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‘आशिकी 2’

Mayank Shekhar | Aug 02, 2018, 01:46 PM IST

‘आशिकी 2’
Critics Rating
  • Genre: रोमांटिक
  • Director: मोहित सूरी
  • Plot: इस म्यूजिकल रोमांटिक स्टोरी को अच्छी एक्टिंग के चलते देखा जा सकता है।

स्‍वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक हो सकती है

यह फिल्‍म अल्‍कोहल की लत से होने वाले खतरों के बारे में है, जैसे कि म्‍यूजिकल कॅरियर खत्‍म होने पर आवाज का चले जाना, वगैरह। इससे हमें यह सबक मिलता है कि ग़म गलत करने के लिए शराबनोशी नहीं करनी चाहिए, क्‍योंकि इससे आपकी मुसीबतें और बढ़ सकती हैं।

हमें यह भी चेताया जाता है कि शराब से हमारी सेहत और पारिवारिक जीवन ही बर्बाद नहीं होता, इससे हमारे आत्‍मविश्‍वास को भी खासा नुकसान पहुंचता है। वास्‍तव में शराब के विरुद्ध अभियान चलाने वाली एजेंसियों को लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इस फिल्‍म की मदद लेनी चाहिए, अलबत्‍ता वे भी शायद इस फिल्‍म से संतुष्‍ट न हों।

अव्‍वल तो हीरो के पतन की कहानी से हम खुद को जोड़ नहीं पाते। फिल्‍म की शुरुआत से ही वह खुद से नफरत करने वाला एक लूज़र है और आखिर तक बना रहता है। हमें बताया जाता है कि वह शराब के बिना रह नहीं सकता, लेकिन इसके बावजूद स्‍क्रीन पर वह तरोताज़ा और तंदुरुस्‍त ही नज़र आता है, उसके होशोहवास हमेशा कायम रहते हैं और माशाअल्‍ला वह गाता भी अच्‍छा है। शायद उसकी महत्‍वाकांक्षाएं पूरी नहीं हो पाई हैं और इसीलिए वह अपना ही सत्‍यानाश करने पर आमादा हो गया है। शायद उसे अपना काम भी अब पसंद नहीं आता। वह एक युवा टैलेंटेड लड़की को सिंगिंग स्‍टार बनाना चाहता है। लड़की उसका बहुत ध्‍यान रखती है। वह भी उसे बहुत चाहता है। उन दोनों को तो घर बसा लेना चाहिए था।

माना जा रहा है कि यह फिल्‍म महेश भट्ट की फिल्‍म ‘आशिकी’ (1990) की सीक्‍वेल है और हृषिकेश मुखर्जी की लाजवाब फिल्‍म ‘अभिमान’ (1973) पर आधारित है, लेकिन यह साफ है कि यह इम्तियाज अली की ‘रॉकस्‍टार’ (2011) से प्रेरित है, बस फर्क इतना ही है कि इस फिल्‍म में लड़का दिमाग़ी रूप से कुछ ज्‍़यादा ही बीमार नजर आता है, जबकि लड़की उसका साथ देने को हरदम तैयार रहती है।

आदित्‍य रॉय कपूर ने इस फिल्‍म में आरजे की भूमिका निभाई है और परदे पर उनके संयत अभिनय को देखकर लगता है कि वे ऑरिजिनल ‘आशिकी’ के राहुल रॉय से कहीं बेहतर अभिनेता हैं। खूबसूरत श्रद्धा कपूर का काम भी सराहनीय है (वे शक्ति कपूर की बेटी हैं और ऐसा लगता है मानो वे शक्ति कपूर द्वारा स्‍क्रीन पर किए गए तमाम पापों का प्रायश्चित हैं)। यह युवा जोड़ी इस फिल्‍म को उसकी कहानी से बेहतर बना देती है, लेकिन इस तरह तो केवल आधी जंग ही जीती जा सकती है।

ऑरिजिनल ‘आशिकी’ तब रिलीज़ हुई थी, जब साउंडट्रैक की बिक्री भर से ही फिल्‍मों के निर्माण को जायज ठहराया जा सकता था। तब टी-सीरिज का लेबल लगी कैसेटें और संगीतकार नदीम-श्रवण इस क्षेत्र के सरताज हुआ करते थे और एक पान की दुकान से दूसरी तक हमें केवल कुमार सानू की नकचढ़ी आवाज़ ही सुनाई देती थी, जैसे : ‘सांसों की ज़रूरत हो जैसे…’।

तब से रोमांटिक ट्रैजेडियों का ज़माना भले ही चला गया हो, लेकिन इस फॉर्मूले का जादू अभी कम नहीं हुआ है। इस फिल्‍म के संगीत पर चार कंपोज़र्स ने काम किया है, लेकिन फिल्‍म में बार-बार दुहराए जाने वाले टाइटिल ट्रैक के अलावा एक भी गाना ऐसा नहीं है, जो हमारी याददाश्‍त में कायम रहे। यदि यह म्‍यूजिकल फिल्‍म न होती, तो इस गलती को फिर भी माफ़ किया जा सकता था।

यह फिल्‍म इस बारे में भी है कि शोहरत ज्‍यादा समय तक कायम नहीं रहती। तब तो इस फिल्‍म के लिए मूल ‘आशिकी’ फिल्‍म के हीरो-हीरोइन राहुल रॉय और अनु अग्रवाल ही सबसे अच्‍छा विषय साबित हो सकते थे। बीबीसी तक ने ‘वन फिल्‍म वंडर’ राहुल रॉय पर एक डॉक्‍यूमेंट्री बनाई थी।

कुछ साल पहले मेरी अनु अग्रवाल से भेंट हुई थी। उनका चेहरा एक दुर्घटना के बाद बिगड़ गया है, लेकिन उनके मन में अपने उस शानदार अतीत की यादें अब भी ताज़ा थीं।

उन्‍हें देखकर मेरा गला तक़रीबन रुंध गया। बॉलीवुड में काम करने वाले कलाकारों से बेहतर इस बात को कम ही लोग समझ सकते हैं कि प्रसिद्धि किस चिडि़या का नाम है और उसका न रहना क्‍या मायने रखता है, क्‍योंकि लगभग हर हफ्ते उनकी क़ीमत और क़ामयाबी का आकलन बॉक्‍स ऑफिस पर बिना किसी रियायत के किया जाता है।

फिल्‍म में म्‍यूजिकल प्रोड्यूसर की भूमिका निभा रहा एक व्‍यक्ति तनिक दार्शनिक अंदाज़ में कहता है : स्‍टार वो होता है, जिसकी आवाज़ सुनकर दिल कहता है सीटी मार। लेकिन यह फिल्‍म इस तथ्‍य को बड़े आराम से छुपा जाती है कि भारतीय पॉप-कल्‍चर में रॉक स्‍टार वही है, जो स्‍क्रीन पर किसी दूसरे व्‍यक्ति द्वारा गाए गीतों पर होंठ हिलाता है। लेकिन अब हम इस तरह की भूलों के अभ्‍यस्‍त हो चुके हैं।

फिल्‍म की हीरोइन पलक झपकते ही एक बड़ी स्‍टार बन जाती है। फैन्‍स उसके ऑटोग्राफ के लिए तरसते हैं। लेकिन उसके कदम अभी जमीन पर हैं। हीरो अब स्‍टारडम की दुनिया में नहीं लौटना चाहता। हमें नहीं पता कि आखिर उसके भीतर आत्‍मध्‍वंस की ऐसी प्रवृत्ति किस तरह पनपी।

अब उसकी दिक्‍कत अकेलापन नहीं है, उसकी दिक्‍कत यह है कि अपने भीतर के गुस्‍से के तूफान को काबू में कैसे किया जाए। लेकिन जिस काम ने उसे इतनी शोहरत दिलाई थी, उस पर ध्‍यान केंद्रित करने के बजाय वह खुद को लगातार तकलीफ़ देता रहता है। मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि इस तरह के किरदारों पर फिल्‍म बनाने के बजाय उन्‍हें थेरेपिस्‍टों के पास भेज दिया जाना चाहिए, क्‍योंकि अगर ऐसा ही लगातार चलता रहा तो शायद मुझे ही किसी दिमाग़ के डॉक्‍टर को दिखाने की ज़रूरत महसूस होने लगेगी।

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Web Title: movie review: aashiqui 2
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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