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इस मुस्लिम संगीतकार ने शर्माजी बन किया था डेब्यू, 91 की उम्र में भी शौक बरकरार

कभी कभी'(1977) और 'उमराव जान'(1982) के बेस्ट म्यूजिक का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने वाले खय्याम 91 साल के हो गए हैं।

चण्डीदत्त शुक्ल | Last Modified - Feb 18, 2018, 01:19 AM IST

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    पत्नी जगजीत कौर के साथ खय्याम।

    मुंबई. 'कभी कभी'(1977) और 'उमराव जान'(1982) के बेस्ट म्यूजिक का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने वाले खय्याम 91 साल के हो गए हैं। हालांकि, आज भी उनका म्यूजिक का शौक बरकरार है। कम ही लोग जानते होंगे कि खय्याम का धर्म भले ही मुस्लिम हो। लेकिन उन्होंने 1948 में 'हीर रांझा' की म्यूजिशियन जोड़ी शर्माजी-वर्माजी के शर्माजी के नाम से डेब्यू किया था। 91वें जन्मदिन पर DainikBhaskar.com से खास बातचीत में खय्याम ने अपनी लाइफ की कुछ खास बातें शेयर की। डालते हैं एक नजर:-


    सवाल : बचपन के बारे में कुछ बताएं। कैसा माहौल था, संगीत-साहित्य को लेकर किस तरह का प्रोत्साहन था? उन दिनों से क्या सीखा?


    जवाब :- पंजाब के ज़िला जालंधर के राहों कसबे में पैदा हुआ। तब नवांशहर तहसील थी, जो ज़िला बन गया है। हमारे घर में तालीम को बहुत अहमियत दी जाती थी। खुलापन था। देशप्रेम और मेहनत व ईमानदारी से काम करने की सीख दी गई थी। मुझे केएल सहगल के गाने सुनने और फिल्में देखने का बड़ा शौक था।
    - कस्बे में सिनेमाहॉल नहीं था, इसलिए हफ्ते में जब आधी छुट्टी मिलती तो सब जालंधर में बड़े भाईजान के पास जाते। वहां सब बच्चे मस्ती करते। उन दिनों ट्रेन के सफर में बहुत से नए तजुर्बे हुए। राहों से चार-पांच स्टेशन आगे बढ़ते ही थे कि अब्बाजान अपने ही अंदाज़ में हिंदी-उर्दू-पंजाबी अंदाज़ में कहने लगते - चलो भई, उठो, सलाम करो ते परणाम करो।
    - ये वही गांव है - खटकड़कलां, जहां शहीद भगत सिंह पैदा हुए थे। पूरे हिंदुस्तान की रूह हैं वो, लेकिन हम उनके गांव के करीबी हैं तो हमारे रोएं-रोएं में वो हवा और खुशबू रहती थी। वहां से ट्रेन चलती और हम शहादत की कहानियां सुनते रहते। बहरहाल, जालंधर पहुंचने से पहले अब्बा कई बार बता चुकते - वतन के लिए उन्होंने अपने आपको कुर्बान कर दिया।
    - फांसी के तख्ते पर वे हंसते-गाते हुए चढ़े - मेरा रंग दे बसंती चोला! राम प्रसाद बिस्मिल का एक और गीत - `सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है' वो सुनाते। इतना इंस्पिरेशन मेरी ज़िंदगी के लिए बहुत बड़ा योगदान है। मैं हर काम उसी उसूल के तहत करता रहा हूं कि मादरे वतन (मातृभूमि) की क्या वैल्यू है, हमें कितनी ज़िम्मेदारी से काम लेना है।

    आगे की स्लाइड्स में पढ़िए खय्याम ने और क्या कहा...

    सभी फोटोज : अजीत रेडेकर।

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    सवाल : आपने उस ज़िम्मेदारी को पूरी तरह निभाया भी है! खासकर आशा भोंसले की गायकी को आपके संगीत निर्देशन में अलग ही मुकाम मिला। हमने सुना है कि `उमराव जान' की शूटिंग के दौरान आशा जी ने आपको कोई कसम दी थी?

    जवाब :- `उमराव जान' का संगीत तैयार करना बहुत बड़ी चुनौती थी। हम सब आशा जी से मिले, उन्हें बताया कि इस फिल्म के सामने `पाकीज़ा' की मिसाल है। कामयाबी, मेकिंग, संगीत, शायरी, अदाकारी - सबके क्या कहने। लेकिन चैलेंज ले लिया तो सोचना क्या। सब गुरुओं को याद करके पिक्चर का बेसिक सेट किया।
    - आशा जी बेहद टैलेंटेड और सिंसियर हैं। उनका मेरा साथ 1948 से है, जब मैं शर्मा जी के नाम से पांच साल तक संगीत दे चुका था। उन्होंने कहा, `आप संगीत बनाइए, हम मेहनत करेंगे।'
    - एक और बात बताऊं - लता जी का विकल्प मेरे सामने था, क्योंकि वे `पाकीज़ा' में गा चुकी थीं, लेकिन जगजीत जी ने आशा जी के नाम का सुझाव दिया। आशा जी ने भी पूरी लगन से तैयारी की। जितनी मैंने रिहर्सल कराई, उन्होंने सब की। पूरी बारीकियां, नाज़ुक बातें समझ लीं।
    - मैंने सोचा कि चूंकि रेखा जी हमारी हीरोइन हैं, इसलिए आशा जी की आवाज़ को उनसे मैच करने के लिए डेढ़ सुर नीचा रखा। रिहर्सल तो हो गई, जब `दिल चीज क्या है' की रिकॉर्डिंग की बारी आई तो उन्होंने जगजीत जी को बुलाया और कहा - `खय्याम साहब ने सुर कौन-सा रख लिया है? मेरा सुर वो भूल गए हैं? मैं गा ही नहीं पा रही हूं।'
    - मैंने बताया - जान-बूझकर सुर नीचा रखा है, क्योंकि आप आशा जी नहीं हैं, उमराव जान हैं। वहां सुर नीचे, हलके, धीमे, नज़ाकत भरे ही होंगे। वे बोलीं - उमराव जान जब गा ही नहीं पा रही है तो रिकॉर्डिंग कैसे होगी?
    - खैर, मैंने सिर्फ इतना कहा - अभी मैंने जो सुर सेट किया है, उससे एक टेक ले लेते हैं। फिर आपके हिसाब से रिकॉर्ड कर लेंगे। जरूरी तैयारी में आधा-पौना घंटा लगेगा। खैर, उन्होंने कहा - प्रदीप (खय्याम के बेटे) की कसम खाइए कि ईमानदारी से मेरे सुर से रिकॉर्ड करेंगे। मैंने कहा - आशा जी, आप भी सरस्वती मां की कसम लीजिए कि जो मैंने आपको सिखाया है, रिहर्सल कराई है, उसी टोन में आप गाएंगी।
    - एक रिहर्सल हुई, एक टेक हुआ और मैंने जो सुर सेट किया था, उसमें गाना रिकॉर्ड हो गया। हम सब दूसरे सुर (आशा जी की मांग के हिसाब से) की तैयारी में जुट गए। साढ़े पांच मिनट का गाना बजाया गया। आलाप के दौरान आशा जी की आंखें मुंद गईं।
    - स्टूडियो में टेंशन था कि आशा जी और खय्याम-जगजीत के बीच सुर को लेकर डिफरेंसेज हैं। लोगों को डर था कि कहीं आशा जी वॉकआउट न कर जाएं। गाना खत्म हो गया। हर ओर सन्नाटा था। आशा जी की आंखें मुंदी हुई थीं। रिकॉर्डिंग रूम का दरवाज़ा खुला। उस साउंड वे ट्रांस से निकलीं और फिर बोलीं - `क्या ये मेरी आवाज़ थी? क्या मैं गा रही थी?' और इस तरह मेरा सेट किया सुर ही फाइनल हो गया। यही नहीं, आशा जी ने कहा कि अब हर गाना आप इसी सुर में रखें।

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    कुछ खास बातें:-


    - बकौल खय्याम, "मैंने कंप्रोमाइज किया, इसका मतलब - कुछ कमी रह गई। चलेगा .. नहीं, परफेक्ट ही चाहिए। इसीलिए मैं ज्यादा टेक लेता हूं..."
    - खय्याम मूडी एंड चूजी के नाम से मशहूर है। वे कहते हैं, "मैं दिल से जिस पिक्चर का संगीत दे सकूं, उसे ही चुनता हूं। जो पसंद नहीं आता, उस सब्जेक्ट को नहीं चुनता, लेकिन अदब से माफी मांग लेता हूं।"
    - कभी किसी की इंसल्ट हो जाए, ऐसे शब्द खय्याम ने कभी इस्तेमाल नहीं किए।
    - जगजीत जी (पत्नी) की मां ने खय्याम का बहुत साथ दिया। बकौल खय्याम,"बीजी ने कहा था - पुत्तर तेरा नाम खय्याम सिंह भी है।"
    - सिनेमा की दुनिया के ज़रूरतमंद लोगों की मदद के लिए खय्याम की पत्नी जगजीत कौर ने इनीशिएटिव लिया और तकरीबन 10 करोड़ रुपए जुटाकर एक ट्रस्ट गठित किया। पहला चेक सिने इंप्लाईज वर्कर्स फेडरेशन को गया है।
    - हर साल उन्हें डेढ़ लाख रुपए की सहायता देंगे। एक लाख रुपए बाकी जरूरतमंद को दिए हैं। ज्वैलरी और फ्लैट बिक जाए तो ये भी इच्छा है कि हर वर्ष पांच लाख रुपए प्राइम मिनिस्टर रिलीफ फंड में दें।

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    अब भी म्यूजिक देने का हुनर रखते हैं खय्याम

    - खय्याम का पूरा नाम मोहम्मद ज़हूर खय्याम हाशमी है। `इन आंखों की मस्ती के', `बड़ी वफा से निभाई हमने...', `फिर छिड़ी रात बात फूलों की' जैसे गीत रचने वाले खय्याम ने निजी ज़िंदगी में कई मुश्किलों का सामना किया है।
    - द्वितीय विश्वयुद्ध में वे एक सिपाही के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। ढलती उम्र के नाजुक मोड़ पर भी उन्होंने हौसले का दामन नहीं छोड़ा है।
    - खय्याम कहते हैं - अच्छी कहानी मिले तो अब भी संगीत देने के लिए तैयार हूं!

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