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स्कायफाल: सबसे बेहतरीन बॉन्ड !

मंयक शेखर | Nov 01, 2012, 22:03 PM IST

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    Critics Rating
    • Genre:
    • Director: सैम मेंडेस
    • Plot: पढ़िए दैनिक भास्कर डॉट कॉम से जुड़े फिल्म क्रिटिक मंयक शेखर द्वारा लिखा रिव्यू।

जेम्स बॉन्ड मर चुका है। फिल्म शुरू होते ही हम यह समझ जाते हैं। जैसा कि सभी बिग-‍टिकट, टॉप-क्लागस एक्शन पैक्ड फिल्मों के साथ होता है, यह फिल्म भी हैरतअंगेज स्टंट दृश्यों की एक श्रृंखला के साथ शुरू होती है। ऐसा माना जाता है कि दर्शकों के टिकट के पैसे वसूल करवाने के लिए ये एक्शन सीक्वेंस ही अपने आपमें काफी हैं।

कैसिनो रॉयल (2006) में डेनियल क्रेग को नए बॉन्ड‍ के रूप में दर्शकों के सामने पेश करने वाला ओपनिंग सीन संभवत: अब तक का सबसे हैरतनाक एक्शन सीक्वेंस था। लेकिन इस फिल्म के एक्शन दृश्य तो उससे भी एक कदम आगे लगते हैं। दर्शकों का यह चहेता एमआई 6 एजेंट गुरुत्वाकर्षण के नियमों को झुठला देता है। वह बाजार में विलेन्स का पीछा करता है और टर्की में भी उन्हें नहीं बख्शता। वह अपनी मोटरसाइकिल पर सवार है। क्लोजअप शॉट में एक ट्रक की भिड़ंत होती है और अब हम पाते हैं कि बॉन्ड एक ट्रेन की छत पर है।

आखिर यहीं वह अपनी जान से हाथ गंवा बैठता है। लेकिन हम जानते हैं कि ऐसा होने से दुनिया हिल जाएगी और बॉन्ड आखिरकार जिंदा बच निकलेगा। लिहाजा, वह फिर 'हर मेजेस्टी' की खिदमत में लौट आता है और अपने बॉस एम (बुजुर्गवार और हमेशा की तरह भरोसेमंद जुडी डेंच) के हुक्म की तामील करने लगता है। हम कह सकते हैं कि पश्चिम के कल्पनालोक का काम बॉन्ड के बिना नहीं चल सकता, फिर भले ही वक्त क्यों न बदल गया हो।

वक्त वाकई बदल गया है। और वक्त के साथ ही इयान फ्लेमिंग का यह सबसे मशहूर किरदार भी बदला है। अनेक सालों तक बॉन्ड की छवि एक गुड लुकिंग मेट्रो सेक्शुअल मैन की रही, जिसके तौर-तरीके तराशे हुए हैं और जो महिलाओं को बरबस लुभा लेता है। 90 के दशक में पियर्स ब्रोसन और उनसे पहले 80 के दशक में रोजर मूर ने बॉन्ड के इस मिथक को चरितार्थ किया था। लेकिन जबसे क्रेग (मेरे विचार से शॉन कॉनेरी के बाद वे बॉन्ड के चरित्र के सबसे करीब जाने वाले व्यक्ति हैं) बॉन्ड बने हैं, तब से बॉन्ड बदल गया है।

अब वह सिक्स पैक वाला एक ऐसा रेट्रो सेक्शुअल सितारा बन गया है, जिसके अंदाज से बेपरवाही झलकती है। उसकी जिंदगी का अब एक बड़ा मकसद है, यानी अपने देश के लिए उसका प्यार। इससे दो बातें हुई हैं, अव्वल तो बॉन्ड फिल्मों में एक्शन सीक्वेंस की तादाद बढ़ी है, साथ ही सेक्स और ह्यूमर की अहमियत घटी है। साथ ही फिल्म का मूड भी गंभीर हो गया है।

जब सब कुछ बदल रहा हो तो दुनिया के इस सबसे मशहूर जासूस के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग कैसे 70 के दशक तक सीमित रह सकते थे। लिहाजा बॉन्ड का नया गैजेट गुरु क्यू एक युवा, गीकी कंप्यूटर हैकर किस्म का छोकरा है। बॉन्ड गर्ल चायनीज है, हालांकि वह कुछ ही सेकंड के लिए परदे पर दिखाई देती है। विलेन भी अब सोवियत संघ के नहीं हैं। वास्तव में अब बॉन्ड की जान के दुश्मन हमारी वास्तविक दुनिया के विलेन्स की ही तरह हैं, बिना किसी एक तयशुदा चेहरे के वे लोग, जो किसी नक्शे पर नहीं होते और जिनका कोई झंडा नहीं होता।

जाहिर है, इससे किसी भी सीक्रेट सर्विस एजेंसी का काम और मुश्किल हो जाएगा। बॉन्ड का भी सामना ऐसे लोगों से है, जो उसे पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर सकते हैं। अपने हार्डकोर कंप्यूटर टर्मिनल से दुनिया के सूत्र अपने हाथ में ले लेने की कोशिश करने वाले खौफनाक सिल्वाट (जेवियर बार्देम) का चरित्र बहुत खूब रचा गया है। ऐसा लगता है, जैसे उसका चरित्र विकीलीक्स संस्थापक जूलियन असांजे को ध्यान में रखकर बुना गया है। उसके पास एक ऐसी हार्डडिस्क है, जिसमें नाटो के उन सभी अंडरकवर ऑपरेटिव्स के नाम हैं, जो दुनिया के सभी अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों में मुखबिर की हैसियत से मौजूद हैं। सिल्वाट की योजना है कि हर हफ्ते यूट्यूब पर उनकी वास्तविक पहचान लीक कर दी जाए।

इस फिल्म‍ के निर्देशक के रूप में सैम मेंडेस (रोड टु पर्डिशन, अमेरिकन ब्यूटी के निर्देशक) का चयन चौंकाने वाला था, लेकिन उन्होंने बेहतरीन काम किया है और बॉन्ड के चरित्र को एक नई प्रासंगिकता दी है। फिल्म के विलेन की प्रेरणा जरूर कमजोर जान पड़ती है, लेकिन तकनीक और आतंक के दुष्प्रभावों से जूझते फिल्म के किरदार हमारी वास्तविक दुनिया के लगते हैं। फिल्म में एक्शन दृश्य रुकने का नाम ही नहीं लेते और कहानी भी सरपट गति से आगे बढ़ती रहती है। जल्द ही हम अपने तर्कों को खारिज कर इस अद्भुत एमआई 6 एजेंट के कारनामों को देखने में तल्लीन हो जाते हैं। फिल्‍म में एक जगह सिल्‍वाट इस सुपर-स्‍पाई से पूछता है कि उसकी हॉबी क्‍या है।

वह जवाब देता है : फिर से जिंदा हो जाना। जाहिर है, बॉन्‍ड के सनसनीखेज सिनेमा को पचास साल पूरे हो चुके हैं और उसने दिखा दिया है कि उसे फिर से जिंदा हो जाना बखूबी आता है। वह आने वाले पचास सालों तक भी यह काम आसानी से कर सकता है।

Web Title: Movie Review
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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