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REVIEW: बिलकुल ही नामाकूल

mayank shekhar | Jul 27, 2012, 15:45 PM IST

REVIEW: बिलकुल ही नामाकूल
Critics Rating
  • Genre: सेक्सुअल कॉमेडी
  • Director:
  • Plot: पोस्टरों में इस फिल्म को पहले ही इस तरह प्रचारित किया है कि क्रिटिक्सक की नजर में यह बकवास साबित होगी।

अजनबी आदमी: मुझे आपका नाम नहीं सुनाई दिया, आई एम सॉरी। सिड: हाय, सॉरी। आई एम सिड। अजनबी : आप बहुत ‘विटी’ हैं। सिड: आप बहुत चर्चगेट हैं।

मैंने इस फिल्म से यह छोटा-सा जोक आपके लिए एक नमूने के तौर पर पेश किया है, जो परिवार के सदस्यों के बीच बैठकर पचाने के लिए पर्याप्त ‘वेजीटेरियन’ है। इससे आपको अंदाजा लग सकता है कि फिल्म में किस तरह के ह्यूमर का इस्तेमाल किया गया है। निश्चय ही, सिड (रितेश देशमुख) फिल्म का हीरो है। वीटी (या विटी) और चर्चगेट मुंबई के लोकप्रिय रेलवे स्टेशन हैं। ‘अजनबी व्यक्ति’ गे है। अधिकतर जोक्स या तो इस बात पर आधारित हैं कि क्या सिड या उसका सबसे अच्छा दोस्त आदि (तुषार कपूर) गे है या इस पर कि क्या‍ वे लड़कियां लेस्बियन हैं, जिनसे वे प्यार करते हैं। यदि आप इस किस्म की कॉमेडी को नॉन स्टॉप दो घंटे और सोलह मिनट तक बर्दाश्त कर सकते हैं, जिसमें कुछ म्यूजिक वीडियो और एक बेहतरीन गीत (‘शर्ट दा बटन’) बिना किसी संदर्भ के फिट कर दिए गए हैं, तो यह फिल्म आपके लिए ही है।





या शायद, आप यह दर्दभरी दास्तान पढ़कर ही संतुष्ट हो जाएं। सिड डीजे है, जिसे अपना भविष्य बहुत उज्ज्वल नजर नहीं आता। आदि अभिनेता है, जिसकी प्रतिभा आमतौर पर कब्ज की गोलियों के विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाती है। जाहिर है, दोनों का बुरा वक्त चल रहा है। चूंकि सिड एक ‘बैड पीरियड’ से गुजर रहा है, लिहाजा वह सैनिटरी नेपकिन्स का एक पैकेट खरीदने पर भी विचार करता है। आदि एक टैरो कार्ड रीडर से मशविरा लेता है, जिससे उसे पता चलता है कि जिस लड़की का नाम ‘एस’ से शुरू होता हो, वह उसका जीवन बदल सकती है।





संगीत सिवन की फिल्म ‘क्या कूल हैं हम’ (2005), जिसे इस फिल्म का प्रीक्वल माना जा सकता है, के हीरो को भी अपनी किस्मत चमकाने के लिए इसी तरह एक ऐसी लड़की की खोज करनी थी, जिसके दाएं वक्ष पर तिल हो। आदि को ऐसी ही एक लड़की मिल जाती है, जिसका नाम ‘एस’ से शुरू होता है। वह उसके सामने शादी का प्रस्‍ताव रखता है, उसे हीरे की अंगूठी भेंट करता है, लेकिन वह उसके प्रस्‍ताव को ठुकरा देती है। अंगूठी अब भी लड़की के ही पास है। वह गोवा में है। आदि और सिड वह अंगूठी पाने के लिए गोवा कूच कर जाते हैं।





शायद आपको लगे कि यह फिल्म की कहानी है। नहीं, ऐसा नहीं है। हमें लगता है कहानी की बुनियाद है हीरे की वह अंगूठी, लेकिन इसके बाद उस अंगूठी का कहीं कोई जिक्र नहीं होता है। तो फिर आखिर फिल्म में किस बात का जिक्र होता है? अधिकतर हाल ही की बॉलीवुड की हिट फिल्मों के संदर्भों का, जैसे कि ‘हाउसफुल 2’ का घिसा-पिटा तकिया कलाम ‘आयें’ या ‘देवदास’ के गीत का विकृत संस्करण ‘डिल्डो ला रे’, जो कि लेस्बियंस की स्थिति की ओर इशारा करता है और एक कामुक डॉगी जिसे पुरुषत्व से परिपूर्ण 'विकी डोनर' का ‘कुत्ता संस्करण’ कहा जा सकता है। तमाम ह्यूमर फिल्म के संवादों में है। संवाद एक ठीक-ठाक चुटकुला लेखक ने लिखे हैं, जो हास्य कवि सम्मेलनों में होने वाली कॉमेडी के अनुरूप ही हैं। आपको पता चल जाता है कि जल्द ही जोक्स का पिटारा खत्म होने वाला है। डबल मीनिंग को तो खैर रहने ही दें, एक ही मीनिंग को दोहरा-दोहराकर हमारे दिमाग का दही बना दिया गया है। और इसी के साथ फिल्म भी टांय-टांय-फिस्स हो जाती है, क्योंकि उसे इतनी देर तक खींचने के लिए पर्याप्त कहानी थी ही नहीं ।





सच कहें तो फिल्म के निर्माताओं ने पोस्टरों में इस फिल्म को पहले ही इस तरह प्रचारित किया है कि क्रिटिक्स की नजर में यह बकवास साबित होगी। लेकिन आखिर क्रिटिक्स भी आम दर्शकों से अलग तो नहीं होते। वे आपको अपनी तरफ से कभी निराश नहीं करते। आप उम्मीद कर सकते हैं कि कम से कम सिनेमा हॉल में आगे की कतार में बैठने वाले लोगों को तो यह फिल्म पसंद आएगी। वास्तव में उन्हें इसकी तुलना में तो ‘क्या कूल हैं हम’ ज्यादा पसंद आती। इस फिल्म का नाम तो होना चाहिए था- ’क्या सुपर हॉट हैं हम।’ ऐसी फिल्में अश्लील प्रचार के दम पर पैसा तो बटोर ले सकती हैं, पर इस बात में भी कोई संदेह नहीं कि कहीं सुपरफ्लॉप न हो जाए।





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Web Title: REVIEW: KYA SUPERKOOL HAIN HUM
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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