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सदियों के अन्याय से पीड़ित मनुष्य

जयप्रकाश चौकसे | Oct 18, 2012, 10:11 AM IST

इस शुक्रवार को रिलीज हो रही संजीव जायसवाल की फिल्म 'शूद्र' की प्रचार सामग्री श्याम-श्वेत रंग में है और प्रोमो से अनुमान होता है कि यह पारंपरिक तौर पर निचले वर्ग की जातियां हैं, जिन्हें महात्मा गांधी हरिजन कहते थे और आजकल दलित कहा जा रहा है। 'शूद्र' देखी नहीं है, परंतु प्रचार सामग्री के आधार पर अनुमान होता है कि ज्वलंत मुद्दा उठाया गया है। आज माओवादी इसी शोषित वर्ग के दम पर तीव्र गति से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ा रहे हैं। जातिप्रथा और उससे जन्मीं कुरीतियां सबसे पुरानी और सबसे अधिक व्यापक प्रभाव रखती हैं और मनुष्य के मात्र मनुष्य होने की गरिमा को खंडित करती हैं। यह अनुमान है कि यह फिल्म जाति के नाम पर की गई बर्बरता को प्रस्तुत कर सकती है। इस कुप्रथा पर भारत में अनेक महान फिल्में बनी हैं।



किसी भी व्यक्ति को अछूत मानना मानवीय धर्म के विपरीत है। यह केवल भारत की समस्या नहीं है, अमेरिका में रेड इंडियंस ने अन्याय सहा, श्वेत-अश्वेत के भेद ने वहां भी अनर्थ किया है। अंतर केवल यह है कि भारत में यह अत्यंत व्यापक है और समय के साथ इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, क्योंकि यहां धर्म के ताने-बाने में इसे बुना गया है और बकौल मिथुन द्वारा 'ओह माय गॉड' में अदा किए गए संवाद कि धर्म का नशा अफीम की तरह है, जिसकी लत कभी नहीं छूटती।


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Web Title: Indian Cinema based on Caste and Religion
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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