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MOVIE REVIEW: AURANGZEB

Mayank Skekhar | May 18, 2013, 10:14 AM IST

Critics Rating
  • Genre: ड्रामा-एक्शन
  • Director: अतुल सभरवाल
  • Plot: यह फिल्‍म एक बड़े भारतीय संयुक्‍त परिवार की पृष्‍ठभूमि पर आधारित है।

यह फिल्‍म एक बड़े भारतीय संयुक्‍त परिवार की पृष्‍ठभूमि पर आधारित है। मां ममता की मूरत हैं और पिताजी सख्‍त हैं। वे अमूमन समाज के दबावों तले दबे रहते हैं। एक मौके पर हमें एक करवा चौथ दृश्‍य भी देखने को मिलता है। आखिर यह एक ‘यशराज फिल्‍म’ जो है। लेकिन दर्शकों को सचेत रहना चाहिए, क्‍योंकि यह फिल्‍म खासतौर पर उन लोगों के लिए बनाई गई है, जो यशराज फिल्‍म्‍स के प्रशंसक नहीं हैं।

फिल्‍म की दृश्‍य-योजना अपने अंधेरेपन के चलते चौंकाती है। फिल्‍म के मुख्‍य किरदारों के इरादे भी इसी तरह अंधेरे में दबे-छुपे रहते हैं। ब्‍लॉकबस्‍टर फिल्‍में भावनाओं को प्रदर्शित करने के लिए बैकग्राउंड म्‍यूजिक का खूब इस्‍तेमाल करती हैं, लेकिन इस फिल्‍म में हमें संवादों के दौरान लंबे खामोश सीक्‍वेंस ही सुनने को मिलते हैं। हवाओं में भी खामोशी है। गाने तो हैं ही नहीं। यह फिल्‍म पूरी तरह से अपने कलाकारों की अदाकारी पर निर्भर रहती है।

और इसके बावजूद यह बड़े बजट की एक गैंग्‍स्‍टर हिंदी मूवी है, जिसमें मुख्‍य भूमिका में हम एक जाने-पहचाने चेहरे को देखते हैं। इस फिल्‍म को देखते समय हमें बरबस ही गोविंद निहलानी की तक्षक की याद हो आती है। निश्चित ही, हमारे फिल्‍मकार हॉलीवुड की गैंग्‍स्‍टर फिल्‍मों जैसे सर्जी लियोन की वंस अपॉन अ टाइम इन अमेरिका से लेकर एलए कांफिडेंशियल वगैरह तक से प्रेरित रहती हैं। फिल्‍म की मुख्‍य कहानी – बिछुड़ना और मिल जाना, जन्‍म के समय जुदा हो जाना वग़ैरह – परंपरागत बॉलीवुडीय मनोरंजक फिल्‍मों से प्रेरित है और इस तरह की फिल्‍मों के लिए सबसे अच्‍छी पटकथाएं सलीम-जावेद ने लिखी थीं।

भिन्‍न विधाओं के इस अजीबोगरीब तालमेल के कारण यह फिल्‍म अपनी तरह की अनूठी फिल्‍म बन जाती है। हम इस फिल्‍म के निष्‍कर्षों से प्रभावित हों या न हों, लेकिन हम इसके साहसपूर्ण फिल्‍मांकन के लिए इसके कुछ हिस्‍सों को नजरंदाज नहीं कर सकते, बल्कि हम उनकी सराहना करने को मजबूर हो जाते हैं।

युवा अर्जुन कपूर, जिन्‍होंने इसी की तरह एक और अंडर-रेटेड फिल्‍म इशकजादे से अपने कैरियर की शुरुआत की थी, ने इस फिल्‍म में जुड़वा भाइयों के रूप में डबल रोल निभाया है।

ये दोनों भाई अजय और विशाल अलग-अलग बड़े हुए हैं। उनके पिता (जैकी श्राफ) उद्योगपति हैं और उनके अच्‍छे-बुरे लोगों से कनेक्‍शंस हैं। पुलिस वाले उनका भंडाफोड़ नहीं कर सकते। एक पुलिस वाला (अनुपम खेर) कोशिश करता है, लेकिन नाकाम रहता है। उल्‍टे उसे उद्योगपति की बीवी (तनवी आजमी) से ही प्‍यार हो जाता है।

वह उसे अपनी मिस्‍ट्रेस बना लेता है और उसके बच्‍चे को पाल-पोसकर बड़ा करता है। इस तरह दोनों भाइयों को एक-दूसरे के बारे में कुछ पता नहीं चलता। एक दिल्‍ली में है तो दूसरा नागपुर में।

वैसे फेसबुक के इस जमाने में ऐसा होना जरा मुश्किल है, लेकिन फिल्‍म में इन दोनों भाइयों के जन्‍म और फिर उनके बिछुड़ने के तर्क को अच्‍छी तरह समझाया गया है, या कम से कम फिल्‍म के संदर्भ में ऐसा लगता है, जो कि ज्‍यादा जरूरी है। जहां तक फिल्‍म की कहानी का सवाल है तो फेसबुक की ही शब्‍दावली में कह सकते हैं कि – इट्स कॉम्प्लिकेटेड।

पुलिस वाले (अनुपम खेर) का वास्‍तविक परिवार, जिसमें पुलिस वाले भरे पड़े हैं (बेटा पृथ्‍वीराज, भाई ऋषि कपूर) अब उस उद्योगपति (श्राफ) को ठिकाने लगा देना चाहते हैं।

लिहाजा हम पाते हैं कि फिल्‍म का हर किरदार दूसरे से संघर्ष कर रहा है : पुलिस वाले का असली बेटा (पृथ्‍वीराज) अपने चाचा (ऋषि कपूर) से जूझ रहा है, गुमा हुआ भाई अपने वास्‍तविक पिता (श्राफ) से जूझ रहा है और दूसरा गुमा हुआ भाई अपनी वास्‍तविक मां (आजमी) से जूझ रहा है। यह जंग जारी रहती है। फिल्‍म खत्‍म होते-होते हम पस्‍त हो जाते हैं, लेकिन यदि आपने इस फिल्‍म का मजा लिया है तो इससे आप परेशान नहीं होते।

दुनिया में इंसानों के बीच होने वाले तमाम संघर्ष तीन ही चीजों के इर्द-गिर्द घूमते हैं : जर, जोरू या जमीन। इस फिल्‍म में गुड़गांव का पसरता हुआ शहरी दायरा झगड़े की असल वजह बन जाता है। फिल्‍म में सतह के नीचे एक दूसरा विचार भी है और वह है : रिश्‍तों को सपनों से ज्‍यादा महत्‍व देना।

जैसा कि फिल्‍म में एक संवाद भी है – “अपनों की कीमत सपनों से ज्‍यादा बड़ी होती है।” फिल्‍म का शीर्षक मुगल बादशाह औरंगज़ेब के नाम पर रखा गया है। इतिहास में झांकने पर हम हैरान हो जाते हैं कि आखिर सत्‍ता की वह कैसी चाह रही होगी, जिसके चलते चंद लोगों ने अपने ही परिजनों को बरबाद कर दिया था।

यकीनन, यह एक प्रभावी विचार है, लेकिन इसके लिए एक नैतिक आधार की भी जरूरत होती है, जो कि इस फिल्‍म में नहीं है। इसीलिए हम इसके किसी भी किरदार से ज्‍यादा जुड़ाव नहीं महसूस कर पाते। हां, हम इस फिल्‍म की गति और उसकी परफॉर्मेंस की जरूर सराहना करते हैं।

इन मायनों में निश्चित ही यह फिल्‍म औसत एक्‍शन फिल्‍मों से बेहतर है, लेकिन इसे देखने के बाद हम अपने भीतर जो खालीपन महसूस करते हैं, उसके चलते यह अंतत: एक औसत ह्यूमन ड्रामा ही साबित होती है। खैर, यदि इस फिल्‍म के बारे में एक वाक्‍य में कुछ कहना जरूरी हो तो इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह एक दिलचस्‍प फिल्‍म है।

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Web Title: Movei review Auranzeb
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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