भवन'

Anupama Chopra | Apr 08, 2017, 17:39 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
एक्सपर्ट की राय : मौत जैसे गंभीर सबजेक्ट पर भी हंसाती है 'मुक्ति भवन'
Critics Rating
  • Genre: कॉमेडी ड्रामा
  • Director: शुभाशीष भुटियानी
  • Plot: 'मुक्ति भवन' की कहानी वैसे तो मौत के बारे में है लेकिन फिल्म आपको लाइफ के बारे में बताती है।
'मुक्ति भवन' रिलीज हो गई है। इसपर जानी-मानी फिल्म क्रिटिक अनुपमा चोपड़ा से dainikbhaskar.com ने जाना, कैसी है ये फिल्म...
स्टारकास्ट -आदिल हुसैन, ललित बहल, गीतांजलि कुलकर्णा, पॉलोमी जी।
डायरेक्शन
फिल्म 'मुक्ति भवन' में बनारस के घाट पर जलते मुर्दे, मान्यताएं आदि के बीच डायरेक्टर शुभाशीष में हंसी ढूंढ लाए हैं। उन्होंने फिल्म की स्टोरी को काफी नपे तुले शब्दों में बताया है 'मुक्ति भवन' में एक ठहराव है जो कि आज कल की फिल्मों में कम ही देखने को मिलता है। अगर आपको भारी प्लॉट का हाई वोल्टेज ड्रामा पसंद है तो 'मुक्ति भवन' आपको बांध कर रखेगी। फिल्म में ज्यादा कुछ नहीं होता है। कहानी को बताने का तरीका, ट्विस्ट को बेहतरीन तरीके से लाया गया है। जो कि आप में फिल्म देखने के लिए पेशेंस बनाए रखता है। 'मुक्ति भवन' की परफॉर्मेंस दमदार है।
कहानी
फिल्म का एक बूढ़ा आदमी दयानंद कुमार (ललित बहल) को लगता है कि उनका आखिरी वक्त आ गया है। वो बनारस के एक लॉज (मुक्ति भवन) में मरना चाहता है। जहां उनके पिता की मौत हुई थी। दया का बेटा राजीव (आदिल हुसैन) थोड़ा अजीब होता है। जिसके पास कोई च्वॉइस नहीं होती और वो अपने पिता को कंपनी देता है। ऐसे में पिता और बेटा एक होटल में रूम मेट्स बन जाते हैं और मौत का इंतजार करने लगते हैं। राजीव अपने काम की डेड लाइन्स के बड़ा परेशान होता है। वहीं दया काफी लापरवाह और डिमांडिंग होता है। हालांकि दोनों समय के साथ एक दूसरे के करीब आ जाते हैं और लाइफ को लेकर उनकी अंडरस्टैडिंग काफी अच्छी हो जाती है। गीतांजलि कुलकर्णी ने राजीव की पत्नी की रोल प्ले किया है। वहीं पालोमी घोट ने उनकी स्प्रिचुअल बेटी की रोल प्ले किया है। दोनों ने एक मिडिल क्लास को काफी अच्छे से रिप्रजेंट किया है।
रेटिंग
बेशक फिल्म में बनारस और डेथ बिजनेस को लेकर कुछ भी सामान्य नहीं है। लेकिन शुभाशीष ने इस पर कोई कमेंट करना बेहतर नहीं समझा है। उन्होंने केवल एक कट्टरपंथी, जीवन और संबंधों के दर्द के साथ प्रस्तुत किया है। मास्टर स्ट्रोक यह है कि फिल्म को उन्होंने कॉमेडी के एंगल से बनाया है। इसलिए जब दया बीमार हो जाता है और भजन कर मौत का इंतजार शुरु करता है। इस सीन में भजन गाते वक्त वो कहता है - कृपया सुर में गाते हैं। यह एक ऐसी फिल्म है जिसे आप हंसते हुए मौत के बारे में देख सकते हैं। मैं साढ़े तीन स्टार देती हूं।
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Web Title: mukti bhawan movie review
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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