Home »Reviews »Movie Reviews » Movie Review

मीडिया है विलेन, हाशमी हैं हीरो, भागो!

dainikbhaskar.com | Oct 26, 2012, 21:11 PM IST

मीडिया है विलेन, हाशमी हैं हीरो, भागो!
Critics Rating
  • Genre:
  • Director:
  • Plot: रश: इस फिल्‍म के निर्माता भी स्‍टारडम को केवल बॉलीवुड के चश्‍मे से ही समझ सकते हैं।

रश

निर्देशक: शमीन देसाई

कलाकार: इमरान हाशमी, आदित्‍य पंचोली

रेटिंग: *1/2

इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस इंडस्‍ट्री से वास्‍ता रखते हैं – सीमेंट, फर्टिलाइजर, फिल्‍म्‍स या न्‍यूज मीडिया – हर फील्‍ड के अपने स्‍टार्स होते हैं। लेकिन जाहिर है, इस फिल्‍म के निर्माता भी स्‍टारडम को केवल बॉलीवुड के चश्‍मे से ही समझ सकते हैं।

फिल्‍म का मुख्‍य चरित्र एक क्राइम रिपोर्टर है, जिसे हाल ही में एक न्‍यूज चैनल का एडिटर इन चीफ या कहें एडिटर इन चार्ज बनाया गया है। वह टेलीविजन स्‍टेशन के प्राइम टाइम शो को होस्‍ट करता है, जहां हर मिनट अपराध की खबरें ब्रेक होती हैं। अलबत्‍ता एडिटर की हाई लाइफ को दिखाने के लिए इस फिल्‍म के पास पर्याप्‍त मात्रा में बजट नहीं है। लिहाजा, वह बहामाज के बजाय गोवा में पार्टी मनाता है और उसका सुपर रिच बॉस यानी टीवी चैनल का मालिक (आदित्‍य पंचोली) ज्‍यादा से ज्‍यादा कुआलालंपुर तक ही जा सकता है।

लेकिन इस पॉपुलर जर्नलिस्‍ट की फैन फॉलोइंग किसी फिल्‍मी सितारे जैसी है। वह उत्‍पादों का विज्ञापन करता है और उसकी पर्सनल लाइफ हमेशा टैब्‍लॉइड पत्रिकाओं के लिए गॉसिप का विषय बनी रहती है। इस हीरो की भूमिका हाशमी ने निभाई है। और दुनिया को बरबाद करने पर आमादा विलेन और कोई नहीं, बल्कि उसकी न्‍यूज मीडिया इंडस्‍ट्री ही है। हैरत नहीं होनी चाहिए। पॉपुलर सिनेमा की हर पीढ़ी का अपना एक स्‍टॉक विलेन होता है। 50 के दशक की फिल्‍मों में जमींदार और सूदखोर विलेन होते थे, 70 के दशक की फिल्‍मों में स्‍मगलर्स और नेता विलेन होते थे, आज की फिल्‍मों में आतंकवादी और मीडिया विलेन की भूमिका निभा रहे हैं।

लेकिन ऐसा लगता है कि यह फिल्‍म किसी वैकल्पिक संसार में घटित हो रही है। एक ऐसी दुनिया, जहां कानून और पुलिस नाम की कोई चीज नहीं है और टीवी रेटिंग्‍स ही दुनिया को चला रही हैं। यह फिल्‍म आने वाले कल का एक अंधकारपूर्ण दृष्टिकोण पेश करती है। बस बात इतनी ही है कि आने वाला कल नहीं, बल्कि आज इस फिल्‍म की पृष्‍ठभूमि है और यह वही आज है, जिसमें अकेले भारत में ही लगभग 800 टीवी चैनलें चल रही हैं। इनमें भी अधिकांश न्‍यूज स्‍टेशंस हैं और वे मुनाफे में नहीं चल रहे।

लेकिन हमें इससे क्‍या मतलब। टीवी चैनल का मालिक वह दिखाना चाहता है, जो लोग देखना चाहता है और अपनी रेटिंग्‍स बढ़ाने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। एडिटर इन चार्ज साहब एक शिकंजे में फंस जाते हैं। कहते हैं न कि दुनिया में मुफ्त में कुछ नहीं मिलता, लिहाजा उसे भी अपनी मोटी तनख्‍वाह के लिए कोई न कोई कीमत तो चुकानी ही होगी।

जब फिल्‍म आखिरकार उसके टीवी स्‍टेशन द्वारा अख्तियार किए जाने वाले खतरनाक तौर-तरीकों का खुलासा करती है तो आपकी हंसने की इच्‍छा हो सकती है। लेकिन आप हंस नहीं सकते। क्‍यों? क्‍योंकि मेरे भाई यह इमरान हाशमी की फिल्‍म है। कोई भी इमरान हाशमी की फिल्‍में देखने इसलिए नहीं जाता कि वह एक अच्‍छी कहानी सुनना चाहता है। उन्‍हें तो बस सेक्‍स और सूफी सॉन्‍ग चाहिए। इस फिल्‍म में सेक्‍स तो नहीं है, लेकिन सूफी सॉन्‍ग्‍स जरूर इफरात में हैं। बेड़ा गर्क, फिर आखिर इसकी तुक ही क्‍या है!

Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करे! डाउनलोड कीजिए Dainik Bhaskar का मोबाइल ऐप
Web Title: Movie Review
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

Stories You May be Interested in

    Trending Now

    Top