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अमिताभ बच्चन : पढ़िए महानायक की जिंदगी के संघर्ष के 5 किस्से

अमिताभ की जिंदगी का हर पहलू दिलचस्प है। उनकी उपलब्धियों को सुनना सभी को भाता है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Jul 15, 2014, 12:02 AM IST

  • (फाइल फोटो : अमिताभ बच्चन)
    मुंबई.महानायक अमिताभ बच्चन का पहला टीवी शो 'युद्ध' सोनी चैनल पर शुरू हो गया है।' इस शो से बिग बी ने बतौर टीवी अभिनेता अपना करियर शुरू किया है।' शो में बिग बी एक कंस्ट्रक्शन किंग की भूमिका में हैं, जिसका नाम युधिष्ठिर सकरवार है।
    वे एक ऐसे रईस कंस्ट्रक्शन किंग में हैं, जो अपने और अपने परिवार के लिए कुछ भी खरीदने का सामर्थ्य रखता है, लेकिन खुद एक जानलेवा बीमारी से जूझ रहा है। युधिष्ठिर ने दो महिलाओं से शादी की हुई है, जो अलग-अलग बैकग्राउंड से हैं। उसका एक बेटा है, जो जान से मारने की धमकियों और पुलिस केस से काफी डरा हुआ है, एक बेटी है, जो उससे नफरत करती है। इस तरह हम कह सकते हैं कि जिंदगी में आने वाली मुसीबतों से युधिष्ठिर के जूझने की कहानी को युद्ध का नाम दिया गया है।'
    यह पहला मौक़ा है, जब बिग बी एक टीवी अभिनेता के रूप में नजर आ रहे हैं, लेकिन अपनी जिंदगी में वे कई तरह के रोल निभा चुके हैं।' कभी वे फिल्मों में अपने सशक्त अभिनय के कारण दर्शकों के दिलों पर राज करते रहे, तो कभी बतौर प्रोड्यूसर असफलता का मुंह भी देखा। इतना ही नहीं, वे राजनीति में भी अपना लक आजमा चुके हैं।

    अमिताभ की जिंदगी का हर पहलू दिलचस्प है। उनकी उपलब्धियों को सुनना सभी को भाता है, लेकिन शायद ही किसी ने उनकी जिंदगी के संघर्ष की गाथा पढ़ी हो। आज मुंबई में रह कर करियर बनाना आसान नहीं है। इसका ये मतलब नहीं कि 70 के दशक में अमिताभ ने बड़ी ही आसानी से अपना करियर शुरू कर लिया था।

    करियर शुरू करने से राजनैतिक विफलता तक, एबीसीएल के दीवालिया होने से 'कुली' के हादसे तक, अमिताभ की जिदंगी के संघर्ष का हर किस्सा अपने-आप में प्रेरणा है। किसी की भी जिंदगी में इससे बेहतर क्या हो सकता है कि वो लड़खड़ाए, गिरे लेकिन फिर से उठ कर खड़ा हो जाए।जानते हैं उनकी जिंदगी के संघर्ष के 5 किस्से...
    1- करियर की बहुत ही कठिन शुरुआत-

    अमिताभ बच्चन ने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत फिल्म 'सात हिन्दुस्तानी'(1969) से की थी, लेकिन यह फिल्म उनके करियर की सुपर फ्लॉप फिल्मों में से एक है। इसके बाद उन्होंने 'रेशमा और शेरा'(1972) की जिसमें उनका रोल गूंगे की था और यह फिल्म भी फ्लॉप ही रही थी। हां, 'आनंद'(1971) फ़िल्म ने जरूर पहचान दी थी, लेकिन उसके बाद दर्जनभर फ्लॉप फ़िल्मों की ऐसी लाइन लगी कि मुंबई के निर्माता निर्देशक उन्हें फ़िल्म में लेने से कतराने लगे।

    उन्हें फिल्में मिलनी बंद हो गईं। अमिताभ निराश होने लगे थे। मेहनत और टैलेंट के बाद भी न ओर दिख रहा था और न छोर। अमिताभ उन दिनों फ़िल्म लाइन में बुरे दौर से गुजर रहे थे। लंबे और पतली टांगों वाले अमिताभ को देखकर निर्माता मुंह बिचका लेता था। वे मुंबई से लगभग पैकअप करके वापस जाने का मन बना चुके थे।

    उन दिनों प्रकाश मेहरा 'जंजीर'(1973) की कास्टिंग कर रहे थे और उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उनकी वो फ़िल्म, जिससे उन्हें काफी उम्मीदें हैं, में किस एक्टर को लीड रोल में लिया जाए। वे अपने ऑफिस में इसी फ़िल्म के बारे में प्राण से चर्चा कर रहे थे। तब प्राण ने उन्हें अमिताभ का नाम सुझाया। प्रकाश मेहरा ने इनकार भाव से सिर झटक दिया।
    तब प्राण ने केवल इतना कहा कि ज्यादा बेहतर है कि एक बार अमिताभ की कुछ फ़िल्में देख लें और फिर मन जो आए, वो फैसला करें। साथ ही यह भी कहा-बेशक उसकी ज्यादातर फ़िल्में फ्लॉप हुई हैं, लेकिन उसके अंदर कुछ खास जरूर है। टैलेंट की उसमें कमी नहीं। बस उसे जरूरत है तो एक सही फ़िल्म की। 'जंजीर' के डायलॉग सलीम-जावेद की हिट जोड़ी ने लिखे थे। शूटिंग में न केवल अमिताभ, बल्कि सारी यूनिट ने ही खूब मेहनत की।

    फ़िल्म बनकर तैयार हो गई, लेकिन दिक्कतें थीं कि पीछा ही नहीं छोड़ रही थीं। ट्रायल शो का वितरकों ने खास रिस्पॉन्स नहीं दिखाया। अमिताभ उनके लिए पिटे हुए हीरो थे, जिसकी मार्केट वैल्यू न के बराबर थी। खैर किसी तरह 'जंजीर' रिलीज हुई। जिसने यह फ़िल्म देखी, वह अमिताभ का दीवाना हो गया। लाजवाब एक्टिंग, जबर्दस्त डायलॉग्स।

    अमिताभ रुपहले परदे पर ऐसे हीरो के रूप में सामने आए थे, जो पब्लिक के गुस्से का इजहार करता हुआ दिख रहा था। पहले दिन जो लोग इसे देखने गए, वो सीट से हट भी नहीं सके। देखते ही देखते एक नए सुपरस्टार का आगाज हो चुका था, वो थे अमिताभ बच्चन। और इसके बाद अमिताभ के लिए सबकुछ बदल गया। उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, आगे ही बढ़ते रहे। ऐसा कोई नहीं था जो उन्हें रोक पाए। अब चार दशक बाद भी उनका सफर उतनी ही मजबूती से जारी है।
    आगे की स्लाइड्स में पढ़ें अमिताभ बच्चन की जिंदगी के चार और अहम किस्से...
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  • 2- 'कुली' की शूटिंग के समय चोट लगने के बाद फिर से खड़े हुए-

    'जंजीर' आने के बाद अमिताभ बड़े स्टार बन चुके थे। 'दीवार'(1979), 'नमक हराम'(1973), 'शोले'(1975), 'अमर अकबर एंथोनी'(1977), 'काला पत्थर'(1979), 'सुहाग'(1979), 'त्रिशूल'(1978), और 'डॉन'(1978) ने अमिताभ बच्चन को बॉलीवुड के बड़े स्टार्स की जमात में लाकर खड़ा कर दिया था, लेकिन बिग बी का खराब भाग्य था, जो उनका पीछा छोड़ना ही नहीं चाह रहा था। करियर की शुरुआत में अमिताभ सर्वाइव करने के लिए लड़ते रहे, लेकिन इस बार उन्हें शारीरिक तौर पर जूझना था।

    जी हां, हम बात कर रहे हैं 1983 में आई अमिताभ बच्चन की फिल्म 'कुली' की। 'कुली' फिल्म में अमिताभ के साथ हुआ हादसा बहुत ही दर्दनाक था। दरअसल, वे उस समय छोटे पर्दे पर दुर्योधन का किरदार निभा चुके पुनीत इस्सर के साथ एक्शन सीक्वेंस की शूटिंग कर रहे थे। सीन बहुत ही जोरों पर था और दोनों के बीच धमाकेदार लड़ाई शूट की जा रही थी।

    इसी बीच एक शॉट ऐसा भी फिल्माया जाना था, जिसमें अमिताभ बच्चन दीवार के सहारे खड़े होते हैं और पुनीत इस्सर को उनके पेट पर घूंसा मारना होता है। लेकिन यह घूंसा अमिताभ को असलियत में लग गया था और स्थिति यह हो गई कि उन्हें सीधे अस्पताल में भर्ती कराया गया।


    ये वो समय था जब अमिताभ का करियर चरम पर था। उनकी हर फिल्म हिट जा रही थी, लोग उन्हें पसंद कर रहे थे, उनके फैन्स की तादात लाखों में पहुंच चुकी थी। ऐसे में देश में हर जगह अमिताभ के लिए दुआएं और प्रार्थनाएं होने लगी थीं। एक तरफ अमिताभ मुंबई के अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे थे और दूसरी तरफ उनके स्वस्थ होने के लिए लोग मंदिरों-मस्जिदों में कतारें लगाए खड़े थे।

    आखिरकार, अमिताभ ने जिंदगी की ये जंग जीत ली और वो स्वस्थ होकर अस्पताल से बाहर निकले। लोगों की दुआएं रंग लाईं, लेकिन अमिताभ के दोबारा करियर शुरू करने पर तब भी संशय था। उन्हें कई सप्ताहों के लिए बेड रेस्ट के लिए कहा गया था। ऐसे में बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी वो उठ कर 'एंग्री यंग मैन' को पर्दे पर दिखा पाएंगे।

    लेकिन अब इसे अमिताभ की जिजीविषा कहें या लोगों की दुआओं का असर, अमिताभ स्वस्थ हुए, खड़े हुए, एंग्री यंग मैन भी बने और उनका करियर आज भी सबसे अलग, सबसे बेहतर है।
  • 3- एबीसीएल का फ्लॉप होना

    उम्र बीतने के साथ-साथ लोगों की जिंदगी में बदलाव आने लगता है। अमिताभ के साथ भी ऐसा ही हुआ। 57 की उम्र में जब एक आम आदमी रिटायर होने की सोच रहा होता है, तब अमिताभ को लगा कि अब उनके पास पर्याप्त पूंजी है और वो बिजनेस में हाथ आजमा सकते हैं। इसके लिए 1995 में अमिताभ ने 'अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन लिमिटेड' (ABCL) की शुरुआत की, जो एक फिल्म प्रोडक्शन और इवेंट मैनेजमेंट कंपनी थी। ये कंपनी 1996 में उस समय लाइमलाइट में आई जब इसने मिस इंडिया पेजेंट को लॉन्च किया।

    अमिताभ से यहीं पर गलती हो गई। बहुत जल्दी बहुत ज्यादा हासिल करने की उनकी तमन्ना ने उनकी कंपनी को बिखेर कर रख दिया। कंपनी के बिखरने की सबसे बड़ी समस्या थी प्रॉपर प्लानिंग ना होना और मैनेजमेंट की कमी। एबीसीएल को बनाने का एकमात्र उद्देश्य था बिजनेस करना। अमिताभ इस कंपनी के जरिए फिल्मों का डिस्ट्रीब्यूशन, म्यूजिक सेलिंग, इवेंट ऑर्गनाइजेशन और एक्टर्स की टीआरपी बढ़ाने जैसे काम करना चाहते थे, लेकिन दुर्भाग्यवश वो ऐसा कुछ भी नहीं कर पाए।

    अपने लक्ष्य को बहुत जल्दी हासिल करने के चक्कर में अमिताभ का ग्रुप बहुत तेजी से भागने लगा। इस कंपनी में 150 लोगों को रखा गया था। इस कंपनी के हवाले से 15 फिल्में भी लॉन्च की गई थीं जिनके बजट की रेंज 3 से 8 करोड़ रुपए थी। साथ ही, इस कंपनी को 'मुंबई' और 'बैंडिट क्वीन' जैसी फिल्मों के डिस्ट्रीब्यूशन काम मिला था। साथ ही इसने मिस इंडिया पेजेंट भी ऑर्गनाइज किया था।

    कंपनी का पहला साल तो अच्छा रहा था, जब इसने 50 करोड़ रुपए की लागत के बाद 65 करोड़ रुपए का टर्नओवर किया और 15 करोड़ रुपए का फायदा उठाया, लेकिन अगले साल कंपनी इस लाभ को बरकरार रखने में नाकाम रही। इसके बाद से अमिताभ और उनके प्रोफेशनल मैनेजर्स के बीच बात बिगड़ने लगी। दरअसल अमिताभ नॉर्थ अमेरिका में स्टेज शो करना चाह रहे थे, लेकिन मैनेजर्स के मुताबिक ये नामुमकिन था। ऐसे में अमिताभ कंपनी की पूरी टॉप टीम को हटा कर नया क्रू ले आए, लेकिन कंपनी घाटे के चलते ठप हो गई।
  • 4- दिवालिया होना-

    अब हम आपको जिस बारे में बताने जा रहे हैं वो अमिताभ की जिंदगी का सबसे बुरा दौर था। यहां तक कि अमिताभ अपनी कंपनी में काम करने वाले मुलाजिमों को उनकी सैलरी तक नहीं दे पाए थे। एबीसीएल के फ्लॉप होने के बाद अमिताभ बच्चन के मुंबई वाले घर और दिल्ली वाली जमीन के जब्त होने और नीलाम होने की स्थिति आ गई थी। 1999 में जब केनरा बैंक (जिससे अमिताभ बच्चन ने लोन लिया था) और दूरदर्शन अमिताभ से अपने पैसे की वसूली के दबाव डालने लगे, तब अमिताभ बोर्ड ऑफ इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंशियल रीकंस्ट्रक्शन के पास गए और मदद मांगी।

    ऐसे में मुंबई हाईकोर्ट ने उन्हें अपने मुंबई वाले दोनो बंगले बेचने से रोका और दूसरे तरीके से अपना लोन चुकाने की मोहलत दी। इसके बाद अमिताभ ने अपने बंगलों को सहारा इंडिया फाइनेंस के पास गिरवी रख दिया। इंडियन बोर्ड ऑफ इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंशियल रीकंस्ट्रक्शन पहले से ही एबीसीएल की हालत खस्ता बता चुकी थी और ये भी बताया कि इस कंपनी के ऊपर 14 मिलियन अमेरिकी डॉलर का कर्ज है। अमिताभ खुद बताते हैं कि 'मेरे दोस्तों ने मुझे सलाह दी कि मुझे ये सब बंद कर देना चाहिए और इसे बेच कर जो पैसा मिले उससे अपना कर्ज चुका कर नई जिंदगी शुरू करनी चाहिए।'

    अमिताभ ने इस बारे में खुद बताया है कि 'मैं ये सब बंद नहीं करना चाहता था। बहुत सारे लोगों का इसमें पैसा लगा हुआ था और लोगों को इस कंपनी में भरोसा था। और ये सब मेरे नाम की वजह से था। मैं उन लोगों के साथ धोखा नहीं कर सकता था जो लोग मुझ पर भरोसा कर रहे थे। उन दिनों मेरे सिर पर हमेशा तलवार लटकती रहती थी। मैनें कई रातें बिना सोए गुजारी हैं। इसके बाद मैं एक दिन खुद ही सुबह-सुबह यश चोपड़ा के पास गया और मैंने उनसे कहा कि मैं दीवालिया हो गया हूं, मुझे काम चाहिए। मेरे पास कोई फिल्म नहीं है। यशजी ने मेरी बात को बहुत ही ध्यान से सुना और उसके बाद मुझे 'मोहब्बतें'(2000) ऑफर की।'

    अमिताभ का ये यश चोपड़ा वाला किस्सा पूरी फिल्म इंडस्ट्री में बहुत ही फेमस है। दरअसल, इस मामले में यश चोपड़ा ने जवाब दिया था कि 'इन दिनों मैं कुछ नहीं कर रहा हूं। लेकिन मेरा बेटा एक फिल्म बना रहा है। तुम उसके पास जाओ। वो तुम्हारा काम कर सकता है।' 'मोहब्बतें' मिलने के बाद ही अमिताभ को केबीसी की होस्टिंग का ऑफर मिला था जिससे उन्हें नई पहचान मिली थी। अमिताभ बताते हैं कि 'इसके बाद मैंने कमर्शियल और फिल्में करना शुरू कर दिया था। मुझे ये कहते हुए बहुत खुशी होती है कि मेरे ऊपर चढ़ा 90 करोड़ रुपए का कर्ज उतर गया और मैं एक नई शुरुआत करने में कामयाब रहा।'
  • 5- राजनैतिक विफलता-

    1984 में अमिताभ बच्चन ने एक्टिंग से ब्रेक लेकर राजनीति में हाथ आजमाने की कोशिश की थी। इस मामले में उनके फैमिली फ्रेंड राजीव गांधी उनकी काफी मदद कर रहे थे। अमिताभ को इलाहाबाद की लोकसभा सीट से टिकट देकर एच. एन. बहुगुणा के सामने उतारा गया था जो कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रह चुके थे। अमिताभ इस चुनाव में बहुत ही बड़े अंतर से (68.2% of the vote) जीते थे, लेकिन अमिताभ का राजनैतिक करियर बहुत ही छोटा था।

    चुनाव जीतने के तीन साल बाद ही अमिताभ ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उस समय बोफोर्स कांड की गहमा-गहमी अपने चरम पर थी और गांधी परिवार के साथ-साथ बच्चन परिवार को भी इस घोटाले में घसीटा गया था। हांलाकि, बाद में अमिताभ पाक-साफ निकले थे।

    वैसे आर्थिक तंगी के समय में उनके पुराने दोस्त अमर सिंह ने अमिताभ का काफी साथ दिया था। न सिर्फ आर्थिक तौर पर, बल्कि भावनात्मक तौर पर भी। ऐसे में अमिताभ ने अमर सिंह की पार्टी समाजवादी पार्टी को सपोर्ट करना शुरू कर दिया था। जया बच्चन ने सपा ज्वाइन कर ली थी और वो राज्य सभा सदस्य भी बन गई थीं।

    इसके अलावा अमिताभ भी सपा के पक्ष में प्रचार किया करते थे और चुनावी दौरे भी करते थे। अमिताभ के इन्हीं कामों ने उनके लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी थी। इसके बाद अमिताभ को लागत से सस्ते दामों में किसानों से जमीन खरीदने का आरोपी बताया गया था। हालांकि, बाद में ये मसला भी सुलट गया था।
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