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शूटआउट एट वडाला: मेरी तो वाट लग गई

Mayank Shekhar | May 04, 2013, 09:32 AM IST

Critics Rating
  • Genre: एक्शन
  • Director: संजय गुप्ता
  • Plot: यह फिल्‍म देखते समय हमें महसूस होता है कि हम लफंगे शायरों के एक लंबे मुशायरे में आ गए हैं।

यह फिल्‍म देखते समय हमें महसूस होता है कि हम लफंगे शायरों के एक लंबे मुशायरे में आ गए हैं। इस फिल्‍म का हर किरदार एक शायर है और अपने इस हुनर को आजमाने पर आमादा है। फिल्‍म की हर लाइन धांसू डायलॉगबाजी है। इससे यह ज्‍यादा से ज्‍यादा ‘वन्‍स अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ का एक घटिया संस्‍करण बनकर रह जाती है।

यहां तक कि फिल्‍म में आखिरी सांसें गिन रहा शख्‍स (मनोज बाजपेयी) भी मरते-मरते एकाध डायलॉग छोड़ने का मौका हाथ से नहीं जाने देता। इतना ही नहीं, उस पर चाकुओं से वार करने वाला बंदा (जॉन अब्राहम) भी शायरी सुनाते हुए ही यह महान कार्य संपन्‍न करता है।

फिल्‍म में मनोज बाजपेयी ने एक युवा डॉन जुबैर की भूमिका निभाई है। जॉन अब्राहम मान्‍या सुर्वे की भूमिका निभा रहे हैं। जुबैर जेल से भाग गया है और यदि वह सुर्वे का खात्‍मा कर देता है तो वह मुंबई का किंग बन जाएगा। बॉलीवुड में अंडरवर्ल्‍ड टाइप की फिल्‍मों में हम यह सब पहले भी देख चुके हैं। फिल्मकार शुरुआत में ही हमें बता देता है कि मान्‍या सुर्वे के बारे में बहुत कम मालूमात हासिल है और फिर वह इसका फायदा उठाकर उसकी कहानी में जी भर कर मनगढ़ंत चीजें डाल देता है।

फिल्‍म के प्रारंभिक शॉट में हम मान्‍या को एक युवा, हैंडसम पुलिस वाले की वैन में बैठा देखते हैं। इस युवा पुलिस वाले की भूमिका सदाबहार अनिल कपूर ने निभाई है। ये दोनों एक-दूसरे को एक ही कहानी सुनाते हैं। हम समझ नहीं पाते कि क्‍या वाकई मान्‍या की मौत होगी। आखिरकार हम हैरत में पड़ जाते हैं कि वह अभी तक मरा क्‍यों नहीं। शायर नंबर पांच अनिल कपूर हमें समझाता है कि वह खाकी वर्दी क्‍यों पहनता है।

उसकी दलील यह है कि यदि कोई उस पर पॉटी भी कर दे तो भी किसी को पता नहीं चलेगा। मैं जिस थिएटर में बैठा यह फिल्‍म देख रहा होता हूं, उसके दर्शक ठठाकर हंस पड़ते हैं। लेकिन पुलिस वाले का बॉस (एक विशेष भूमिका में जैकी श्रॉफ) हमें बतलाता है कि खाकी का रंग मिट्टी से मिलता-जुलता है। वह कहता है : हम इसके लिए मिट्टी में मिलने के लिए भी तैयार हैं। वाह!

सुनने में मजेदार लगता है? हो सकता है। फिल्‍म में जब कोई किरदार देसी गालियां देने लगता है तो पुरुष दर्शक खुशी से उछल पड़ते हैं। एक व्‍यक्ति हमें यह ज्ञान देता है कि यदि आप भारतीय हैं तो आपको भारतीय गालियां देना चाहिए।

सेंसर बोर्ड के अनेक सालों के दबाव के बाद ही अब जाकर हमारी फिल्‍मों में इस तरह की बहादुरी दिखाई दे पाती है। वैसे, इस फिल्‍म में दर्शकों की यौन आकांक्षाओं के लिए भी कुछ सामग्री है। जॉनी बॉय को कंगना रानौत के साथ प्‍यार करते देखकर दर्शकों को सुकून मिलता है। सोफी चौधरी और सनी लियोनी भी यहां इसी काम के लिए हैं।

लेकिन मैं यह सब फिर भी बर्दाश्‍त कर जाता, बशर्ते मैं फिल्‍म के मुख्‍य किरदार मान्‍या की जरा भी परवाह करता। लेकिन भला कोई भी मान्‍या की परवाह क्‍यों करे? ये सभी किरदार भाड़े के हत्‍यारे हैं, जो ‘आइटम्‍स’ के साथ खेलना पसंद करते हैं और यदि आइटम अच्‍छा है तो उसका रेप करने से भी नहीं चूकते।

शायद उन्‍होंने यह फिल्‍म यह सोचकर बनाई होगी कि यह हिट साबित होगी, लेकिन फिल्‍म देखते समय मुझे लगता है कि हिट तो मुझे ही किया जा रहा है, और वह भी सिर पर धड़ाधड़।

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Web Title: movie review:shootout at wadala
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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