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MOVIE REVIEW: चेन्‍नई एक्‍सप्रेस

Mayank Shekhar | Aug 02, 2018, 01:33 PM IST

Critics Rating
  • Genre: रोमांस
  • Director: रोहित शेट्टी
  • Plot: फिल्म के डायलॉग घिसे-पिटे हैं और एक्‍शन भी चलताऊ है। ऐसे में यह वन टाइम वॉच मूवी है।

चैन नहीं!

मैंने कोई एक माह पहले चेन्‍नई एक्‍सप्रेस देखी थी। तमिलनाडु में एक सड़क यात्रा के दौरान। हरे-भरे घास के मैदानों से लगभग जर्जर बोगियां गुजर रही थीं। खिड़की के ऊपर नजर आ रहा नाम जाना-पहचाना लगा।

यकीनन, वह एक रेलगाड़ी थी, दूसरे दर्जे के नॉन-एसी कंपार्टमेंटों से भरपूर, जो मुंबई से चेन्‍नई तक पहुंचने से पहले बीस जगहों पर रुकती है और कोई चौबीस घंटे का समय लेती है।

जाहिर है, बेरहम गर्मी में पसीना-पसीना हो रहे यात्रियों को इस तकलीफ़देह सफ़र की ज्‍यादा फिक्र न थी। उन्‍हें पहले ही पता था कि उनका पाला इसी से पड़ने वाला है।

लेकिन यह फिल्‍म, जिसका नामकरण उस रेलगाड़ी के नाम पर किया गया है, को देखने वाले दर्शकों के बारे में भी यही बात नहीं कही जा सकती।

ट्रेलरों के मद्देनजर दर्शक इस फिल्‍म को देखने शायद दो कारणों से पहुंचेंगे : खूब सारा बुक्‍काफाड़ हंसी-मजाक और इतनी ही धांसू मारधाड़, जो धरती को हिलाकर रख देगी और जिसके दौरान हमें लोग, कारें, जीपें और यहां तक कि ट्रेन भी हवा में उड़ती नजर आएगी, बशर्ते फिल्‍म का बजट इसकी इजाजत दे। लेकिन फिल्‍म के दौरान मुझे एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि कोई बात मुझे जरा-सा भी गुदगुदा रही हो।

न ही मैंने अपने पीछे बैठे दर्शकों का कोई बहुत ज्‍यादा शोर-शराबा सुना। फिल्‍म में स्‍टंट और मारधाड़ के दो ही सीक्‍वेंस हैं, एक इंटरवल से पहले और दूसरा उसके बाद में, जो 140 मिनट लंबी एक फिल्‍म का बहुत छोटा-सा हिस्‍सा है। तो, क्‍या आपको चेन्‍नई जा रही इस शोरगुल भरी ट्रेन की यात्रा करते समय खुद को ठगा हुआ महसूस करना चाहिए? शायद हां। मैं आपको बताता हूं क्‍यों।

फिल्‍म का मुख्‍य किरदार एक हलवाई है और उसकी दुकान का नाम है व्‍हाई-व्‍हाई। उसका नाम है राहुल। ‘नाम तो सुना होगा’ वह पूछता है। निश्चित ही ये सज्‍जन शाहरुख खान हैं, बशर्ते आप उन्‍हें भूल न गए हों, क्‍योंकि वे लगातार आपको यह याद दिलाते रहते हैं।

वे बार-बार अपनी पिछली फिल्‍मों के डायलॉगों, जैसे ‘माय नेम इज़ राहुल, आई एम नॉट अ टेररिस्‍ट’ (माय नेम इज़ खान), या गानों जैसे ‘छम्‍मक छल्‍लो’ (रा. वन), ‘दर्द-ए-डिस्‍को’ (ओम शांति ओम), या गाने के बोलों (फिल्‍म ‘दिल से’ के गीत ‘जिया जले’ के तमिल बोल) को दोहराते रहते हैं, या फिर ‘डॉन’ की ‘काली बिल्‍ली‘ को जब-तब याद करते रहते हैं।

शायद शाहरुख खान यहां खुद एसआरके का ही मजाक उड़ा रहे हैं, मुसीबत इतनी ही है कि हम समझ नहीं पाते कि इसमें मजेदार क्‍या है।

कॉमेडी का बुनियादी आधार यह है कि एक उत्‍तर भारतीय शख्‍स खुद को एक दक्षिण भारतीय गांव में पाता है। वह लगभग जंगलीनुमा लोगों से घिरा हुआ है, जो किसी पगलेट भाषा में कुछ बड़बड़ाते रहते हैं, जिसे हमारा पंजाबी मुंडा कतई समझ नहीं पाता। लेकिन शायद इस नस्‍लवादी मजाक के हर्जाने के तौर पर राहुल एक दूसरे दक्षिण भारतीय गांव की यात्रा भी करता है और वहां सभ्‍य लोगों को पाता है।

यह फिल्‍म एक-चौथाई तमिल में है, तीन-चौथाई हिंदी में है, और दोनों के ही लिए सबटाइटिल्‍स की जरूरत नहीं है। डायलॉग घिसे-पिटे हैं और एक्‍शन भी चलताऊ है। फिल्‍म की इकलौती अच्‍छी चीज है विशाल-शेखर का संगीत। शायद इस फिल्‍म का मकसद त्‍योहारी मूड को भुनाना था।

एंड क्रेडिट के दौरान पूरा एक गाना थलईवार (रजनीकांत) को समर्पित कर दिया जाता है। हम समझ जाते हैं कि यहां ईद का त्‍योहार हमें हैप्‍पी रजनीकांत विश कर रहा है!

फिल्‍म के निर्देशक रोहित शेट्टी हैं। अभी तक उनकी सभी फिल्‍मों में अजय देवगन रहे हैं, जो आमतौर पर लाउड और नाटकीय फिल्‍मों में अपनी सीमाओं के भीतर रहते हुए अभिनय करते हैं। लेकिन शाहरुख तो पहले ही शोरगुल से भरी इस फिल्‍म में और शोर-शराबा करने पर उतारू नजर आते हैं।

ऐसा कभी-कभार ही होता है कि किसी सुपर सितारे की फिल्‍म के पोस्‍टरों में उसके निर्देशक का नाम इतनी प्रमुखता से लिखा गया हो, लेकिन शेट्टी उन्‍हें दिए गए इस महत्‍व के हकदार थे, क्‍योंकि उनकी पिछली कुछ फिल्‍में जैसे ‘बोल बच्‍चन’, ‘सिंघम’, ‘गोलमाल 3’ बॉक्‍स ऑफिस पर सौ करोड़ कमाने में कामयाब रही हैं। लेकिन इस फिल्‍म का तो बजट ही शायद सौ करोड़ के आसपास होगा। सुना है, खुद शेट्टी ने इसे निर्देशित करने के लिए 20 करोड़ रुपए लिए हैं।

इसके बावजूद यह हमारे द्वारा हाल ही में देखी गई कुछ लो-बजट फिल्‍मों से भी गई-बीती लगती है। कहीं-कहीं पर लाइटिंग दुरुस्‍त नहीं है, कैमरा कभी-कभी हीरो के मेकअप पर जूम-इन कर बैठता है, किसी चलती ट्रेन या कार के भीतर महत्‍वपूर्ण दृश्‍य ऐसे लगते हैं, जैसे उन्‍हें बैकग्राउंड में कोई स्‍क्रीन डालकर फिल्‍मा लिया गया हो। बहरहाल, मनोरंजन की उम्‍मीद से आए दर्शकों को इनमें से किसी बात से कोई मतलब नहीं होगा।

फिल्‍म के रिलीज से पहले उसके मुख्‍य कलाकार शाहरुख खान हफ्तों से हर मुमकिन माध्‍यम से उसका प्रचार करते आ रहे थे और दर्शकों को उसके लिए तैयार कर रहे थे। शाहरुख बहुत सहज एंटरटेनर हैं और वे सार्वजनिक जीवन में भी लोगों को गुदगुदाते रहते हैं।

हम उम्‍मीद करते हैं कि काश, वे अपनी थोड़ी-बहुत प्रतिभा इस फिल्‍म में भी लगा देते। मुझे यकीन है कि फिल्‍म की प्‍लानिंग बहुत जबर्दस्‍त थी।

फिल्‍म में दीपिका पादुकोण एक साउथ इंडियन लड़की की भूमिका निभा रही हैं, जिसका नाम मीना-म्‍मा है और जिसका दक्षिण भारतीय लहज़ा प्रोमो में तो बहुत अच्‍छा लगता है, लेकिन यदि हमें उसे पूरी फिल्‍म में सुनना पड़े तो उससे हम खीझ जाते हैं।

राहुल (या एसआरके) की उम्र के बारे में मजाक करते हुए वह कहती है कि क्‍या वह पचास साल का हो गया है। राहुल नाराज हो जाता है। ‘बहुत भद्दा और सिंगल स्‍क्रीन फिल्‍मों जैसा मजाक है’, वह कहता है और अपनी इस फिल्‍म के ज़ॉनर की ओर इशारा कर देता है।

हीरो और हीरोइन की मुलाकात चेन्‍नई एक्‍सप्रेस रेलगाड़ी में होती है। वह अपने डैड के सिक्‍योरिटी गार्डों से घिरी हुई घर जा रही है, ताकि उसका ब्‍याह किया जा सके। हीरो गोवा जा रहा है।

क्‍या हीरो हीरोइन को चाहता है? नहीं। तो फिर वह इस तमाम झमेले को छोड़कर क्‍यों नहीं चला जाता? पता नहीं। सवाल यह है कि फिल्‍म देख रहे दर्शक अभी तक उठकर क्‍यों नहीं गए? इसका जवाब मुझे पता है। क्‍या आपने टिकट के पैसे चुकाए हैं? बिल्कुल। तो फिर एक काम कीजिए, चुपचाप बैठिए और इस फिल्‍म को झेलिए।

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Web Title: moview review: chennai express
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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