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REVIEW: LUNCH BOX जैसी सरल फिल्में ही तय करती हैं लंबी दूरियां

mayank shekhar | Sep 20, 2013, 07:18 AM IST

Critics Rating
  • Genre: रोमांस
  • Director: रीतेश बत्रा
  • Plot: एक नजरिए से देखें तो यह फिल्म दो बहुत प्रचलित परिपाटियों का जमा-जोड़ है।
यदि एक नजरिए से देखें तो यह फिल्म दो बहुत प्रचलित परिपाटियों का जमा-जोड़ है। एक तो है वह कहावत, जिसके मुताबिक किसी व्यक्ति के दिल तक का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है। और दूसरी है रिप्ले की मशहूर किताब बिलीव इट ऑर नॉट की तर्ज पर मुंबई के पुराने तौर-तरीकों के बारे में दिखाए जाने वाले न्यूज़ आइटम्स। पश्चिम के मीडिया में मुंबई की इस तरह की चीज़ें अक्सर दिखाई जाती रहती हैं कि इस शहर के डिब्बावाले लाखों लंचबॉक्सों को विभिन्न उपनगरों में मौजूद घरों और दफ्तरों तक रोज बिला नागा पहुंचाते हैं और बमु‍श्किल ही कभी कोई गलती करते हैं। पिछले 130 सालों में उन्होंने इस कला में खासी महारत हासिल कर ली है।
बहरहाल, इस फिल्म में एक बार डिब्बावालों की सर्विस जरूर फेल हो जाती है, जब एक हाउसवाइफ इरा का टिफिन भूल से फर्नांडीज की टेबल पर चला जाता है। फर्नांडीज विधुर हैं और शायद किसी सरकारी पेंशन या बीमा एजेंसी के दफ्तर में एकाउंटेंट हैं। दफ्तर में कम्प्यूटर तक नहीं हैं और सारा काम मैन्युअली होता है। वहां पुराने पंखे धीमे-धीमे चलते रहते हैं। तमाम डेस्कों पर कागजों और फाइलों का ढेर लगा हुआ है। यह दफ्तर एक निहायत बेहलचल-उबाऊ जिंदगी को दर्शाता है, जो वहां एक दिन भी काम करने वाले किसी शख्स को सुला देने के लिए काफी है। लेकिन फर्नांडीज यहां 35 सालों से काम कर रहे हैं। उनकी आंखों और चेहरे को देखकर यह भांपा जा सकता है। घर से दफ्तर तक बस, ट्रेन या कभी-कभी ऑटो रिक्शा पकड़ने के चक्कर में उनकी जिंदगी की गाड़ी शायद कहीं छूट-सी गई है।
लेकिन इरा की उम्र उनसे कहीं कम है और उसकी एक छोटी बेटी है। उसका पति हमेशा अपने सेलफोन से चिपका रहता है। हमें उस महिला पर तरस आता है। माचिस की डिबिया सरीखा एक वन बीएचके अपार्टमेंट ही उसकी पूरी दुनिया है और अपने पति के लिए लंच तैयार करके भेजना ही शायद उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद। लेकिन टिफिन की अदला-बदली के बहाने अधेड़ एकाउंटेंट और इस युवा हाउसवाइफ के बीच एक तरह का रिश्ता बन जाता है। शायद वे दोनों ही अपनी जिंदगी में थोड़ा-थोड़ा बदलाव चाहते हैं। एकाउंटेंट वैसे भी समय से पहले रिटायरमेंट लेने की तैयारी कर रहा है।
इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण आज दो अजनबी लोगों के बीच कोई रिश्ता बन जाना मामूली बात है। यू हैव गॉट मेल, मित्र माय फ्रेंड, स्लीपलेस इन सिएटल जैसी कुछ रोमांटिक फिल्मों में इसे बहुत अच्छे से दिखाया भी गया है। इस फिल्म में दोनों लंचबॉक्स में पत्र रखकर एक-दूसरे से बातें करते हैं। उनके ख्यालात कोई बहुत गंभीर और संजीदा किस्म के नहीं हैं, जैसी कि उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती। डब्बा वाले उनके लिए कबूतर या डाकिये की तरह हैं। सेलफोन के जमाने में यह एक बहुत पुरानी दुनिया लगती है, महिला के घर में मौजूद ट्रांजिस्टर रेडियो और वीडियो प्लेयर की ही तरह।
फर्नांडीज की भूमिका इरफान खान ने निभाई है। बंबई में, जहां के वे मूल निवासी भी हैं, उन्हें मैक अंकल कहकर बुलाया जाता है। मैक बोले तो माका पाव दे यानी मुझे रोटी दो। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने शेख की भूमिका निभाई है, जो फर्नांडीज का नया सहयोगी है। फिल्म में जैसे ही शेख की एंट्री होती है, हम समझ जाते हैं वह हमें बहुत हंसाएगा। ऐसा नहीं है कि वह हमें बहुत ज्यादा हंसाता है, वह तो केवल इतना भर ही कहता रहता है कि सर आपको कैसा लग रहा है, या आप कैसे हो सर, फिर भी पता नहीं क्यों, जब भी वह फ्रेम में होता है, हमारा हंसने-गुदगुदाने को जी करता है।
कुछ अभिनेताओं में यह बात होती है कि वे अपने द्वारा निभाए जा रहे किरदार को बहुत अच्छे से अपने भीतर उतार लेते हैं। दूसरी तरफ, इरफान देश के उन गिने-चुने अभिनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने स्क्रीन पर अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन करने में कामयाबी हासिल की है। मिस्टर फर्नांडीज को गौर से देखें तो हमें यह महसूस होता है कि हम इस बूढ़े, उदास शख्स को अच्छे से जानते हैं। वह कहता है कि अगर हम अपनी बातें किसी को बता न सकें तो हम उन्हें भूलने लगते हैं। शायद यही कारण है कि हम हमेशा दोस्तों और साथियों की तलाश करते रहते हैं।
मलाड की हाउसवाइफ, बांद्रा के मैक अंकल और डोंगरी का शादीशुदा असिस्टेंट, इन किरदारों को रचते हुए इस फिल्म से अपना पदार्पण कर रहे रितेश बत्रा ने कमाल के हुनर के साथ अकेलेपन की एक दास्तान बुनी है, जो दुनिया के सबसे भीड़-भाड़ वाले शहरों में से एक में रहने वाले लोगों के दिलों को छू सकती है। कान फिल्म समारोह में यह फिल्म सबसे पहले दिखाई गई थी और वहां पुरस्कृत हुई थी। तभी से करण जौहर और यूटीवी जैसे मुख्यधारा के प्रोड्यूसरों ने इस फिल्म में दिलचस्पी दिखाई है। मीडिया ने भी इसके पक्ष में ऐसा माहौल बनाया है कि ऑस्कर्स के लिए भारत की ओर से इस फिल्म को ही भेजा जाए। इस जैसी छोटी-सरल फिल्म इसी तरह लंबी दूरियां तय कर सकती है।
दुनिया की सभी बेहतरीन फिल्मों का उत्तरार्द्ध उनके पूर्वार्द्ध से हमेशा बेहतर रहता है। यह फिल्म भी हमें एक बेहतरीन अंत की ओर लेकर जाती है और धीरे-धीरे हमारे अहसासों पर हावी होती जाती है। निश्चित ही, उम्र एक सच्चाई है। आमतौर पर हममें से कोई नहीं जानता कि हम सही मायनों में बूढ़े कब हो जाएंगे। वास्तव में हम इस विषय से इतने गहरे से जुड़े होते हैं कि इसके बारे में ठीक से बात नहीं कर सकते। हो सकता है, दूसरे हमारी उम्र के बारे में ज्यादा बेहतर ढंग से कोई निर्णय ले पाएं। लेकिन क्या हम मरने तक जीना छोड़ देते हैं? मैं उम्मीद करता हूं : नहीं।
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