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MOVIE REVIEW: RAANJHANAA

Mayank Shekhar | Jun 20, 2013, 11:57 PM IST

Critics Rating
  • Genre: रोमांटिक
  • Director: आनंद एल. राय
  • Plot: बनारस की मिट्टी में ही जन्म लेती है कुंदन उर्फ धनुष और ज़ोया उर्फ सोनम की कहानी।

भारत के खूबसूरत शहर बनारस की अगर आपने सैर नहीं की तो फिल्म रांझणा के ज़रिए वहां गंगा मइया को सूर्य प्रणाम कीजिए। बनारस की गलियों में नाचिए, कूदिए, वहां की होली का मज़ा लीजिए। जुलूस और शादियों में शामिल होइए और अगर रिक्शा वाला आपकी बातों पर ठेठ बनारसी लहजे में कुछ कहे तो हैरान न हो जाइए...।

ये बनारस है और यहीं की मिट्टी में ही जन्म लेती है कुंदन (धनुष) और ज़ोया (सोनम) की कहानी।

बेहद ही सिंपल लड़का दिखाया गया है कुंदन को। वह लड़की को प्रपोज़ करने से पहले मंदिर में भगवान का आशीर्वाद लेने जाता है। वह ज़ोया को प्यार करता है। उसका परिवार इंटरकास्ट मैरिज के खिलाफ है, लेकिन कामकाजी कुंदन यह परिवार पसंद करता है।

बनारस की गलियों में ही कुंदन को ज़ोया से 16 थप्पड़ पड़ते हैं। कुंदन 10वीं में पढ़ता है और ज़ोया 9वीं में। उसी दौरान गंगा किनारे यूपी के आम लौंडों की तरह कुंदन ज़ोया को कार्ड देता है और शायरी के ज़रिए अपने प्रेम का इज़हार करने की कोशिश करता है। यह तरीका काम नहीं आता तो प्यार में यह टीनेजर ज़ोया के लिए कलाई को काटने की कोशिश कर खून से प्यार लिखना चाहता है। इस उम्र में अक्सर किशोर-किशोरियां खून से खत लिखना चाहते हैं।

दोनों के प्यार में मासूमियत झलकती है और उपर से कलरफुल बनारस इनके प्यार में इतने रंग बिखेर देता है कि कहानी का फर्स्ट हाफ आपको हंसाता भी है और आप मन ही मन यह मासूम प्रेम कहानी देखकर खुश होते हैं।

दूसरा मोड़ तब आता है, जब कहानी 8 साल आगे बढ़ जाती है। अब कुंदन जवान हो गया है और उसकी दाढ़ी-मूंछें आ गई हैं। वहीं, ज़ोया भी दिल्ली से पढ़ाई खत्म करके बनारस लौटती है। इस खुशी में यह रांझा अपनी हीर के लिए बजाज स्कूटर खरीदता है।

फर्स्ट हाफ में ऑडियंस को खुद-ब-खुद फिल्म से पूरी तरह जुड़ा रहता है। फिल्म इस कदर बांधे रखती है कि इंटरवल में आप खुद एनरजेटिक फील करते हुए थिएटर से पॉपकॉर्न लेने के लिए बाहर निकलते हैं।

फिल्म का अगला मोड़। कॉलेज में एक नेता के रूप में अभय का किरदार सामने आता है। अभय देओल के स्पेशल अपीयरेंस में उनके बहुत ज़्यादा डायलॉग्स नहीं हैं और फिर फिल्म का रोमांटिक स्टोरी से राजनैतिक बैकड्रॉप पर आना, दिल्ली के जेएनयू इलेक्शन्स की ओर भटकना, कहानी को सेकंड हाफ में ढीला बना देता है। यानी सेकंड हाफ के शुरू होते ही कुछ देर बाद आपको लगता है कि फर्स्ट हाफ के बाद जो उम्मीद की थी, वैसा एंटरटेनमेंट नहीं मिल रहा।

धनुष का कैरेक्टर कुंदन तो पूरी फिल्म में टाइट रहता है, लेकिन ज़ोया किस तरह की लड़की है, यह समझ पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। सेकेंड हाफ में सोनम भी अपने किरदार में कम्फर्टेबल नहीं दिखतीं।

कहानी बीच-बीच में कई सवाल भी छोड़ती है, जिनके जवाब आप कुछ देर में पाते हैं। जैसे कुंदन कहानी में तमिल पंडित होता है। कहानी में एक मोड़ ऐसा आता है जब कुंदन अचानक से तमिल में बात करनी शुरू कर देता है। लेकिन शुरू से लेकर अंत तक कुंदन ने अपना प्रभाव बनाये रखा है और अपनी परफॉर्मेंस से दर्शकों को उसने काफी एंटरटेन किया है।

सोनम की तो कॉस्ट्यूम्स और मेकअप तो ठीक है, लेकिन एक्टिंग में उन्हें अभी सुधार की ज़रूरत है। वही बेमतलब की सांवरिया वाली स्माइल उनके चेहरे पर दिखती रहती है और जब बात सैड एक्सप्रेशन्स लाने की होती है, तो उनके चेहरे पर भाव ही नहीं आते।

वैसे धनुष के साथ उनकी जो केमिस्ट्री नज़र आई है, वो अभी तक परदे पर किसी हीरो के साथ नज़र नहीं आई।

म्यूज़िक शानदार है। वाकई ए आर रहमान दिल को छू लेते हैं। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म में बैकग्राउंड स्कोर भी बहुत बढ़िया है। कहानी में कहीं-कहीं पर बैकग्राउंड स्कोर, इशारों के ज़रिए कहानी आगे का आग बढ़ना, ज़ोया-कुंदन के रोमांस को और दिलचस्प बनाता है। श्रेया घोषाल, जावेद अली, हरिहरण, रबी शेरगिल और म्यूज़िक के कई उस्तादों की आवाज़ ने कहानी में जान डाली दी है।

बनारस में 40 दिनों की शूटिंग रंग ले आई है। बनारस का कोना-कोना, गलियां, रिक्शेवाले की टिप्णणी, गोलगप्पे वाले ठेले कहानी में हर रंग बिखेर रहे हैं। सेकंड हाफ में दिल्ली दिखाई गई है। इंडिया गेट, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन का कैंपस और अगर आप गौर से देखेंगे तो पंजाब में जो अभय का महल जैसा घर दिखाया गया है, वो असल में पटौदी पैलेस है।

फिल्म के डायलॉग्स लाजवाब हैं। आपको बहुत हंसायेंगे। कुंदन के करीबी दोस्त का किरदार निभा रहे एक्टर्स स्वारा भास्कर और मोहम्मद ज़ीशान अयूब ने अपने कैरेक्टर्स को कहीं पर भी ढीला नहीं होने दिया, बल्कि मोहम्मद और स्वारा की भाषा सुनकर आपको बिल्कुल नहीं लगेगा कि इन्होंने एक्सेंट की ट्रेनिंग ली है।

डायरेक्शन भी अच्छा है। फिल्म के डायरेक्टर आनंद एल राय ने इससे पहले तनु वेड्स मनु बनाई थी। यह उनकी दूसरी फिल्म है।

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(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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