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साहिब बीवी और गैंगस्‍टर रिटर्न्‍स

Mayank Shekhar | Mar 08, 2013, 12:04 PM IST

Critics Rating
  • Genre: एक्शन/ड्रामा
  • Director: तिग्मांाशु धुलिया
  • Plot: सीक्‍वेल अब एक बॉलीवुड फॉर्मूला बन चुके हैं। आमतौर पर बड़ी ब्‍लॉकबस्‍टर फिल्‍मों के सीक्‍वेल बनाए जाते हैं, लेकिन ऐसा जरूरी भी नहीं है।

सिनेमा में रिटर्न होने लायक

सीक्‍वेल अब एक बॉलीवुड फॉर्मूला बन चुके हैं। आम तौर पर बड़ी ब्‍लॉकबस्‍टर फिल्‍मों के सीक्‍वेल बनाए जाते हैं, लेकिन ऐसा जरूरी भी नहीं है। सीक्‍वेल को देखने आने वाले दर्शकों की तादाद से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसके प्रीक्‍वेल को कितने लोगों ने पसंद किया था। लेकिन बॉक्‍स ऑफिस हमें केवल यह बताता है कि कितने लोगों ने टिकटें खरीदीं, यह नहीं कि कितने लोगों को फिल्‍म पसंद आई। शायद इसीलिए 'दबंग' की सीक्‍वेल बनती है, लेकिन 'बॉडीगार्ड' की नहीं, जबकि शायद 'बॉडीगार्ड' की सीक्‍वेल 'दबंग' की सीक्‍वेल से बड़ी हिट साबित हो सकती थी।

'साहिब बीवी और गैंगस्‍टर' 2011 में रिलीज हुई थी। निश्‍चित ही वह बहुत बड़ी हिट नहीं थी, लेकिन लोगों ने उसे पसंद किया था। वह एक अच्‍छी थ्रिलर फिल्‍म थी, जिसमें हर मोड़ पर एक पेंच था। फिल्‍म के दो मुख्‍य किरदार अंतत: तमाम खूनखराबे के बावजूद बच जाते हैं। निश्चित ही दर्शकों की रुचि इसमें हो सकती थी कि इसके बाद उनका क्‍या हुआ होगा। शायद इसीलिए यह सीक्‍वेल बनाया गया है। काफी हद तक यह सीक्‍वेल अपनी अपेक्षाओं को पूरा करने में कामयाब रहा है।

फिल्‍म में जिमी शेरगिल ‘साहिब’ है, जो अब व्‍हीलचेयर पर रहने को मजबूर है और दो गोलियों से जख्‍मी होने के बावजूद वह काफी तरोताजा नजर आता है। उसके खास आदमी मारे जा चुके हैं, लेकिन वह सही-सलामत है। लेकिन यह भी जाहिर है कि साहिब को अपनी खूबसरत बीवी (माही गिल) में कोई खास दिलचस्‍पी नहीं है। बीवी अब एक स्‍टाम्‍प पेपर एमएलए है। साहिब का विधानसभा क्षेत्र उसकी सल्‍तनत है। उसके पड़ोसी जमींदार दोस्‍तों की भी यही कहानी है। जब लोग ही साहिबों और बीवियों को सर आंखों पर बैठाने को राजी हों तो जाति, धर्म, विकास या लोकतंत्र से कोई ज्‍यादा फर्क नहीं पड़ता। इस तरह के डॉन और राजा किस्‍म के विधायकों को जीतने के लिए किसी पार्टी की भी जरूरत नहीं होती और चूंकि वे निर्दलीय होते हैं, इसलिए उन पर कोई विचारधारात्‍मक दबाव भी नहीं होते। ऐसे में विधानसभा में महत्‍वपूर्ण फैसले लेने के मौके पर वे किसी भी राजनीतिक दल के लिए महत्‍वपूर्ण साबित होते हैं।

इस सीक्‍वेल को देखने और पसंद करने के लिए उसके प्रीक्‍वेल को याद करने की कोई खास जरूरत नहीं है। फिल्‍म में एक नया ‘गैंगस्‍टर’ है, जो पूरा खेल बदलकर रख देता है। फिल्‍म में एक और बीवी भी है। साहिब की इस दूसरी बीवी की भूमिका सोहा अली खान ने निभाई है, हालांकि वे प्रभावित नहीं कर पातीं। फिल्‍म के चारों मुख्‍य किरदारों के व्‍यक्तित्‍व में इतने आयाम हैं कि उनकी कहानी में हमारी दिलचस्‍पी बरकरार रहती है। जैसा कि फिल्‍म में कहा भी जाता है कि ‘हर रिश्‍ते के पीछे साजिश है’।

गैंगस्‍टर के पुरखे भी कभी जमींदार हुआ करते थे, लेकिन साहिब के पुरखों ने उनका खात्‍मा कर दिया था। गैंगस्‍टर राजा हो सकता था, लेकिन अब वह केवल लुक्‍खा बनकर रह गया है। लिहाजा वह बदला लेना चाहता है। इन दोनों की कहानी में झांककर देखने पर हमें उत्‍तर प्रदेश की जमीनी राजनीति के ‘टशन’ का अंदाजा लग सकता है। हालांकि, यह फिल्‍म पूरी तरह से इनडोर फिल्‍माई गई है, एक हवेली के इर्द-गिर्द।

गैंगस्‍टर नेता बनना चाहता है। उसका नाम इंद्रजीत सिंह है, लेकिन उसे राजा भैयाके नाम से जाना जाता है। जाहिर है, यहां उत्‍तर प्रदेश के नेता रघुराज सिंह उर्फ राजा भैया की ओर इशारा किया गया है। यह भूमिका बेहतरीन अभिनेता इरफान खान ने निभाई है। ऐसा नहीं है कि इरफान को हमेशा ही बेहतरीन रोल और डायलॉग मिलते हैं, लेकिन वे संवाद अदायगी की अपनी बेपरवाह शैली से उन्‍हें हमेशा यादगार बना देते हैं। इरफान सबसे पहले तिग्‍मांशु धुलिया की फिल्‍म हासिल (2003) से ही सबकी नजरों में चढ़े थे। उनके कॅरियर की सर्वश्रेष्‍ठ भूमिकाओं में पान सिंह तोमर (2012) का नाम शुमार होगा और वह भी तिग्‍मांशु की ही फिल्‍म थी। लेकिन इस फिल्‍म में तिग्‍मांशु के पास और भी बेहतर कहानी है। एक बेहतरीन यथार्थवादी कहानी का मुकाबला कोई भी फिक्‍शन या फैंटसी नहीं कर सकती।

धुलिया ने पिछले साल अनुराग कश्‍यप की 'गैंग्‍स ऑफ वासेपुर' से अपने अभिनय कॅरियर की भी धमाकेदार शुरुआत की थी। ऐसा लगता है कि वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं, क्‍योंकि वे इस फिल्‍म के निर्देशक होने के साथ ही इसके लेखक भी हैं। उनके संवाद धारदार हैं और फिल्‍म के अभिनेताओं ने उनकी बेहतरीन अदायगी की है, जैसे कि यह : ‘पता है मर्द इतनी गालियां क्‍यों देते हैं? क्‍योंकि वो रोते कम हैं।’ अलबत्‍ता फिल्‍म का संगीत जरूर कमजोर है।

गैंगस्‍टर साहिब का खात्‍मा करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा सकता था, लेकिन उसे यह भी पता चलता है कि साहिब उसी औरत (सोहा) से जबरन ब्‍याह करना चाहता है, जिसे गैंगस्‍टर चाहता है। औरत एक अच्‍छे खानदान से वास्‍ता रखती है। इससे उसके बदले की चाह और बढ़ जाती है। लेकिन हम जानते हैं कि साहिब की शातिर बीवी भी कभी न कभी कहानी में दखल जरूर देगी।

भारत में बहुपत्‍नीवाद गैरकानूनी है, लेकिन निश्चित ही यदि आप ‘राजा’ हैं तो बात अलग होगी। फिल्‍म का शीर्षक अबरार अल्‍वी की 'साहिब बीवी और गुलाम' से प्रेरित है। वह फिल्‍म भारत के पतनशील सामंतों के बारे में थी, लेकिन इस फिल्‍म में दिखाए गए जमींदार हास्‍यास्‍पद हैं। उनकी शान और रुतबा भले ही अब जाता रहा हो, लेकिन उनका रवैया बरकरार है और इसीलिए वे हंसी और दया के पात्र बन जाते हैं। कभी-कभी लगता है कि कॉमेडी और ट्रेजेडी एक ही सिक्‍के के दो पहलू हैं। यह फिल्‍म इस बात को बहुत अच्‍छी तरह से सच साबित करती है।

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Web Title: movie review: sahib biwi aur gangster
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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