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हीरो बनने के लिए सिर्फ एक चीज चाहिए, क्या है वो!

Dainikbhaskar.com | Jun 10, 2012, 01:28AM IST

आमिर खान के शो 'सत्यमेव जयते' में जिंदगी की चुनौतियों को जिंदादिली और साहस के साथ जी रहे शारीरिक रूप से अक्षम लोगों की बातों ने दर्शकों का दिल छू लिया।
 
श्रेया की जिंदादिली और जज्बे को सलाम
शो की शुरूआत आमिर ने ह्वीलचेयर से चलने वाली श्रेया चतुर्वेदी के वीडियो से की, जो 11 साल की हैं और मां प्रतिभा के साथ दिल्ली में रहती हैं। वह मां को अपना दोस्त मानती हैं। वह टीचर या डॉक्टर बनना चाहती हैं। वह खुद से चल नहीं पातीं इसीलिए मां की मदद से चलना सीखती हैं।
 

श्रेया को किसी से कोई शिकायत नहीं है। उनको उम्मीद है कि भगवान उनको चलना जरूर सिखा देंगे। वह सबसे बहुत प्यार करती हैं और अपनी अपंगता को लेकर निगेटिव फील नहीं करतीं। उनका कहना है कि भगवान ने उनको जो भी दिया है, उनसे वह खुश हैं।
 
शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद जिंदगी के बारे में इतना जिंदादिल खयाल रखने वाली बच्ची श्रेया की तारीफ करते हुए आमिर अगली कहानी की ओर बढे।
उन्होंने एक ऐसे इंसान की मिसाल पेश की जिसने अपनी शारीरिक अपंगता से लड़ते हुए उम्मीद के पंख लगाकर आसमान में उड़ान भरी।
 
शरीर का नीचला हिस्सा बेजान होने के बावजूद दिखाया बेमिसाल साहस
 
त्रिचरापल्ली के लालगुड़ी गांव में एक साधारण परिवार में जन्में साईं की रीढ़ की हड्डियों में परेशानी के कारण उनका ऑपरेशन तब हुआ, जब वह सिर्फ 13 दिन के थे। पता चला कि उनके शरीर का नीचला हिस्सा बेजान था। लेकिन, इसके बावजूद साईं ने कुछ बेमिसाल करने की ठानी। उन्होंने स्काइ डाइविंग की।
 
स्टूडियो में आमिर ने साईं से इस साहसिक काम के बारे में बात की और पूछा कि उन्होंने स्काइ डाइविंग करने की हिम्मत क्यूं किया?
 
साईं ने आमिर को उनके ही फिल्म 'रंग दे बसंती' की याद दिलाई जिसमें भगत सिंह का कैरेक्टर कहता है कि जो ऊंचा सुनते है उनको धमाके की जरूरत होती है। वह चाहते थे कि डिसएबिलिटी की वजह से डर रहा बच्चा कुछ ऐसा कर दिखाए जिसे देखकर इंडिया ही नहीं, दुनिया दंग रह जाए।
 
अपने मां-बाप के रिएक्शन के बारे में साईं ने कहा कि वह उनकी डिसएबिलिटी को लेकर कभी निराश नहीं हुए। पैरेंट्स ने उनको पढ़ाई करने का हौसला दिया। उनका दाखिला सामान्य बच्चों के स्कूल में कराया।
 
लेकिन, इसके लिए साईं को चार-पांच स्कूल बदलने पड़े क्योंकि प्रिंसिपल्स और टीचर्स उनके पैरेंट्स को बुलाकर कहते थे कि अन्य बच्चों पर उनका बुरा असर हो सकता है।
 
आमिर ने पूछा कि साईं यह सब देखकर कैसा महसूस करते थे? साईं ने कहा कि पहले तो निराशा होती है लेकिन बाद में आदत पड़ जाती है।
 
अपने कॉलेज लाइफ के बारे में उन्होंने बताया कि घर से दूर शहर में पढ़ाई करने के लिए उनको काफी तकलीफ उठानी पड़ी क्योंकि भारत में उनके जैसे लोगों की सुविधा के लिए इंफ्रस्ट्रक्चर नहीं है। वहां पढाई करते हुए यूनिवर्सिटी के रिजल्ट में वह टॉप फाइव में से एक थे। उनको इंफोसिस कंपनी में नौकरी मिली।
 
इंफोसिस ट्रेनिंग स्कूल में डिसएबल्ड लोगों के लिए बुनयादी सुविधाओं को इस्तेमाल करने के बाद साईं को महसूस हुआ कि वह कितना काम कर सकते हैं। उसके बाद आगे पढ़ाई के लिए वह अमेरिका गए तो यूनिवर्सिटी ने उनके लिए पहले से सारी बुनियादी सुविधाएं बना दी थीं।
 
साईं को यह देखकर गुस्सा आता है कि भारत में ऐसा क्यूं नहीं होता? उनको इस बात की भी नाराजगी है कि भारत में डिसएबल्ड लोगों को कहा जाता है कि यही उनका भाग्य है या किसी पाप का फल वह भुगत रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि ऐसी सुविधाएं दी जाएं ताकि ऐसे लोगों को डिसएबिलिटी का एहसास ही ना हो और वह अपनी एबिलिटी पर फोकस कर सकें।
 
 
साईं की जिंदगी में शिक्षा के कारण इतने बदलाव आए इसीलिए आमिर ने इस बात का भी महत्व बताया। इस मुलाकात के बाद शो में यह बताया गया कि आखिर वह कौन सी जगहें हैं, जहां विकलांगों को विशेष सुविधाओं की जरूरत होती है, जिसे साईं इंफ्रस्ट्रक्चर कह रहे हैं।
 
 
उदाहरण के लिए, किसी भी बिल्डिंग में चढ़ने के लिए सामान्य आदमी को सीढ़ियों की और चलने में अक्षम लोगों के लिए रैंप होने चाहिए। लेकिन, शो में वीडियो में दिखाया गया कि भारत में दिल्ली का इंटरस्टेट बस डिपो...बेंगलुरू का सरकारी दफ्तर की सीढियां...मुंबई के जनरल पोस्ट ऑफिस की सीढियां...कहीं शारीरिक कठिनाईयों से जूझते लोगों के लिए कोई सुविधा नहीं।
 

कहानी आंखो से महरूम आइआइटी में प्रोजेक्ट टीम लीडर कृष्णकांत माने की
 
कृष्णकांत माने बचपन से ही कुछ अलग थे। तीन साल से ही आंखों में तकलीफ होने लगी। कुछ दिनों बाद उनको दिखना बंद हो गया लेकिन जिंदगी से उनका इश्क कम नहीं हुआ। पढ़ाई जारी रखकर खास बनने की उनकी तैयारी शुरू हुई। कंप्यूटर से गहरी दोस्ती की और सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गए। आज आइआइटी में प्रोजेक्ट लीडर बनकर वह बीस लोगों को लीड करते हैं। खाली समय में कविताएं लिखते हैं और पहाड़ पर भी चढ़ते हैं। 
 
 

कृष्णकांत से आमिर ने पूछा कि पूछा कि क्या ट्रैकिंग में उनको डर नहीं लगता? जवाब में कृष्णकांत ने कहा कि खतरे तो जिंदगी में हर कदम पर है तभी तो इंश्योरेंस कंपनियां चल रही हैं। एक घटना को उन्होंने याद किया जब ट्रैकिंग के दौरान पहाड़ी गांव की एक बुढिया ने अफसोस जताते हुए कहा था कि उनके साथ चल रहे लोग मुझे पहाड़ पर चढ़ाकर बहुत बड़ा पाप कर रहे हैं...लेकिन लोगों ने बुढ़िया कि बताया कि कृष्णकांत ही उनको यहां लीड करके लाए हैं।
 
 
कृष्णकांत का कहना है कि सिचुएशन के सामने किसी को सरेंडर नहीं करना चाहिए। मां-बाप ने हमेशा उनको रेगुलर स्कूल में भेजा, जहां उनसे बराबरी का व्यवहार हो सके। कभी उनको अलग नहीं समझा। कृष्णकांत कहते हैं कि विकलांगों को खुद को किसी से कम नहीं समझना चाहिए और अपनी जिम्मेदारी का एहसास करना चाहिए। मां-बाप को ऐसे बच्चों को रेगुलर स्कूल में डालना चाहिए।
 
 
कृष्णकांत के मां-बाप ने भी लोगों से अपील किया कि वह अपने विकलांग बच्चों को स्वीकार करें और उनको रेगुलर स्कूल भेजें।
 
 
ऐसे बहुत कम स्कूल हैं, जिसमें विकलांगों को सामान्य बच्चों के साथ एडमिशन दिया जाता है। नई दिल्ली के अमर ज्योति स्कूल ने ऐसा करके मिसाल कायम किया है और दोनों तरह के बच्चों को साथ पढ़ाने के फायदे को साबित करके दिखाया है।
 
270 विकलांग लोगों ने मिलकर खड़ी कर दी वर्ल्ड की बेस्ट ई-लर्निंग कंपनी
 
अहमदाबाद की ई-लर्निंग कंटेंट बनानेवाली कंपनी 'डिजाइनमेट' में 70 फीसदी से ज्यादा लोग किसी न किसी शारीरिक परेशानियों से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्होंने इस कंपनी को खड़ा करने में बहुत बड़ा योगदान दिया है। ऐसे लोगों के काम करने के सपने को साकार करने का श्रेय जाता है सीइओ कैप्टन कमलजीत सिंह बरार को।
 

कैप्टन बरार ने कहा कि 270 विकलांग लोग उनकी कंपनी में काम कर रहे हैं और वह बहुत हार्ड वर्क करते हैं जिसके कारण उनकी कंपनी वर्ल्ड की बेस्ट ई-लर्निंग कंपनी बन गई हैं।

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