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मटरू की बिजली का मंडोला: वाम आदमी के लिए!

Mayank Shekhar | Jan 11, 2013, 16:46 PM IST

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    • Genre: कॉमेडी ड्रामा
    • Director: विशाल भारद्वाज
    • Plot: दबंग बुजुर्गवार मंडोला (इस भूमिका के बाद अब पंकज कपूर को कमतर आंका जाने वाला अभिनेता नहीं कहा जा सकेगा) जब शराब के नशे में चूर हो जाता है, तो और बेहतर इंसान बन जाता है : बेपरवाह, बातूनी, थोड़ा-बहुत भला।

दबंग बुजुर्गवार मंडोला (इस भूमिका के बाद अब पंकज कपूर को कमतर आंका जाने वाला अभिनेता नहीं कहा जा सकेगा) जब शराब के नशे में चूर हो जाता है, तो और बेहतर इंसान बन जाता है : बेपरवाह, बातूनी, थोड़ा-बहुत भला।


वास्‍तव में यह बात अनेक शरा‍बियों के बारे में कही जा सकती है। ऐसे लोगों की वजह से ही तो शराबनोशी की नाक कटने से बची हुई है। वैसे भी मल्‍टीपल पर्सनैलिटी होना हमेशा ही बुरा नहीं होता। लेकिन मंडोला की मुसीबत यह है कि उसका व्‍यक्तित्‍व तो भयावह रूप से विभाजित है।


शराब की चंद बोतलें पीने के बाद वह एक सुशिक्षित जमींदार हैरी से पगलेट हरिया बन जाता है, जो प्रदर्शनकारियों के एक जत्‍थे की अगुआई करते हुए अपने ही घर में घुस जाता है।


फिल्‍म के शीर्षक में जिस मंडोला शब्‍द का उपयोग किया गया है, वह इस दबंग बुजुर्ग की ओर भी इशारा करता है और हरियाणा के एक गांव की ओर भी, जिसका नामकरण दबंग बुजुर्ग के बेहद अमीर परिवार के नाम पर किया गया है।


हम कल्‍पना कर सकते हैं कि इतने अमीर घराने का शराबखोर व्‍यक्ति अपनी पसंदीदा ड्रिंक के रूप में स्‍कॉच या सिंगल-माल्‍ट का चयन करेगा। लेकिन मंडोला के मन को तो गुलाबो नामक एक देसी रंगीन ठर्रा भाता है।


कायदे से उसे चार ड्रिंक के बाद रुक जाना चाहिए। यहां चार ड्रिंक से मतलब चार बोतल से है। लेकिन वह तो एक ही सांस में 42 बोतलें पी डालता है और इसी के साथ उसके व्‍यक्तित्‍व का कायाकल्‍प हो जाता है। यह मजेदार दृश्‍य तो कादर खान की किसी भी पटकथा का एक हिस्‍सा हो सकता है।


मंडोला का ड्राइवर है मटरू। इमरान खान ने यह भूमिका निभाई है। वे यहां अपने कंफर्ट जोन से मीलों दूर थे, लेकिन इसके बावजूद वे इस भूमिका में कंफर्टेबल नजर आए हैं।


मटरू की पर‍वरिश उसके मालिक की बेटी बिजली (अनुष्‍का शर्मा) के साथ हुई है। मटरू पढ़ा-लिखा आदमी है और निश्चित ही वह इससे बेहतर जॉब का हकदार है। मंडोला के मुताबिक मटरू की वास्‍तविक ड्यूटी यह है कि वह अपने मालिक को ज्‍यादा पीने से रोके, लेकिन वह इससे उलटा काम करता है।


मटरू ने इस अमीर घराने से इसलिए अपना नाता जोड़ा है, ताकि उसके गांव के किसानों का उनकी जमीनों पर जो हक है, उसे लौटा सके। उत्‍तर-नेहरूवादी, आर्थिक उदारीकृत, आधुनिक और लोकतांत्रिक भारत की अनेक घटनाओं का जायजा लेने के लिए फिल्‍मकार ने इस फिल्‍म में अनेक मजेदार प्रसंग रचे हैं।


वह कहीं भी अपनी रचनात्‍मकता पर लगाम नहीं लगाता और पैनी नजरों के साथ मिलीभगत के पूंजीवाद, भ्रष्‍ट नौकरशाही, राजनीतिक वंशवाद के विभिन्‍न ब्‍योरों को उजागर करता है।


फिल्‍म के प्रोमो देखकर हमें उसके बारे में बहुत कम पता चलता है, लेकिन उसके प्रति हमारी उत्‍सुकता बरकरार रहती है। ट्रेलर में दिखाए जाने वाले नाचते हुए अश्‍वेत लोग वास्‍तव में दास हैं, जिन्‍हें एक राजनीतिक वंश के कुलदीपक द्वारा अफ्रीका से इसलिए बुलवाया गया है, ताकि उनके जरिए अपनी गर्लफ्रेंड को इंप्रेस कर सके। इस फिल्‍म में ऐसी ही अनेक दूर की कौडि़यां मिलेंगी और निश्चित ही, वे सभी बेहद मजेदार और दिलचस्‍प हैं।


बस दिक्‍कत तभी होती है, जब फिल्‍मकार किसी मजाकिया सिचुएशन या किसी दृश्‍य को बहुत लंबे समय तक खींचने की कोशिश करता है।


इसी के साथ उस दृश्‍य में दर्शकों की दिलचस्‍पी जाती रहती है। कभी-कभी ऐसे मौकों पर महज एक जबर्दस्‍त डायलॉग ही बाजी मार सकता है।


भारद्वाज की पिछली फिल्‍म 'सात खून माफ' में चरित्रों की एक लंबी श्रृंखला थी। साथ ही, उसकी कहानी भी बहुत तगड़ी थी। लेकिन उसमें कोई दमदार पेंच नहीं था। इस फिल्‍म की दिक्‍कत इससे ठीक उलटी है।


इस फिल्‍म में जो पेंच है, वह वास्‍तव में बहुत वास्‍तविक और खरा है। वह हमारे समय को बहुत ताकत से प्रतिबिंबित करता है। फिल्‍म में शबाना आजमी एक राज्‍य की मुख्‍यमंत्री की भूमिका निभा रही हैं, जो दो दशकों से सत्‍ता में है। यदि संसार एक रंगमंच होता तो राजनेता उसके सबसे अच्‍छे अभिनेता साबित होते।


यूनानी भाषा में अभिनेता को पाखंडी कहा जाता है, और नेता शब्‍द सुनकर भी यह शब्‍द हमारे दिमाग में फौरन कौंध जाता है। महिला मुख्‍यमंत्री विकास और गरीबों के उन्‍नयन की बात करती है, जबकि वास्‍तव में वह खुद की तरक्‍की की कोशिशों में लगी रहती है। इस शेक्‍सपियरियन रंगमंचनुमा फिल्‍म के सभी अन्‍य किरदार भी ऐसा ही करते हैं।


दुख की बात यही है कि जिस तरह के डार्क ह्यूमर का निर्वाह 'जाने भी दो यारो' जैसी फिल्‍म ने पूरे समय किया था, वैसा इस फिल्‍म में कुछ ही मौकों पर दिखाई देता है। शायद अधिक किरदार जोड़कर और कहानी में अधिक पेंच लाकर इस फिल्‍म को थोड़ा और दिलचस्‍प बनाया जा सकता था। भारद्वाज की 'मकबूल' और 'ओमकारा' जैसी फिल्‍मों की यही तो खासियत थी।


लिहाजा, कभी-कभी यह फिल्‍म एक सपाट वामपंथी पोस्‍टर जैसी लगने लगती है। विडंबना यह है कि इस फिल्‍म के हीरो इमरान खान रोमांटिक फिल्‍मों के नायक हैं, वह दुनियाभर के सभी फिल्‍म उद्योगों में से सर्वाधिक दक्षिणपंथी फिल्‍म उद्योग बॉलीवुड की रचना है, उसके लिए अमेरिकन फॉक्‍स स्‍टूडियो ने पूंजीनिवेश किया है, जिसके मालिक रूपर्ट मर्डोक हैं। लेकिन आखिर यही तो पूंजीवाद की खूबसूरती है और यह समझदार-मज़ेदार फिल्‍म इस बात को साबित भी करती है।

Web Title: movie review: matru ki bijli ka mandola
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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