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पहलाज निहलानी याद आ रहे हैं

फिल्म सेन्सर बोर्ड के अध्यक्ष पद से पहलाज निहलानी हटाए गए थे।

Jaiprakash Choukse | Last Modified - Nov 18, 2017, 10:19 AM IST

पहलाज निहलानी याद आ रहे हैं

फिल्म सेन्सर बोर्ड के अध्यक्ष पद से पहलाज निहलानी हटा गए, क्योंकि उन पर आरोप था कि वे बहुत सख्त हैं और उनके पद पर उदारवादी प्रसून जोशी को नियुक्त किया गया, जिनका लिखा गीत ‘अंधेरे से डर लगता है मां’ बहुत सराहा गया था। बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रसून जोशी अनेक विधाओं में सक्रिय रहे हैं। ताजा खबर यह है कि प्रसून जोशी सेन्सर संबंधित कामों के लिए यथेष्ट वक्त नहीं निकाल पा रहे हैं और इसी कारण कुछ फिल्मों का प्रदर्शन स्थगित करना पड़ा। प्रमाण-पत्र पर हस्ताक्षर नहीं होने पर निर्माताओं को बहुत हानि हो रही है। इस तरह की घटनाओं से उदारवादी विचारधारा बदनाम हो जाती है। अब कुछ फिल्मकार चाहते हैं कि ‘सख्त’ पहलाज निहलानी की ‘घर वापसी’ हो।

इस घटना से याद आता है छोटे परदे पर प्रस्तुत कार्यक्रम ‘ऑफिस ऑफिस।’ पंकज कपूर अभिनीत ‘आम आदमी’ एक दफ्तर में अपने काम के लिए आवेदन करता है। उस दफ्तर की एक महिला सारा समय स्वेटर बुनती रहती है और आवेदकों से अपने घर की सब्जी कटवाती है। एक अन्य पात्र समोसे खाता रहता है। उस दफ्तर का खैनी मलता चपरासी भी रिश्वतखोर है। यह एक अत्यंत मनोरंजक एवं सामाजिक सोद्‌देश्यता वाला कार्यक्रम रहा। दफ्तरशाही, लाल फीताशाही इत्यादि शब्द हमारी कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालते है। प्राय: क्लर्क कुुंठाओं के शिकार हो जाते हैं। ‘जी हुजूरी’ उनके रक्त में प्रवेश कर जाती है और दफ्तर से घर लौटते ही ये अपनी विफलताएं और कुंठाओं के कोड़े से अपनी पत्नी को पीटते हैं। जिस तरह प्रसिद्ध लेखक मैक्सिम गोर्की ने कहा था कि युद्ध में चली हर गोली अंतत: किसी न किसी मां की छाती पर ही लगती है। उसी तरह कुंठाअों के चाबुक भी किसी न किसी पत्नी की पीठ पर ही बरसते हैं। अपने से अधिक शक्तिशाली से पिटा हुआ व्यक्ति अपने से कमजोर पर उसका बदला लेता है।

सेन्सर बोर्ड की स्थापना प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हुई और युद्ध के समय डाक के सेन्सर नियमों को ही फिल्म प्रमाणन में जगह दी गई। गुलामी के दिनों में हुकूमते बरतानिया केवल आज़ादी की लड़ाई उग्र कर देने वाली सामग्री को ही प्रतिबंधित करती थी। उन दिनों प्रदर्शित अनेक फिल्मों में चुंबन के दृश्य हैं परंतु आज़ादी प्राप्त करने के बाद सेन्सर नियम की पहली गाज़ चुंबन पर ही गिरी। सेन्सर की निगाह केवल नारी शरीर पर ही केंद्रित रही है और अन्य किस्म की अभद्रता बिना हिचक जारी रही। दादा कोंडके ने लगातार 17 सुपरहिट फिल्मों का निर्माण किया और दो अर्थ वाले संवादों का जमकर प्रयोग हुआ। सभी पात्रों ने अपना शरीर ढंक रखा था अत: अभद्रता संवाद का हिस्सा बनी। दादा कोंडके की सफलता से कादर खान प्रेरित हुए और हिंदी में बनी फिल्मों में भी शब्दों से खिलवाड़ प्रारंभ हुआ। अश्लीलता की सर्वमान्य परिभाषा हमेशा ही धुंध में रही है। यहां तक कि कानून में अभद्रता को समझने के लिए वेबस्टर डिक्शनरी खंड तीन का हवाला दिया गया है। अश्लीलता से जुड़ी हैं भारतीय दंड विधान की धाराएं 292, 293 और 294। विधि विषयों पर किताबों के लेखक रतनलाल ने लिखा है कि जज महोदय पहले लेखक के स्थान पर बैठें, फिर पाठक के स्थान पर बैठें और संतुलन का वहन करें।

अश्लीलता को अवाम की सोच से जोड़कर आकलन का आग्रह किया गया है, परंतु आम आदमी को कैसे परिभाषित करेंगे? कौन है यह आम आदमी जिसकी पसंद या नापसंद पर सारा मामला छोड़ दिया गया है। एक आम आदमी को एक प्रकरण में वकील ने एक पृष्ठ पढ़कर अपनी राय देने को कहा और आम आदमी ने उसे अश्लील करार दिया तथा दूसरा अंश पढ़ने को दिया तो उसने उसे भद्र घोषित किया। वकील ने जज को बताया कि जिसे अश्लील करार दिया गया है, वह एक धार्मिक किताब का अंश है और जिस अंश को साफ सुथरा कहा गया है, वह अश्लीलता के कारण प्रतिबंधित किताब से लिया गया अंश है। स्पष्ट है कि संदर्भ देखे बिना किया गया फैसला भ्रामक हो सकता है। सारा दारोमदार संदर्भ पर निर्भर करता है।

वर्ष 1933 में जेम्स जॉयस की ‘यूलिसिस’ के एक अंश को अभद्र मानकर एक मुकदमा कायम किया गया और जज बूल्से द्वारा दिए गए फैसले में संदर्भ के महत्व को निर्णायक माना गया है। राज कपूर की ‘राम तेरी गंगा मैली’ का एक दृश्य महान रवि वर्मा की पेंटिंग से प्रेरित है। पेंटिंग को महान माना गया परंतु उसकी प्रेरणा से रचे फिल्म दृश्य पर अश्लीलता का आरोप लगाया गया। संदर्भ का महत्व इसी से समझा जा सकता है। फिल्म सेन्सर बोर्ड में फिल्म तकनीक को समझने वाले लोगों को लिया जाना चाहिए और इसे फुलटाइम सवैतनिक पद बनाया जाना चाहिए। सेन्सर बोर्ड द्वारा काटे गए दृश्य पुणे फिल्म संस्थान में जमा किए जाते हैं। शोधार्थी के लिए वे तरतीब से सुरक्षित रहना चाहिए। प्रतिबंधित सामग्री का अध्ययन, सेन्सर द्वारा पारित सामग्री से अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।

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