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इस राज को राज ही रहने दें!

mayank shekhar | Sep 07, 2012, 18:23 PM IST

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    • Genre: हॉरर
    • Director: विक्रम भट्ट
    • Plot: फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती।

किसी धार्मिक हॉरर फिल्म में धर्मनिरपेक्षता के दुर्लभ गुण का परिचय देते हुए एक हिंदू तांत्रिक हीरोइन को ईसाई कब्रिस्तान में ले जाता है। हीरोइन पर किसी ने काला जादू कर दिया है। बाबा अपनी और हीरोइन की कलाई पर एक गांठ बांधता है ताकि वे एक साथ प्रेतों की दुनिया में दाखिल हो सकें और उनके राज जान सकें। इसी तरह हीरोइन को काले जादू से मुक्त किया जा सकता है।

बैकग्राउंड में हो रहा मंत्रोच्चार सुनकर लगता है कि वह बौद्ध मंत्रजाप है। इस दिलेर मुहिम के दौरान अचानक तांत्रिक का सिर कलम हो जाता है। हीरो और हीरोइन जैसे-तैसे कब्रिस्तान से बाहर निकलते हैं। यकीनन, यह उनके लिए एक झकझोर देने वाला अनुभव रहा होगा। हम कल्पना कर सकते हैं कि वे मारे दहशत के थर-थर कांप रहे होंगे। नहीं, ऐसा नहीं होता। हीरो इमरान हाशमी हैं। हीरोइन (ईशा गुप्ता) बहुत कुछ मृणालिनी शर्मा जैसी लगती हैं, जिन्होंने 2002 में फिल्मू 'राज' से पदार्पण किया था। यह 'राज 3' है। हाशमी आव देखते हैं न ताव और हीरोइन को चूम लेते हैं। हॉरर म्यूजिक की जगह रोमांटिक म्यू जिक बजने लगता है। वे बड़ी शिद्दत से एक-दूसरे को प्यार करते हैं। दर्शक हंसने लगते हैं। इस फिल्म में हमें इस तरह की हंसी इतनी बार सुनाई देती है, जितनी किसी कॉमेडी फिल्म में भी नहीं सुनाई देती होगी।

यह एक हॉरिबल हॉरर फिल्म है। मेरी तरह हर व्‍यक्ति सिनेमा हॉल में इसी उम्मीद से गया होगा कि फिल्म उसे डराएगी। लेकिन उसे फिल्म में कोई भूत नजर नहीं आता। सभी ऊबे हुए नजर आते हैं। और यह फिल्म‍ कुछ इस तरह शुरू होती है : एक फिल्म अवार्ड सेरेमनी में बिपाशा बसु (जिन्होंने इस फिल्म में शानिया शेखर नामक एक बॉलीवुड स्टार की भूमिका निभाई है) यह उम्मीद करती हैं कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिलेगा। लेकिन उनकी सौतेली बहन और मुख्य प्रतिद्वंद्वी (ईशा गुप्ता) एक बार फिर यह पुरस्कार जीतने में कामयाब हो जाती हैं। यह उनका लगातार तीसरा सर्वश्रेष्ठ (अभिनेत्री का पुरस्कार है। ऐन इसी बिंदु पर हमें यह अहसास होता है कि यदि किसी भी फिल्म इंडस्ट्री में सर्वश्रेष्ठ अभिनय का पुरस्कार इन दो देवियों को दिया जाता है तो उस इंडस्ट्री का भगवान ही मालिक है। लेकिन अफसोस कि यह फिल्म किसी फिल्म इंडस्ट्री के पतन के बारे में नहीं है।

अवार्ड शो के हॉल के बाहर एक बुजुर्ग व्यक्ति बिपाशा से कहता है कि उसकी बदकिस्मती के लिए भगवान जिम्मेदार हैं। फिर उसकी भेंट एक प्रेतात्मा से होती है, जो उसे एक पेय पदार्थ देती है। इसमें काला जादू है। वह अपने ब्वॉयफ्रेंड (हाशमी जो फिर एक फिल्मकार की भूमिका निभा रहे हैं) के मार्फत अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी पर उस पेय पदार्थ का प्रयोग करती है। निश्चित ही, काम्पीटिशन खत्म करने का यह एक बेहतरीन तरीका है। हीरो को अपनी गर्लफ्रेंड की प्रतिद्वंद्वी से प्यार हो जाता है, लेकिन इसके बावजूद वह उसे काले जादू वाला पेय पदार्थ पिलाता रहता है। आम तौर पर हॉरर फिल्मों में ऐसे किरदार होते हैं जो भूत-प्रेत में भरोसा नहीं रखते, लेकिन इस फिल्म में तो डॉक्टर भी काले जादू वाले इस पेय पदार्थ पर विश्वास करता है।

काश हम भी उस पर भरोसा कर पाते! काले जादू वाले पेय पदार्थ के कारण सम्‍मोहन और संभ्रम की स्थिति बन जाती है। नई टॉप हीरोइन पर भी पागलपन का दौरा पड़ता रहता है। एक बार तो वह एक फिल्‍मी पार्टी में अपने कपड़े तक उतार देती है। कारण? क्‍योंकि उसे लगता है कि उसे इर्द-गिर्द अजीबोगरीब मक्खियां मंडरा रही हैं! निश्चय ही, दर्शकों से उम्‍मीद की जाती है कि वे इसका मजा लेंगे। लेकिन दर्शकों की हंसी तो रुकने का नाम ही नहीं लेती। हीरोइन का करियर लगभग बरबाद हो जाता है। यह तो इस तरह की फिल्‍मों में काम करने से तो किसी का भी हो जाएगा।

Web Title: let this 'raaz' be a 'raaz'
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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