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Movie Review: कुक्कू माथुर की झंड हो गई

dainikbhaskar.com | May 30, 2014, 12:55 PM IST

Critics Rating
  • Genre: कॉमेडी
  • Director: अमन सचदेवा
  • Plot: 'कुक्कू माथुर की झंड हो गई' एक नए रैपर में लिपटी हुई पुरानी फिल्म हैं, जिसमें हिंदी मसाला फिल्मों का प्रयोग नए सिरे से कर दिया गया है।
'कुक्कू माथुर की झंड हो गई' एक नए रैपर में लिपटी हुई पुरानी फिल्म हैं, जिसमें हिंदी मसाला फिल्मों का प्रयोग नए सिरे से कर दिया गया है।
कहानी: कुक्कू और रोनी बचपन के लंगोटिया यार हैं। थोड़ा सा बड़े होने पर दोनों अलग हो जाते हैं और एक-दूसरे से अलग-अलग रहकर बड़े होते हैं। एक छोटे से शॉर्ट ब्रेक के बाद दोनों की दोस्ती उन्हें वापस खींच लाती है।

ये फिल्म एक दोस्ती-यारी के रैपर में लिपटी हुई दिल्ली के ढाबा स्टाइल में परोसी गई है, वो भी एक लोकल घिसे-पिटे तड़के के साथ। फिल्म में सभी चेहरे नए हैं। ना कोई यो-यो हनी सिंह का रैप, ना सिक्स पैक बॉडी।
कुक्कू माथुर (सिद्धार्थ) बिन मां का एक मिडिल क्लास दिल्ली ब्वॉय है, जो अपने स्ट्रिक्ट फादर के साथ रहता है। कुक्कू के पिता उसे लेकर बेहद महत्वाकांक्षी हैं, लेकिन कुक्कू एक रेस्त्रां खोलने का सपना देखता है।
रोनी (आशीष) जो कि कुक्कू का जिगरी दोस्त है, उससे ज्यादा इजी गोइंग और स्मार्ट है। किशोरावस्था में दोनों को एक ही एडिक्शन होता है और वह है साड़ी के गोदाम में बैठकर फ्रूट बियर पीना।
बारहवीं के बाद कुक्कू को काफी स्ट्रगल करने के बाद एक शेडी फिल्म यूनिट में स्पॉट ब्वॉय का काम मिल जाता है। वहीं रोनी अपने ब्लाउज पीस के फैमिली बिजनेस को ज्वाइन कर लेता है, जिसके चलते उसे अपने दोस्तों के बीच अपमानित तक होना पड़ता है।
जल्द ही कुक्कू के सम्मुख एक कड़वी सच्चाई सामने आती है और उसकी जिंदगी बिखर जाती है। इसी बीच फिल्म में चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाले कानपुर के प्रभाकर भईया की एंट्री होती है, जिनके पास हर समस्या का समाधान है।
यहीं से फिल्म में मैडनेस की शुरुआत हो जाती है। एक अच्छा लड़का कैसे परिस्थितियों के साथ बदलता चलता है, यही है फिल्म की कहानी। कुल मिलाकर कुक्कू की वाट लग जाती है, या यूं कहें कि झंड हो जाती है।
अमन सचदेवा का प्लॉट स्ट्रेट फॉरवर्ड है। फिल्म की कहानी आपके सामने कुछ नया नहीं परोसती। वही पुराने जुमले, वही पुराने जोक्स जिन्हें आप पहले भी कई दफा हिंदी फिल्मों में देख चुके हैं, आपको बहुत ज्यादा अट्रेक्ट नहीं करते।
हालांकि फिल्म में प्रभाकर का एक्ट जरूर लुभाता है। इसके अलावा गोदाम के गॉर्ड के अपनी बीवी से मोबाइलिया (टेलीफोनिक) इश्क लड़ाने को जरूर डायरेक्टर ने मजेदार ढंग से फिल्म में उकेरा है। फनी सिचुएशंस और सीन किरदारों के क्लीन ह्यूमर से मजेदार बन पड़े हैं, लेकिन यहां भी फिल्म की कमजोर पटकथा ही आड़े आती है।

एक्टिंग: इस फिल्म से डेब्यू कर रहे सिद्धार्थ और आशीष ने अच्छा अभिनय किया है, लेकिन फिल्म में कुक्कू की लव इंटरेस्ट बनी कॉलोनी का तोता (सिमरन) अपना असर छोडऩे में नाकाम रहीं हैं। दरअसल सिमरन के लिए फिल्म में बहुत ज्यादा स्कोप है भी नहीं।

डायरेक्शन: अमन सचदेवा का डायरेक्शन अच्छा है, लेकिन कमजोर पटकथा के चलते वह बहुत ज्यादा कमाल नहीं दिखा सके।

क्यों देख सकते हैं फिल्म?
यदि आपको कोई फिल्म बस केवल और केवल सिनेमाहॉल में देखनी है, तो आप मूवी देखने जा सकते हैं। कुक्कू की झंड होते तो कम से कम आप देख ही सकते हैं।
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Web Title: Movie Review: kukku mathur ki jhand ho gayi
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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