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साहित्य, विज्ञान एवं फिल्मी गीत

गायक एवं कवि बॉब डिलन का जन्म 24 मई 1941 को हुआ अर्थात दूसरे विश्व युद्ध के शिखर दिनों में इस प्रतिभाशाली व्यक्ति का जन्म हुआ ।

जयप्रकाश चौकसे | Last Modified - Dec 21, 2015, 09:47 AM IST

गायक एवं कवि बॉब डिलन का जन्म 24 मई 1941 को हुआ अर्थात दूसरे विश्व युद्ध के शिखर दिनों में इस प्रतिभाशाली व्यक्ति का जन्म हुआ । 1960 से 1970 तक उनके लिखे और गाए गीतों ने अपार लोकप्रियता प्राप्त की और उस दौर के सामाजिक आक्रोश को डायलन ने अपने गीतों में अभिव्यक्त किया। उनका गीत ‘द टाइम्स दे आर चैंजिंग’ और ‘ब्लोइंग इन द विंड’ तो उस दौर के युवा आक्रोश के लिए ‘एंथम’ की तरह थे। ये गीत उसी तरह युवा एंथम थे जैसे पंजाब में एक युवा आंदोलन में ‘साड्डा हक एत्थे रख’ था। अवाम के अधिकारों और युद्ध के खिलाफ उनकी रचनाओं का गहरा महत्व रहा है। हाल ही में लंदन में इस तरह के विचार सामने आए हैं कि मेडिकल विज्ञान से जुड़े हुए लोगों को डायलन के गीतों से अपने शोध कार्य में प्रेरणा मिलती है। 1970 में मेडिकल विज्ञान के शोध-पत्र में डायलन के गीत का संदर्भ दिया गया था। यह पहला इस तरह का अवसर था। उस दौर में अनेक शोध करने वालों ने डायलन के विभिन्न गीतों के सदर्भ दिए हैं। ‘प्रैक्टिकल नर्सिंग’ नामक विज्ञान पत्रिका में डायलन के कुछ गीतों का समावेश है।

बायोमेडिकल प्रकाशनों में अनेक बार डिलन के गीतों की पंक्तियों का उपयोग किया गया है। यह भी आकलन है कि 213 विज्ञान लेखों में डिलन के गीतों का उल्लेख पाया गया है। गौरतलब है कि 1990 तक यह सिलसिला चला है और अधिकतर ‘द टाइम्स दे आर चैंजिंग’ और ‘ब्लोन इन द विंड’ का प्रयोग विज्ञान शोध-पत्रों में हुआ है। यह भी सत्य है कि बॉब डिलन के गीतों में मेडिकल विज्ञान के प्रति अपार विश्वास अभिव्यक्त किया गया है और शायद यह उसी का परिणाम है कि विज्ञान संसार उन्हें शुक्रिया अदा करता है। कुछ शोध छात्रों ने तो यह भी स्वीकार किया है कि उन्हें डिलन की पंक्तियों से शोध मार्ग नज़र आया है। आज से कुछ वर्ष पूर्व मेरी बहू डॉ. अनिता चौकसे के पास दक्षिण भारत से प्रकाशित ‘डॉक्टर कॉल्स’ या ‘इन हाउस डॉक्टर’ नामक मेडिकल विज्ञान की पत्रिकाएं नियमित आती रही हैं और एक अंक में बाल रोगों के विशेषज्ञ ने सुरदास के पदों में बालकृष्ण विवरण में बाल रोगों के संकेतों का जिक्र किया है और उपचार के संकेत भी हैं। पूरा शोधपूर्ण लेख ही सुर साहित्य से भरा पड़ा था। अधिकतर लोगों के मन में कुछ फिल्मी गीतों की पंक्तियां प्राय: गूंजती रहती है और फिल्मी गीत अनेक लोगों के एकाकीपन के साथी रहे हैं। फिल्म गीतों के इस तरह के सामाजिक पहलु पर कभी शोध नहीं हुआ है। मैं स्वयं अनेक गीतों का बार-बार मन में मनके की माला की तरह दोहराता रहा हूं और मेरा प्रिय गीत शैलेंद्र रचित ‘किसी की मुस्कराहटों पर हो निसार, किसी का दर्द ले उधार, जीना इसी का नाम है’ और एक पंक्ति तो मृत्यु पर मनुष्य की जीत रेखांकित करती है ‘मरकर याद आएंगे, किसी के आंसुओं में मुस्कराएंगे।’

दरअसल, पूर्व में सारे साहित्य और ज्ञान की खोज का केंद्र मनुष्य रहा है। खगोलशास्त्र के अध्ययन में भी आकाश गंगा में तारों नक्षत्रों का प्रभाव धरती पर रहते मनुष्यों पर रहता है- इसकी विषद व्याख्या है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में असीमित कष्ट सहते हुए लोग बिस्मिल की पंक्तियां ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है’’ गुनगुनाते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जेल में अपने साथी से बांग्ला फिल्म की एक पंक्ति सुनी जिसे वे बार-बार दोहराते थे। इस प्रसंग का विवरण मेरी किताब ‘महात्मा गांधी और सिनेमा’ में है। असल केंद्रीय विचार यह है कि साहित्य व विज्ञान तथा ज्ञान की सारी शाखाओं का एक-दूसरे से गहरा संबंध है। मेरे पास एक किताब है ‘फिजिक्स एंड पोएट्री’ दूसरी है ‘गणित और कविताएं।’ नरेश सक्सेना के काव्य संग्रह ‘समुद्र पर हो रही बारिश’ में कुछ कविताएं ईंट, मेज, कांक्रीट इत्यादि निर्माण सामग्री पर है। नरेश सक्सेना ने जबलपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज में शिक्षा पाई और ज्ञानरंजन सहित अनेक लेखकों, कवियों से उनकी भेंट हुई। एक बानगी देखिए ‘धातु युग से पहले भी था धातु युग, धातु युग के बाद भी है धातु युग, कौन कहता है कि धातुएं फलती-फूलती नहीं है, इन दिनों फलों और फूलों में सबसे ज्यादा मिलती है पानी के बाद।’ एक और कविता की कुछ पंक्तियां ‘बह रहे पसीने जो पानी है सूख जाएगा, लेकिन उसमें कुछ नमक भी है, जो बचा रहेगा, टपक रहे खून में जो पानी है वह सूख जाएगा, लेकिन उसमें कुछ लोहा भी है, जो बचा रहेगा।’
दरअसल, इजराइल के प्रो. डेविड के आग्रह पर अमेरिका के विश्वविद्यालयों ने साहित्य व दर्शन व इतिहास विषय के अनुदान कम कर दिए और व्यापार प्रबंधन के बढ़ा दिए तथा भारतीय संस्थाओं ने भी अनुकरण किया। विगत दो माह से दिल्ली में यूजीसी कार्यालय के बाहर छात्र आंदोलन कर रहे हैं, क्योंकि सरकारी विश्वविद्यालयों में साहित्य, दर्शन के छात्रों की स्कॉलरशिप निरस्त कर दी गई है। विगत सप्ताह तो हड़ताली छात्रों की पिटाई हुई और कुछ को जेल भेज दिया गया। यह नए विकास पंथ का हिस्सा है।
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