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अरुणा ईरानी को दिलीप कुमार ने दिलवाया था पहला ब्रेक, इन स्टार्स ने भी सुनाए ऐसे ही किस्से

वेटरन बॉलीवुड एक्टर दिलीप कुमार अपना 95वें बर्थडे सेलिब्रेट कर रहे हैं।

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह | Last Modified - Dec 11, 2017, 04:11 PM IST

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    मुंबई। वेटरन बॉलीवुड एक्टर दिलीप कुमार अपना 95वें बर्थडे सेलिब्रेट कर रहे हैं। हालांकि, दिलीप कुमार की खराब तबीयत के चलते कोई खास सेलिब्रेशन नहीं किया जा रहा है लेकिन बर्थडे पर उनकी वाइफ सायरा बानो उन्हें बिरयानी और वनीला आइसक्रीम की ट्रीट देने वाली है। इस खास मौके पर दिलीप के साथ काम कर चुके कई साथियों ने भी उन्हें अपनी शुभकामनाएं देने के साथ ही कई इंटरेस्टिंग किस्से भी सुनाए हैं। पेश है बातचीत के कुछ अंश...

    अरुणा ईरानी: बॉलीवुड में एंट्री का टिकट दिलीप जी ने ही दिया था


    हिंदी सिनेमा में आने वाला हर कलाकार जानता है कि दिलीप कुमार के सामने एक्टिंग भी खुद को बौना महसूस करने लगती है... उन्होंने काफी कम, पर बहुत ही अद्भुत काम कर दिखाया है! मैं स्वयं को सौभाग्यशाली कहूंगी, जो साथ में एकमात्र फिल्म ‘गंगा जमुना’ करने के बावजूद मुझे आज भी ‘दिलीप कुमार की खोज’ के तौर पर पहचाना जाता है... सचमुच, यह मेरे लिए सबसे बड़ा गौरव है!!


    हमारा परिवार उन दिनों ताड़देव में रहता था, जहां से पढ़ने के लिए मैं रोजाना चर्नी रोड स्थित अपने स्कूल जाती थी। इसी स्कूल में एक दिन वह एजेंट आ गया, जिसे दिलाप साहब ने अपनी नई फिल्म ‘गंगा जमुना’ की खातिर तमाम बच्चे ढूंढ़ने का जिम्मा दे रखा था। बेशक, मेरे पिता की अपनी ड्रामा कंपनी थी। मुझ पर उनकी तरफ से कोई बंदिश भी नहीं थी, मगर वास्तव में हम बच्चों को फिल्म अथवा फिल्म के ऑडिशन का मतलब नहीं मालूम था... हम तो केवल इस लालच में चले गए थे कि वहां (ऑडिशन में) पीने के लिए कोका कोला मिलेगा!

    खैर, ‘महबूब’ स्टूडियो में उस दिन करीब 500 बच्चे पहुंचे थे। लेकिन जब मैंने यह देखा कि यहां तो उम्मीद से भी ज्यादा खाने-पीने की चीजें रखी हैं तो मैं खाने में ही जुट गई... मैं जमकर खाए जा रही थी कि अचानक किसी ने आवाज दी- ‘ये लड़की... ये लड़की।’ मैंने मुड़कर देखा तो वह शख्स मेरी ही ओर मुखातिब था- ‘हां, तुमको ही बुला रहा हूं।’ यह कोई और नहीं, अभिनेता के साथ-साथ फिल्म ‘गंगा जमुना’ के निर्माता दिलीप कुमार साहब थे। मैं उनके पास गई तो वे सीधे मुद्दे पर आ गए- ‘फिल्म में काम करोगी?’

    मैंने ‘हां’ में सिर हिलाया तो एक के बाद एक... कई सवाल पूछ डाले- ‘डायलॉग बोलोगी? डरोगी तो नहीं?’ मुझे न तो संवाद के मायने पता थे, न ही मेरे लिए तब दिलीप साहब की शख्सियत का कोई डर था! जी हां, यह सच है कि आज की बात हो तो मुझे डर लगेगा... मुझे झिझक होगी कि ‘एक्टिंग के इंस्टीट्यूट’ के समक्ष आखिर मैं क्या बोलूं? लेकिन 9 साल की उम्र में तब मुझे डर या उनके रुतबे की समझ नहीं थी। इसलिए मैं खाने-पीने की अच्छी-अच्छी चीजों के चक्कर में ‘हां-ना’ करती गई... और मेरी किस्मत देखिए, फिल्म के लिए फाइनल हुए बच्चों में से एक मैं भी थी!


    मैं गलत भी नहीं थी... इगतपुरी में हम तकरीबन 25 दिनों तक साथ में रहे, जहां इस फिल्म की शूटिंग हो रही थी। दिलीप साहब चूंकि खुद भी खाने के बेहद शौकीन रहे हैं... अपनी यूनिट के लिए भी उन्होंने स्वादिष्ट व्यंजनों का भरपूर इंतजाम कर रखा था, लिहाजा हमें वाकई तरह-तरह की बहुत-सी चीजें खाने को मिलती थीं। हम इगतपुरी में जब तक रहे, दिलीप साहब का सबसे ज्यादा स्नेह मुझे ही मिला। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि पैकअप के बाद वे चेयर पर जब निढाल होकर आराम करने लगते, मैं पास जाकर अवश्य पूछती- क्या हुआ? वे केवल इतना कहते- ‘थक गया हूं।’ बस, मैं उनका सिर दबाने लगती थी।

    मुझे लगता है कि यह सिलसिला पूरे शेड्यूल तक चला होगा, जिसके चलते मैं दिलीप साहब की ‘लाडली बच्ची’ हो गई थी! यह मेरा दुर्भाग्य है कि मुझे दिलीप साहब के साथ दोबारा काम करने का मौका नहीं मिला... मैं खूब काम कर रही थी, फिर भी हमें साथ में कोई फिल्म ऑफर नहीं हुई। कोई बात नहीं... आज कुछ अन्य बातों-मुलाकातों का जिक्र कर लेती हूं, जैसे- दिलीप साहब जब ‘कलिंगा’ बना रहे थे, तब हम ‘सेंटॉर’ होटल के हेल्थ क्लब में मिले थे। इससे पहले कि मैं उन्हें देख पाती, वे मेरे पास खुद आकर बोले- ‘बेटा, तुम बहुत अच्छा काम कर रही हो... ऐसे ही मन लगाकर करती रहना!’

    इसी तरह मेरे पति कुक्कू (कोहली) जी उस वक्त दिलीप साहब को लेकर फिल्म बना रहे थे: ‘असर- द इंपैक्ट’। अजय देवगन-प्रियंका चोपड़ा स्टारर इस फिल्म के निर्माता दिनेश पटेल थे, जबकि निर्देशन की बागडोर संभाल रहे कुक्कू जी की ‘असर’ में दिलीप साहब को एक अहम भूमिका निभानी थी। कुक्कू जी एक दिन जब दिलीप साहब से मिलने उनके बंगले पर जा रहे थे, मैं भी यह सोचकर उनके साथ चली गई कि दिलीप साहब ही तो मेरे सब कुछ हैं। वे मेरे न सिर्फ मेंटॉर हैं... मुझ अनगढ़ को नृत्य, अभिनय आदि सिखाकर पारंगत बनाया, बल्कि मेरी बॉलीवुड में एंट्री का टिकट भी तो मुझे उन्होंने ही दिया था न! वहां कुक्कू जी की मीटिंग हो गई तो हमने साथ में लंच किया।

    हम खाना खाते हुए जब बात कर रहे थे, तब ऐसा कभी नहीं लगा कि वे कुछ भूले भी हैं। अतीत की सारी बातें उनके जेहन में घूम रही थीं। इसी टेबल पर दिलीप साहब को जब यह मालूम पड़ा कि कुक्कू जी और मैं, वास्तव में पति-पत्नी हैं... उन्होंने हमें ढेर सारे आशीर्वाद से नवाज दिया था!
    बहरहाल, मैं अभी तक की बात करूं तो हमारी आखिरी मुलाकात को भी 15-16 साल गुजर गए हैं... हम तब मिले थे, जब सायरा (बानो) जी ने मुझे अपने टॉक शो (‘दुनिया के सितारे’) में बुलाया था। वहां दिलीप साहब भी मौजूद थे तो जैसे ही मेरी नज़र दिलीप साहब पर पड़ी, मैंने फौरन जाकर उनके पैर छुए... यह संस्कार आपको हमारे ही जमाने के लोगों में दिखेगा, क्योंकि तब रिश्तों को बहुत अहमियत दी जाती थी! लेकिन मैं तब बहुत दुखी हुई, जब मैंने अहसास किया कि वे मुझे पहचान नहीं पा रहे हैं!! आखिर उन्हें सायरा जी ने बताया- ‘अरुणा...।’ इस पर दिलीप साहब का मंद स्वर में पूछा गया अपनेपन का वह सवाल मेरे कानों में आज भी सुकून दे जाता है- ‘कैसी हो बेटा?’ अब तो एक अर्सा हो गया, मैं दिलीप साहब से मिल भी नहीं पाई हूं। सुना है कि दिलीप साहब की सेहत उनका साथ नहीं दे रही है... मैं उनके अच्छे स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती हूं!

    अगली स्लाइड्स में पढ़ेंं 5 और सेलेब्स के बारे में...

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    तबस्सुम

    सेट पर मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे दिलीप साहब

    दिलीप साहब से मेरी पहली मुलाकात हिंदुस्तान की क्लासिक फिल्म ‘जोगन’ के सेट पर हुई थी। इस फिल्म के निर्देशक किदार शर्मा जी थे, जिन्हें निर्देशन के अलावा फिल्म निर्माण-लेखन आदि में भी खूब शोहरत मिली। यही नहीं, इन्हीं शर्मा जी ने राज कपूर और मधुबाला से लेकर राजेन्द्र कुमार व गीता बाली तक को इंडस्ट्री में ब्रेक दिया था! खैर, ‘जोगन’ का यह सीन कुछ ऐसा था कि नरगिस घर छोड़ते समय मंगू यानी मुझे अपनी माला दे जाती हैं... यह कहते हुए कि इसे हाथ में लेकर भगवान को याद करोगी तो शांति मिलेगी। लेकिन मैं प्रभु के बजाय ‘पलभू’ बोल रही थी- ‘ओम पलभू शांति... ओम पलभू शांति!’ कई रीटेक के चलते शर्मा जी झल्ला गए... वे डांटने के साथ-साथ मुझे समझा भी रहे थे, पर मैं ‘र’ नहीं बोल पाई तो रोने लगी- ‘अब हम मल जाएंगे!’ बस, दिलीप साहब फौरन आगे आए और कहने लगे- ‘मरना तो इन्हें चाहिए, जो इतनी छोटी बच्ची से ‘र’ बुलवाने पर आमादा हैं... आप ‘पलभू’ ही कहो, वही अच्छा लगेगा!’ सचमुच, दिलीप साहब ने अपने व्यवहार से जता दिया था कि दोस्ती के लिए हमउम्र होना जरूरी नहीं... अब सेट पर वही मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे।

    असल में हमारी उम्र में 22 सालों का अंतर है और इसीलिए मैं शुरू-शुरू में उन्हें दिलीप अंकल ही कहती थी, मगर धीरे-धीरे भाई-बहन और फिर दोस्त बन गए। इस नए रिश्ते के सृजन का श्रेय मैं दिलीप साहब को ही दूंगी... देखिए न, ‘जोगन’ के सेट पर जब मैं कपड़े धो रही थी, तब उन्होंने आकर मुझे अपनी गोद में उठा लिया। मैंने कहा- ‘साध्वी जी के कपड़े हैं, मैले हो जाएंगे!’ दिलीप साहब हंस पड़े- ‘तुम बड़ी बी हो... दीदी अम्मा हो मेरी। इतनी छोटी-सी उम्र (छह वर्ष) में तुम कितनी बड़ी-बड़ी बातें करती हो!’ अब तक मैं दिलीप साहब के सामने काफी खुल चुकी थी। मेरी शेर-ओ-शायरी की वे खूब तारीफ करते, मगर एक दिन मुसीबत हो गई... हुआ क्या कि दिलीप साहब की तरह राज (कपूर) साहब भी मुझसे अक्सर पूछते रहते- ‘बेबी, ये बता कि तेरा फेवरिट हीरो कौन है?’

    अब तक मैं बड़ी मासूमियत से उसी का नाम ले लेती, जो मेरे सामने होता था। लेकिन ‘सेंट्रल’ स्टूडियो में एक दिन इन दोनों साहब ने मुझे पकड़ लिया... दिलीप साहब ने अपने बालों में कंघी करते हुए वही सवाल दोहराया कि ‘तेरा फेवरिट हीरो कौन है- मैं कि राज?’ मुझे सच में दिलीप साहब बहुत अच्छे लगते थे... माथे पर की जुल्फें उनके आकर्षण में चार चांद लगा देती थीं! सो, ‘आप मुझे ज्यादा अच्छे लगते हैं’ कहने के लिए मैंने ज्यों ही मुंह खोला, राज साहब ने मेरे मुंह में चॉकलेट डाल दिया... और मैं भी पलट गई- ‘राज अंकल ज्यादा अच्छे लगते हैं!’
    बेशक, दिलीप साहब की स्टारडम के बारे में बहुत कुछ लिखा और कहा गया है। मैंने जाने कितनों को उन्हें ‘एक्टिंग का इंस्टीट्यूट’ कहते सुना है, पर मैं खुद को खुशनसीब कहूंगी कि मैंने दिलीप साहब का अलग रूप भी देखा है...

    यहां बताना जरूरी समझती हूं कि उम्र में बड़ा अंतर होने के बावजूद अब मैं ही हूं, जो दिलीप साहब के अलावा उनके दौर की इकलौती जिंदा शख्सियत होगी। जी हां, ’40 के दशक में करियर की शुरुआत करने वाले हम दो ही बचे हैं... बाकी सब भगवान को प्यारे हो गए भाई! बहरहाल, मैं दिलीप साहब के इंसानी रूप की बात कर रही थी। वे पांच वक्त की नमाज ही नहीं पढ़ते थे, मुंबई के तमाम अनाथालयों की ज़कात और खैरात भी बांटते आए हैं। मुझे पता है कि ईद के दिन सुबह-सवेरे उठकर वे नमाज पढ़ते, फिर अपने भाई-बहनों को ईदी से निहाल कर देते थे। इसमें दो राय नहीं कि दिलीप साहब खाने-पीने के बेहद शौकीन थे, पर सब कुछ बड़ी सादगी के साथ... सादगी भी ऐसी कि डाइनिंग टेबल की बात छोड़िए, जी में आ जाए तो सीढ़ियों पर बैठकर कभी बाजरे की रोटी और पुदीने की चटनी खा लेते थे तो हरी धनिया की चटनी के साथ खिचड़ी भी उन्हें बहुत पसंद आती थी!

    मैंने दिलीप साहब के साथ ‘जोगन’, ‘दीदार’ और ‘मुगल-ए-आजम’ सरीखी कामयाब फिल्में ही नहीं कीं, कई सारे लाइव शोज भी किए... यहां तक कि शोज के सिलसिले में तो कई-कई महीने हम विदेशी धरती पर साथ-साथ रहे। इसके बावजूद मुझे ‘मुगल-ए-आजम’ के दौरान की वे ईद वाली दावतें बखूबी याद हैं, जो बारी-बारी से किसी न किसी हस्ती के घर पर रखी जाती थीं। दरअसल, सबको मालूम है कि इस फिल्म के बनने में कई साल लग गए और इससे जुड़े भी कौन-कौन थे... के. आसिफ, नौशाद साहब, मो. रफी, जॉनी वाकर, खुद दिलीप साहब और हसीन-तरीन-महजबीन मधुबाला! जाहिर है कि इन सबके बीच नन्हीं-सी बेबी तबस्सुम को भी न्यौता मिलता और मेरी ‘बदमाशियों’ को वे सभी एप्रीसिएट भी करते थे। यहां सबसे पहले खुशबुओं का छिड़काव किया जाता, फिर खीर-कुरमा की बारी आती। आखिर में रात का खाना खाने के बाद कव्वाली का दौर शुरू होता, जो आधी रात के बाद तक या फिर किसी-किसी साल तो सुबह तक चलता रहता था!


    आज हम ज्यादा मिल नहीं पाते... बातचीत भी नहीं हो पाती, क्योंकि ऊपरवाले ने उनकी सेहत के साथ कुछ ऐसा मजाक कर दिया है कि अपनी यादों के खजाने का एक बड़ा हिस्सा वे गंवा चुके हैं। लेकिन मुझे तो याद है न, जब वे एक अवॉर्ड फंक्शन में व्हील चेयर पर आए थे। मैं दिलीप साहब के पास मंच पर गई तो अपनी चिर-परिचित अदा के साथ उन्होंने धीरे से कहा था- ‘मेरे बच्चे, मेरे लिए तेरी चहकती हुई आवाज किसी भी अवॉर्ड-रिवॉर्ड से ज्यादा खुशियां देती है!’ अभी की बात करूं तो आखिरी बार मैं दिलीप साहब से तब मिली थी, जब वे बी. आर. चोपड़ा साहब के अंतिम संस्कार में शामिल होकर लौट रहे थे। सच कहूं तो ‘पवन हंस’ के निकट वाले श्मशान में हुई वह भेंट एक-दूसरे के प्रति हमारे लगाव का अद्भुत प्रमाण है। असल में अब तक वे अपनी याददाश्त खो चुके थे... मुझे पता था कि वे किसी को पहचानते नहीं हैं। फिर भी मैंने जैसे ही उनके करीब जाकर उनका हाथ छुआ, दिलीप साहब बुदबुदाने लगे- ‘त ब स्सु म... मेरी बेबी तबस्सुम!’

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    रमेश सिप्पी
    ‘शक्ति’ के बाद फिर कभी संयोग नहीं बन पाया
    यूसुफ साहब के अतीत में झांकना कुछ ऐसा ही है, मानो किसी चक्रवर्ती राजा के सामने उसके साम्राज्य की सीमा का बखान करना हो... वे अद्वितीय अभिनेता रहे हैं! लेकिन चूंकि हमने साथ में एक ही फिल्म ‘शक्ति’ की, इसलिए मेरे पास बताने को ज्यादा कुछ नहीं है... जो कुछ है भी, उसे मैं पिछले 35-36 सालों में सैकड़ों बार दोहरा चुका हूं। हां, ‘शक्ति’ की रूपरेखा कैसे बनी? आज मैं इस पर फोकस जरूर करूंगा...
    फिल्मी परिवार से ताल्लुक रखने के कारण जिस तरह मैं बचपन से निर्देशक बनना चाह रहा था, उसी प्रकार निर्देशन में कामयाब होने के बाद से ही मैं सपना देखने लगा था कि किसी फिल्म में यूसुफ साहब को निर्देशित करूं! संयोग तब बना, जब ‘शोले’ की सुपर सफलता और ‘शान’ की अप्रत्याशित पराजय ने मुझे दुविधा में डाल दिया था... एक निर्देशक के तौर पर मेरी विश्वसनीयता कमजोर नहीं पड़ी थी, बावजूद इसके मैं असमंजस के उस दौर में कई पटकथाएं अस्वीकार कर चुका था। दरअसल, अब मुझे खुद को फिर से प्रमाणित करने की आवश्यकता थी। मैंने इसी दौर में जब अपने पुराने सपने को सच करने की ठानी, तब सबसे पहले सलीम-जावेद से चर्चा की... आखिर वह मेरी पसंदीदा लेखक जोड़ी थी, लिहाजा उन्होंने ही सुझाया था- ‘साउथ में शिवाजी गणेशन ने एक (तमिल) फिल्म की है- ‘थंगा पथक्कम’ (1974)। इसी के हिंदी रूपांतरण में दिलीप साहब से यदि मुख्य भूमिका कराई जाए तो आपका सपना हकीकत में बदल सकता है!’ मैंने अपनी रजामंदी दे दी तो ‘थंगा...’ को हिंदी में बनाने का अधिकार खरीद लिया गया... सलीम-जावेद ने बॉलीवुड की जरूरत को ध्यान में रखते हुए पटकथा में फेरबदल भी कर दिया।
    इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय सिनेमा जगत की दो पीढ़ियों के दो सुपर स्टारों को एक साथ लाना आसान काम नहीं था, मगर इस असंभव को संभव कर दिखाने का श्रेय भी मैं सलीम-जावेद की जोड़ी को दूंगा! असल में ‘थंगा...’ में शिवाजी ने शायद बाप-बेटे की दोहरी भूमिका निभाई थी, जबकि ‘शक्ति’ के लिए यूसुफ साहब के साथ अमिताभ बच्चन को राजी करने का जिम्मा मेरे लेखकद्वय ने ही उठाया था। जी हां, मेरे पिताजी (जी. पी. सिप्पी) के साथ यूसुफ साहब की अच्छी दोस्ती थी। मेरे घर उनका न सिर्फ आना-जाना था, बल्कि वे आते तो खाने-पीने का दौर भी चलता था... अमिताभ से तो अब तक स्वयं मेरी भी खूब जमने लगी थी। फिर भी इनमें से किसी को मनाने का अवसर मुझे इसलिए नहीं मिला, क्योंकि उस समय किसी सुपर स्टार से भी ज्यादा अहम रुतबा रखने वाले सलीम-जावेद ने मेरे लिए मोर्चा खुद संभाल रखा था! यूसुफ साहब से मुलाकात करने के बाद उन्होंने ही यह कहते हुए ‘शक्ति’ की पटकथा सौंपी थी कि- ‘आपको पसंद आए, तभी ‘हां’ कहिएगा... क्योंकि अब इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा!’ इसमें दो राय नहीं कि यूसुफ साहब की बुलंदी के सामने यह शर्त रखना भी किसी हिमाकत से कम नहीं थी, मगर सच कहूं तो अपने शब्दों द्वारा उन्होंने मेरा ही डर भगाने का प्रयास किया था! जी हां, यूसुफ साहब का दौर तब ढलान पर जरूर था... सलीम-जावेद को अपनी पटकथा पर भरोसा भी था, पर यूसुफ साहब के बारे में सुनी-सुनाई बातों ने मुझे संशय में डाल रखा था, जैसे कि वे फिल्म में दखल बहुत देते हैं... दखल यूं कि बदलाव करते-करवाते आखिर में वे उसे अपने हिसाब से बनवा डालते हैं! सो, सलीम-जावेद ने अप्रत्यक्ष रूप से बता दिया था कि सेट पर केवल डायरेक्टर की चलेगी।
    आखिर सलीम-जावेद की बात मानते हुए यूसुफ साहब ने हामी भर दी। लेकिन वास्तविकता कहूं तो अपने इसी डर के चलते यह फिल्म मैंने प्रोड्यूस नहीं की, बल्कि मुशीर (आलम)-(मोहम्मद) रियाज से करवाई थी। वैसे यूसुफ साहब ने शूटिंग के दरम्यान मेरा हौसला खूब बढ़ाया... वे अक्सर जताते थे कि अमिताभ को अगर उनके साथ काम करने का गर्व है तो वे भी अमिताभ के साथ काम करने में खुशी महसूस कर रहे हैं! यही नहीं, हमने शूटिंग का एक शेड्यूल मुंबई के बाद ऊटी में पूरा किया और सेट पर माहौल भी हमेशा खुशनुमा रहा... यह बात अलग है कि बेस्ट एक्टर का ‘फिल्मफेयर’ अवॉर्ड जब यूसुफ साहब को मिला तो अमिताभ नाराज हो गए थे! असल में इसी फिल्म के लिए अमिताभ भी नॉमिनेटेड थे, मगर ट्रॉफी यूसुफ साहब को मिली थी... इस श्रेणी के तहत यूसुफ साहब की यह 8वीं और अंतिम ट्रॉफी थी! अब मेरे अंदर का ‘भय’ दूर हो चुका था और मैं यूसुफ साहब को दोबारा कास्ट भी करना चाहता था, मगर फिर कभी संयोग ही नहीं बन पाया... ‘शक्ति’ बनाने के बाद मुझे ऐसी कोई स्क्रिप्ट नहीं मिली कि मैं यूसुफ साहब को अप्रोच करने जा
    पाऊं!
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    फरीदा जलाल
    असल ज़िंदगी में सगी बहन जैसा प्यार दिया
    दिलीप साहब... मेरे लिए बड़े भाई ही नहीं, पिता-तुल्य भी हैं! मैं जब नई थी, तभी मुझे ‘गोपी’ मिल गई थी। यह मेरी शायद तीसरी-चौथी फिल्म रही होगी। सायरा बानो जी से भी मैं इसी फिल्म के दौरान मिली थी, जो सालों से मेरी बड़ी बहन जैसी हैं। हमारा रिश्ता आज भी कायम है। ईद पर उनके घर जाना तो आम बात है... मैं दिलीप साहब को ईद की मुबारकबाद देकर जब उनका हाथ चूमती हूं तो बदले में वे मुझे आशीर्वाद जरूर देते हैं। लेकिन वैसे भी मेरा जब जी चाहता है, मैं सायरा जी को फोन करके दिलीप साहब से मिलने पहुंच जाती हूं... फोन इसलिए करके जाती हूं, ताकि डॉक्टर वगैरह आए हों तो कोई खलल न पड़े। सच कहूं तो फिल्मी दुनिया में ऐसा कोई शख्स नहीं होगा, जिसके पास दिलीप साहब के लिए समय न हो... अगर कोई दिलीप साहब की खातिर टाल-म-टोल करता है तो मैं कहूंगी कि उसे तो इस इंडस्ट्री में रहने का ही हक़ नहीं है! इसलिए अभी 11 दिसंबर को दिलीप साहब जब अपना 95वां जन्मदिन मनाने जा रहे हैं, मैं अतीत के हमारे दिनों को याद करना चाहूंगी...
    हमारी पहली मुलाकात ‘कारदार’ स्टूडियो में हुई थी... दिलीप साहब वहां फिल्म ‘दिल दिया दर्द लिया’ की शूटिंग कर रहे थे, जबकि मैं ‘फिल्मफेयर’ की प्रतिभा-खोज प्रतियोगिता का टेस्ट देकर बाहर निकल रही थी। मैं इनकी बचपन से फैन रही हूं... ये ही मेरे फेवरिट एक्टर थे, लिहाजा अपने आगे-पीछे कई लोगों के साथ चल रहे दिलीप साहब को अचानक खुद के सामने देखकर मैं हक्की-बक्की रह गई! जी हां, उन दिनों दिलीप साहब जब और जहां कहीं चलते थे तो दुनिया उनके साथ चलती थी!! मुझ पर नज़र पड़ते ही उन्होंने बड़े अनोखे अंदाज में पूछा था- ‘क्या नाम है?’ मैंने हड़बड़ा कर जैसे ही कहा- ‘फरीदा’, वे अपनापन दिखाते हुए बोल पड़े- ‘मेरी भी एक बहन का नाम फरीदा है।’ इतना कहकर वे आगे बढ़ गए, पर आप यकीन नहीं करेंगे कि खुशी के मारे उस पूरी रात मैं सो नहीं पाई थी!
    अब तक मैं ‘आराधना’ में राजेश खन्ना की हीरोइन बनकर शूटिंग भी करने लगी थी, तभी फिल्म ‘गोपी’ में दिलीप साहब की बहन के रोल का ऑफर आ गया! जाहिर है, यह मौका न तो मुझे गंवाना था और न ही मैंने गंवाया... मैं अपने प्रिय अभिनेता की बहन बन गई। आप गौर करें तो ‘गोपी’ में सब एक से बढ़कर एक थे- दिलीप साहब के अपोजिट सायरा जी थीं... माशा अल्लाह, बला की खूबसूरत! फिर ओम प्रकाश जी के साथ निरुपा रॉय, प्राण साहब और भाई जॉनी वाकर... (हंसने लगीं) बस, मैं ही नई-नवेली चुहिया थी! फिर भी, मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। अभिनय ही नहीं, अदाकार तो दिलीप साहब से बेहतर कोई और हुआ ही नहीं! मैं यहां पर भाई जावेद अख्तर जी की कही उन पंक्तियों को दोहराना चाहती हूं। वे शायर हैं... उनके पास लफ्जों की कमी नहीं तो हमारे में वह बाजीगरी नहीं है। सचमुच, दिलीप साहब के लिए उन्होंने क्या खूब कहा है- ‘हम समंदर से कैसे कहें; उसकी लहरें कितनी हैं, हम सूरज से क्या कहें; उसकी किरणें कितनी हैं...’! बहरहाल, मुझे यह दिलीप साहब ने ही सिखाया था कि करियर में सब्र कैसे रखा जाता है... हमेशा कम, लेकिन अच्छी फिल्म कैसे की जाती है? हां, केवल पैसे की खातिर तो फिल्म कभी नहीं करनी चाहिए!
    मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि फिल्म इंडस्ट्री ने मेरे साथ नाइंसाफी की। मैं अक्सर इस बात के लिए अपना गुस्सा जाहिर भी करती आई हूं कि ‘आराधना’ की नायिका होने के बावजूद मुझे ‘बहन’ की भूमिका तक सीमित कर दिया गया... ‘गोपी’ और ‘आराधना’ आगे-पीछे ही रिलीज हुई थीं, मगर यहां के दस्तूर ने मुझे पर्दे की स्थायी बहन क्यों बना दिया? लेकिन सच मानिए, मेरे मन में दिलीप साहब के लिए कोई द्वेष नहीं है... आखिर मुझे असल ज़िंदगी में भी उन्होंने सगी बहन जैसा प्यार जो दिया। मुझे लगता है कि वे तो चाहते रहे होंगे कि फरीदा हमेशा बहन ही बनी रहे... (फिर हंसने लगीं) मैं कोई ‘दूसरा रास्ता’ न पकड़ लूं! संभवत: मेरी तसल्ली के लिए ही वे कहते भी रहे हैं- ‘देख फरीदा, पहले तू सितारों की बहन बनी तो फिर अगली पीढ़ी के स्टारों ने तुझे मां कहकर पुकारा... यह कितने गर्व की बात है कि अब के कलाकारों की तू दादी कहलाती है!’ ऊपरवाला उन्हें अच्छी सेहत और लंबी उम्र दे...!
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    सुभाष घई
    इमेज से अलग मिले दिलीप कुमार
    दिलीप कुमार साहब के साथ मैंने तीन फिल्में कीं- ‘विधाता’, ‘कर्मा’ और ‘सौदागर’। इन तीनों ही फिल्मों के दौरान कुछ न कुछ ऐसा जरूर हुआ, जब मुझे एक इंसान के रूप में दिलीप साहब को करीब से जानने-समझने का अवसर मिला। पहला मौका ‘विधाता’ के कारण मिला, जब उन्हें स्क्रिप्ट सुनाने की खातिर मैं खंडाला गया था। इससे पहले कई लोग मुझे डरा चुके थे कि यह पिक्चर बनने में कम से कम तीन साल लग जाएंगे, क्योंकि शूटिंग में दखलअंदाजी के अलावा वे कई सीन खुद ही डायरेक्ट करेंगे। सो, जब मीटिंग खत्म हुई और दिलीप साहब की ओर से स्क्रिप्ट पसंद कर लेने का संकेत मिला, तब मैंने बड़े अदब के साथ पूछ लिया- ‘सर, मैं आपका बचपन से फैन हूं। लेकिन सुनी-सुनाई बातों के चलते मन में एक डर भी है... मैं आपसे जानना चाहता हूं कि यह फिल्म डायरेक्ट कौन करेगा?’ दिलीप साहब के एक हाथ में बिस्किट, जबकि वे अपने दूसरे हाथ में चाय का कप पकड़े हुए थे। मेरा सवाल सुनकर पहले तो उन्होंने मेरी ओर देखा, फिर अपने चिर-परिचत अंदाज में एक पॉज लेकर बोले- ‘सलाह-मशविरा का हक तो हमारा भी रहेगा न?’ जब मैंने कहा कि इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी, तब उन्होंने मुझे भी आश्वस्त कर दिया- ‘फिक्र मत करो, क्योंकि अंतिम निर्णय का अधिकार केवल निर्देशक का होगा!’ सचमुच, इसके बाद शूटिंग शुरू हुई तो शम्मी कपूर सहित सारे को-आर्टिस्ट हैरान थे कि दिलीप साहब आखिर मेरी हर बात मान कैसे ले रहे हैं! इसका भी जवाब दिलीप साहब ने ही दिया था- ‘देखो, डायरेक्टर कुशल हो तो एक्टर की चिंता खुद-ब-खुद कम हो जाती है!’
    इसी तरह ‘विधाता’ की ही शूटिंग के लिए जब हम गोवा गए थे, तब भी दिलीप साहब ने अपने बड़प्पन से गजब की इंसानियत दिखाई थी! असल में हम वहां एयरपोर्ट से 24-25 किमी. दूर शूटिंग कर रहे थे। मुंबई से दिलीप साहब की 12 बजे की फ्लाइट थी। हमने उन्हें लोकेशन तक लाने के लिए जो गाड़ी भेजी थी, वह जब तक एयरपोर्ट पहुंचती, दिलीप साहब की फ्लाइट गोवा में लैंड हो चुकी थी... शायद उस दिन वह अपने तय समय से थोड़ा पहले आ गई थी। इसलिए जब हमारे ड्राइवर ने सूचना दी कि फ्लाइट तो कब की आ गई, मगर दिलीप साहब अब तक बाहर नहीं आए हैं... हम सब काफी परेशान हो गए। लेकिन यह क्या, मैं देखता हूं कि दिलीप साहब एक टैक्सी से उतर कर किराया चुका रहे हैं! मैं लगभग हांफते हुए उनके पास गया... कहने लगा- ‘आए’म सॉरी सर! हमने गाड़ी तो भेजी थी... आप चाहें तो होटल में जाकर आराम कर सकते हैं।’ सच, दिलीप साहब की संभावित नाराजगी के चलते मैं बहुत नर्वस था। लेकिन उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए आहिस्ता से कहा- ‘सुभाष, मैं सालों से पिक्चर कर रहा हूं... प्रोडक्शन वालों से कभी-कभार मिस्टेक हो जाती है। तुम इत्मीनान से शूटिंग करो... मैं अपने कपड़े बदल कर फौरन आता हूं।’ आप यकीन नहीं करेंगे कि दिलीप साहब के चेहरे पर रत्ती भर गुस्सा नहीं था! इस फिल्म के दौरान दिलीप साहब ने मेरा जो सहयोग किया... मुझे ऐसा प्यार और आशीर्वाद दिया कि फिल्म के आखिरी सीन को शूट करने तक हमारे बीच दोस्ती हो चुकी थी! यह फिल्म रिलीज हुई... पहले हिट की खबर आई, फिर यह भरोसा भी दिखने लगा कि सुपरहिट हो जाएगी। लेकिन जिन दिलीप साहब के बारे में सुन रखा था कि फिल्म के फ्लॉप होने पर फोन भले ही न करें, कामयाबी के संकेत मिल जाने के बाद वे फोन जरूर करते हैं... वे हौसला बढ़ाते हुए पूछते भी हैं- ‘पार्टी कब रख रहे हो?’ आखिर तीन दिन गुजर जाने के बावजूद जब उनकी तरफ से फोन नहीं आया, तब मैंने ही फोन करके उन्हें जानकारी दी- ‘सर, अपनी फिल्म तो सुपरहिट हो गई है!’ इस पर जानते हैं कि दिलीप साहब का क्या कहना था- ‘हां, मैंने भी सुना है... एक गलती तो खुदा भी माफ कर देता है!’ जाहिर है कि दिलीप साहब का इशारा मेरी ओर था... वे कहना चाह रहे थे कि हिट-फ्लॉप के बीच एक मामूली-सी लकीर होती है। किसी फिल्म के प्रदर्शन से पूर्व कोई दावा नहीं कर सकता कि परिणाम क्या होगा, लिहाजा असफलता के बाद न तो हमें बहुत गंभीर हो जाना चाहिए और न ही सफलता मिल जाने का मतलब यह हुआ कि हम हवा में उड़ने लगें!
    अब ‘कर्मा’ की बात, जिसमें मुख्य खलनायक की भूमिका में अनुपम खेर को लिया गया था। मैं पहले अमरीश पुरी को कास्ट करना चाहता था... मैने किसी से कहा तो नहीं था, पर मन ही मन में उन्हें लेने की सोच जरूर रहा था। जब मैंने यह बात दिलीप साहब से शेयर की, तब उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसलिए शूटिंग के दिन मैं दिलीप साहब का रिएक्शन देखना चाहता था। मैं यह जानने के लिए उत्सुक था कि सॉफ्ट चेहरे वाले एक नए लड़के से डॉ. डैंग सरीखा खूंखार किरदार करवाने पर उनकी टिप्पणी आखिर क्या होती है?... और दो शॉट होने पर दिलीप साहब ने आकर मुझसे कहा- ‘ये कास्टिंग तुमने बहुत अच्छी की है... यह लड़का मुझसे भी ऊपर जाएगा!’ जब यही बात मैंने अनुपम को बताई तो स्वाभाविक है कि अपने बारे में दिलीप साहब से यह कॉम्प्लीमेंट पाकर वे बहुत खुश हुए थे!
    आखिर में ‘सौदागर’ के दरम्यान के दो प्रसंग बताना चाहूंगा, जो दिलीप साहब और राज (कुमार) साहब के बीच पूरे हुए थे। दरअसल, फिल्मी दुनिया के कई जाने-माने लोगों ने मुझे पहले ही डरा दिया था। एक स्वर में सबका यही कहना था कि इन दोनों दिग्गजों को साथ लाकर मैंने बहुत बड़ी भूल की है। अगर इनका ईगो टकरा गया तो फिल्म अटक जाएगी। मैं ऐसी स्थिति में इंडस्ट्री से बाहर भी जा सकता हूं। खैर, राज साहब को पहले से मालूम नहीं था कि दिलीप साहब के संवाद भोजपुरी में हैं, लिहाजा कुल्लू-मनाली में दिलीप साहब के मुंह से अचानक भोजपुरी सुनकर वे नर्वस होने लगे थे! जब मौका मिला तो मुझसे ज़िद करने लगे- ‘मैं भी यही लैंग्वेज बोलूंगा।’ मैंने बहुत समझाया कि दिलीप साहब ठहरे गांव के तो आप हैं शहराती, मगर वे नहीं माने- ‘आखिर मैं भी तो इसी गांव का हूं न!’ इस पर हमारी काफी बहस हुई, पर वे तो अड़ गए थे... इसलिए कुछ फुटकर दृश्यों की शूटिंग करके मैंने पैकअप कर दिया। लेकिन जब हम होटल जाने लगे, तब मैंने जाकर राज साहब से कहा- ‘अगर आपको फिल्म नहीं करनी है तो मत करिए। लेकिन एक डायरेक्टर होने के नाते मैं आपको यह विश्वास जरूर दिलाना चाहूंगा कि फिल्म के आखिर तक आप बिल्कुल बराबरी पर खड़े रहेंगे... मैं अपने काम से बेईमानी नहीं करूंगा।’ मैंने यह कहने को तो कह दिया था, किंतु उम्मीद कम ही थी कि वे अगले दिन शूटिंग पर आएंगे... फिर भी, उम्मीद से अलग वे अगली सुबह 8 बजे सेट पर मौजूद मिले! राज साहब की कल की ज़िद वाली बात जब मैंने दिलीप साहब को बताई तो कहने लगे- ‘... तो उनसे भी भोजपुरी ही बुलवा लीजिए न, दिक्कत क्या है?’ ‘लेकिन आपके कहने पर मैं ऐसा थोड़ी करूंगा’- मैंने स्पष्ट कर दिया। इसके बाद जब पहला शॉट ‘ओके’ हुआ तो दिलीप साहब ही थे, जो राज साहब के लिए सबसे पहले तालियां बजा रहे थे... राज साहब को उन्होंने मुबारकबाद भी दी!
    बहरहाल, इसका मतलब यह नहीं कि दोनों के बीच की ठसक खत्म हो गई... दिलीप साहब के किसी सामान्य इंसान से व्यवहार ने मुझे उस दिन आश्चर्यचकित कर दिया, जब मैंने उनसे पहली और शायद आखिरी बार ‘झूठ’ बोला था! असल में जब हम ‘इमली का बूटा...’ गाना शूट कर रहे थे, तब राज साहब ने मेरे कान में कहा- ‘देख रहे हो न... वह (दिलीप कुमार) नाच नहीं पा रहा है!’ अब दिलीप साहब ने मुझे अपने करीब बुलाकर पूछा, ‘वह (राजकुमार) क्या कह रहा है?’ मैंने सच को फौरन छुपा लिया- ‘यही कि आप तो कमाल का डांस कर रहे हैं!’ दिलीप साहब की सुनिए- ‘हां, मैं तो ठीक ही करता हूं... उसे भी कहो कि अपने पैर ज़रा सही जगह रखे!’ सच कहूं तो मुझे बहुत हंसी आ रही थी, मगर उस समय दिलीप साहब का मानवीय स्वभाव देखकर मैं धन्य हो गया था!
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    मनोज कुमार
    अपने आदर्श के साथ पर्दे पर आकर मैं धन्य हो गया
    मैंने अपनी ज़िंदगी की जो पहली फिल्म देखी थी, वह दिलीप कुमार-नूरजहां अभिनीत ‘जुगनू’ थी। दिलीप साहब इसमें सूरज बने थे और इस फिल्म का म्यूजिक बहुत हिट हुआ था। दिल्ली के ‘रिट्ज’ सिनेमाघर में जब मुझे यह फिल्म देखने का मौका मिला, तब यह 49वें हफ्ते में चल रही थी। इसके 15 दिनों बाद मैं अपने मामू के साथ फिल्म ‘शहीद’ देखने गया, जिसमें दिलीप साहब ने राम की भूमिका निभाई थी। यह फिल्म देखकर जब मैं थिएटर से बाहर निकला, तब मुझे एक बात काफी परेशान किए हुए थी... कि सूरज और राम बना इंसान तो एक ही है। लेकिन जब सूरज मर गया था तो फिर वह राम कैसे बन गया? … और अब जबकि राम भी मर गया है तो क्या वह एक बार फिर ज़िंदा हो पाएगा? यकीन मानिए, इस सवाल को सुलझाने के चक्कर में मैंने रातों की अपनी नींद भी गंवा दी थी! एक रात मुझे यूं जागते हुए देखकर मां ने कारण पूछा तो मैंने उन्हीं से पूछ लिया- ‘मां, आदमी कितनी बार मरता है?’ ‘एक बार’- वह बोलीं तो मेरा दूसरा प्रश्न था- ‘कोई दोबारा मरे, तब?’ मां ने सरेंडर कर दिया- ‘बेटा, फिर तो वह कोई फरिश्ता ही होगा!’ मुझे मालूम नहीं था कि फरिश्ता आखिर किसे कहते हैं... बस, मैंने सोच लिया कि अब तो मैं फरिश्ता ही बनूंगा। वैसे जब फरिश्ते का मतलब समझ में आया तो मुझे काफी शर्मिंदगी भी महसूस हुई!
    जाहिर है कि दिलीप साहब का रंग मुझ पर चढ़ चुका था... मेरा अपना फिल्मी नाम भी उन्हीं की देन है, क्योंकि उत्तर भारत में तब किसी का नाम मनोज नहीं हुआ करता था। हां, शशधर मुखर्जी साहब की फिल्म ‘शबनम’ में दिलीप साहब को मनोज के रूप में देखकर मैंने तय कर लिया कि यदि मैं (फिल्मों में) कुछ बन पाया तो अपना नाम मनोज ही रखूंगा। ईश्वर ने मेरी सुन ली... यह बात अलग है कि हमने कभी एक-दूसरे का नाम नहीं लिया। वे मुझे ‘डॉक्टर साहब’ कहते हैं... होम्योपैथी का जानकार होने के कारण, जबकि मैं उन्हें ‘हांजिओ’ कहता हूं। खैर, मैं न सिर्फ फिल्मों में आया... अभिनेता के अलावा निर्माता-निर्देशक और लेखक के भी तौर पर लंबी पारी खेली, बल्कि अपने आदर्श दिलीप साहब को मैंने फिल्म ‘क्रांति’ में डायरेक्ट भी किया!
    यहां मैं एक और बात कहना चाहूंगा... दिलीप साहब ने बतौर एक्टर भला किस पर प्रभाव नहीं डाला होगा? दिलीप साहब के अभिनय का लोहा सभी मानते हैं, मैं भी मानता हूं... लेकिन ज़रा हटकर। असल में जिस तरह दिलीप साहब ने केवल दिल की बात सुनी... अपने आपको पैसे के सामने कभी बेचा नहीं, उसी तरह मैंने भी खुद को यहां की अंधी दौड़ में शामिल नहीं होने दिया। मेरे साथी धर्मेन्द्र और शशि कपूर ने 300-400 फिल्में की होंगी, पर मेरे नाम पर बमुश्किल 50 फिल्में मिलेंगी। यहां तक कि जब वे फिल्मों में एक्टिंग कर रहे थे, मैं अभिनय के अतिरिक्त फिल्मों के निर्माण-निर्देशन में भी सक्रिय था। इसकी वजह शायद यह रही होगी कि मुंबई तो मैं तीन लाख रुपए कमाने आया था... एक लाख मां-बाप के लिए तो एक लाख भाई-बहन की खातिर, जबकि तीसरा लाख मैं खुद अपने लिए कमाना चाहता था। इसलिए मीडिया द्वारा मुझ पर दिलीप साहब की कॉपी करने का जो इल्जाम लगाया जाता है, मैं उससे सहमत नहीं हूं। आप ही बताइए कि ‘आदमी’ और ‘क्रांति’ में क्या आपको दो-दो दिलीप कुमार दिखे थे?
    अब ‘क्रांति’ की बात कर लूं। मैंने दिलीप साहब को फोन किया- ‘एक बहुत ही बोगस कहानी है... रोल भी बड़ा बोगस-सा है। लेकिन मुझे लगता है कि इस कहानी का यह रोल आप ही करें!’ दिलीप साहब मुझे बहुत प्यार करते हैं, सो उन्होंने भी उसी रौ में कह दिया- ‘हां यार, हो जाए।’ इसके बाद एक-डेढ़ महीने गुजर गए, जब तक मैंने कहानी को थोड़ा मांझ लिया था। अब मैंने पूछा, ‘गपशप के लिए कब मिलूं?’ जवाब था- ‘कल चाय पर आ जाओ... 5 बजे।’ मैं दिलीप साहब के बंगले पर पहुंचा तो वे टैरेस पर बैठे हुए थे। पहले तो उन्होंने मेरे पिताजी के बारे में पूछा... पिताजी की वे बहुत इज्जत करते थे- ‘आपकी नस्ल के सच्चे और अच्छे आदमी अब कहां मिलते हैं!’ दरअसल, मेरी पैदाइश एबटाबाद की है तो दिलीप साहब का जन्म पेशावर में हुआ था... अब पाकिस्तान में स्थित इन शहरों की दूरी महज एक-सवा घंटे में नापी जा सकती है। स्वाभाविक है कि दोनों में बड़ा अपनापन था, लिहाजा दिलीप साहब के परिवार से परिचित मेरे पिताजी ने उन्हें ब्लॉटिंग पेपर (सोख्ता) नाम दिया था- ‘दूसरों के ग़म चूसता है... भाई-बहनों को संभाल कर रखा है!’ अब तक चाय भी आ गई थी... वे बोले- ‘आज थोड़ी गड़बड़ है। नूर लाला की तबीयत ठीक नहीं है। मैं अस्पताल जाकर देखना चाहूंगा, जबकि कहानी सुनाने में तो 3 घंटे लगेंगे!’ मैं मुंहलगा तो था ही, सो कहने में देर नहीं की- ‘जिस कहानी को सुनाने में 3 घंटे लग जाएं, वह कहानी नहीं होती... कहानी तो 2 मिनट में सुनाई जाती है!’ दिलीप साहब का अंदाज देखिए- ‘तू बहुत बदमाश है, चल सुना दे।’ दिलीप साहब वैसे भी सुलझे और बेहद मंझे हुए एक्टर हैं... ईश्वर साक्षी है कि दो मिनट ही गुजरे होंगे, मैंने उनकी आंखों में चमक देख ली- ‘यार, जमीन तो बड़ी उपजाऊ है।’ ‘आप भरोसा रखें, फसल भी अच्छी होगी’- मेरे इस दावे पर जब उन्होंने मेरी ओर देखा तो मैं थोड़ा झेंप-सा गया, ‘अगर अच्छी नहीं बनेगी तो मैं रीशूट करूंगा।’ इसके बाद दिलीप साहब ने ज्यों ही ‘ओके’ कहा, फिल्म इंडस्ट्री में हंगामा हो गया कि मेरी फिल्म के लिए उन्होंने सिर्फ दो मिनट में हामी भर दी! आप ही सोचिए, ऐसी स्थिति में मुझ जैसा साधारण मनुष्य भला ईश्वर से कुछ मांगे भी तो और क्या मांगे? वह फरिश्ता, जो बचपन से मेरे मन-मस्तिष्क में बसा हुआ था, अब मेरे साथ काम करने जा रहा था! मैं कहूं तो अजीब लगेगा, पर सच्चाई को नकारा भी नहीं जा सकता... दिलीप साहब के करियर की सबसे बड़ी हिट फिल्म यही है- ‘क्रांति’!!
    आइए, ‘क्रांति’ के दौरान की भी कुछ घटनाएं बताता चलूं। इस फिल्म के लिए दिलीप साहब का उस दिन पहला सीन था। वे जब तैयार होकर शिप के ऊपर आए... बोले- ‘आप बताइए कि मुझे कहां से चलकर कहां आना है?’ अब दिलीप साहब को मैं क्या बताऊं? लेकिन मेरे अंदर का डायरेक्टर जग गया... मैंने वह सीन करके दिखाया तो कहने लगे- ‘एक बार और करो... अच्छा लगता है!’ दरअसल, वे अपना सीन कभी मुझसे नहीं मांगते थे... मेरे असिस्टेंट से ही लेते थे। एक और वाकया याद आता है, जब उन्होंने आधी रात को मुझे फोन किया। वे कोर्ट वाले सीन को लेकर दुविधा में थे- ‘डॉक्टर साहब, मैंने अपना होमवर्क कर लिया है। ईमान से कह रहा हूं कि अभी मेरे हाथ में स्क्रिप्ट नहीं है, मगर आपको मैं अपना पूरा संवाद सुना सकता हूं! मैं यह भी जानता हूं कि आप बहुत शरारती हैं... इस सीन के लिए इधर-उधर से कैमरा चलवा कर एक या दो शॉट में फाइनल टेक ले लेंगे, पर मेरे भीतर से वो आदमी (सांगा) निकल ही नहीं रहा है... मैं क्या करूं?’ मैं भी क्या कह सकता था! अगले दिन हम ‘आरके’ स्टूडियो के अपने सेट पर पहुंचे तो मालूम पड़ा कि ग्यारह-सवा ग्यारह बजे वे भी आ गए हैं। इस स्टूडियो में दिलीप साहब ने ‘क्रांति’ से पहले किसी फिल्म की शूटिंग नहीं की थी। राज कपूर साहब का भी बड़प्पन देखिए कि ‘आरके’ में उसी वक्त जब उनकी खुद की फिल्म ‘अब्दुल्ला’ की शूटिंग चल रही थी, अपने स्टूडियो का सबसे बड़ा मेकअप रूम उन्होंने स्वयं न लेकर दिलीप साहब को दे दिया था! बहरहाल, दिलीप साहब उसी रूम में बैठकर गप्पे मारते रहे... एक-दो नहीं, चार दिन गुजर गए। वे सेट पर नहीं आए, मगर अपने घर भी नहीं गए... 5वें दिन अचानक सूचना आई कि दाढ़ी लग चुकी है। बस, वे शॉट देने के लिए आ रहे हैं। कुछ देर में दिलीप साहब आए... और एक ही टेक में 500 फीट का सीन ‘ओके’ करवा दिया! यह सब कुछ हो जाने के बाद जब मैंने बीते चार दिनों का चक्कर पूछा तो बड़ी गंभीरता के साथ बोले- ‘सांगा तो आज ही बाहर निकला न!’
    इसी तरह जब हम ‘चना जोर गरम...’ गाने की शूटिंग कर रहे थे तो शुरू के चार दिनों तक दिलीप साहब का काम नहीं था... हेमा मालिनी-शत्रुघ्न सिन्हा के ऊपर फिल्मांकन किया जा रहा था, फिर भी िदलीप साहब हर दिन सेट पर आकर बैठे रहते थे। फिर पांचवें दिन की सुबह के लिए फैसला हुआ कि कल पहले दिलीप साहब शूटिंग करेंगे, हेमा जी पर कैमरा दोपहर के बाद जाएगा। बेशक, हेमा जी बड़ी नेक औरत हैं... वे पैकअप के बाद मुझसे पूछने आईं- ‘क्या मैं कल थोड़ी देर से आऊं?’ मैं हेमा जी को लेकर वहां गया, जहां से वे दूर बैठे हुए दिलीप साहब को देख सकती थीं। मैंने पूछा- ‘वह आदमी कौन है?’ हेमा जी का जवाब था- ‘दिलीप साहब।’ मैंने ‘नहीं’ कहा तो बोलीं, ‘यूसुफ ख़ान साहब।’ इस तरह हेमा जी ने उन्हें कभी ‘ट्रेज़िडी किंग’ तो कभी ‘सांगा’... सायरा बानो के पति के भी रूप में बता दिया, पर मेरे बार-बार इनकार के बाद कहने लगीं- ‘आप ही बताइए न?’ मैंने बताया भी- ‘वह शख्स, जो कड़े परिश्रम की देन है! हजारों-लाखों में कोई एक जो ऐसा होता है, उसे ऐसा उसकी मेहनत बनाती है... दिलीप साहब भी 99 फीसदी अपनी मेहनत से बने हैं, वरना उन्हें भला चार दिनों से आकर यहां बैठने की जरूरत क्या थी?’ अब हेमा जी बिल्कुल समय से आकर सेट के एक कोने में बैठी रहतीं... शॉट में मौजूदगी न होने के बावजूद, मगर देर से आने या जल्दी जाने की बात उन्होंने फिर कभी नहीं की!
    हमने ‘क्रांति’ के किले का सेट ‘एस्सेल’ स्टूडियो में लगाया था... ओम प्रकाश जी वहीं चेंबूर में रहा करते थे। जब मन करे, वे हमारे सेट पर आ जाते... लेकिन ‘दो पाए’ बनाकर लाना कभी नहीं भूलते थे। यह बात जब दिलीप साहब को पता चली तो वे चुपके से प्रोत्साहित करते- ‘खा लो... खा लो!’ फिर एक दिन खुद ही आकर कहने लगे- ‘डॉक्टर साहब, डाइजेशन की कोई दवा बताओ?’ मैंने धीरे से कहा- ‘एक ही दवा है... आज का पैकअप हम अभी कर देते हैं!’ इस पर दिलीप साहब ने जोर का ठहाका लगाते हुए ओम जी से गुजारिश की- ‘आज के बाद ‘पाए’ मत लाइएगा!’
    जहां तक ‘आदमी’ की बात है, पहले इस फिल्म में धर्मेन्द्र थे। एक दिन की उन्होंने शूटिंग भी की थी, मगर फिर कभी आए ही नहीं। चूंकि ‘आदमी’ के कलाकारों को फाइनल करने की ड्यूटी प्राण साहब की थी, लिहाजा उन्होंने मुझसे कहा- ‘काके, बड़ा अच्छा रोल है... तू कर ले, मेरी इज्जत का सवाल है!’ मैंने आग्रह किया- ‘पापाजी, आप धरम से केवल ‘हां’ करवा दो... मैं कर लूंगा।’ इस तरह मैं जिन दिलीप साहब को पर्दे पर ही देख-देखकर खुश होते रहा था, मुझे उनके साथ पहली बार स्क्रीन और वार्डरोब शेयर करने का सौभाग्य हासिल हुआ... अपने आदर्श के साथ पर्दे पर आकर मैं धन्य हो गया!
    आखिर में उस दिन की बात करूंगा, जब दिलीप साहब को मुंबई का शेरिफ बनाया गया था। मैंने अपनी पत्नी से कहा कि कपड़े तैयार कर दो... मैं उन्हें फॉर्मल मुबारकबाद देने जाऊंगा। मेरी पत्नी बोली- ‘आपके कपड़े तो छत पर सुखाने के लिए डाले हैं... देख आइए कि प्रेस करने लायक हो गए हैं कि नहीं?’ मैं छत पर गया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं... आज बधाई देने की खातिर जिन दिलीप साहब को पूरा शहर खोज रहा था, वे मेरी छत पर खड़े होकर पतंग उड़ा रहे थे!
    सच, दिलीप साहब जैसी शख्सियत तो सदियों में एक होती है। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह उन्हें अच्छी सेहत दे... लंबी आयु दे!
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Web Title: Legendary Actor Dilip Kumar Turns 95 On Monday
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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