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दिलीप कुमार @90: जानिये 'रोमांटिक ट्रेजडी किंग' का सफरनामा

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पाकिस्तान के पेशावर में 11 दिसंबर को  दिलीप कुमार उर्फ मोहम्मद यूसुफ खान का जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया। एक संस्था वर्षों से प्रयास कर रही है कि दिलीप कुमार और उनके पड़ोसी राज कपूर के मकानों को अधिकृत करके वहां इन दोनों कलाकारों के संग्रहालय बनाए जाएं। सिनेमा अपने सौ साल मना रहा है और दिलीप कुमार का 90वां जन्मदिन है। वे 'ज्वारभाटा' 1944 से 'किला' 1998 तक सक्रिय रहे, परंतु इन दशकों में उन्होंने बमुश्किल साठ फिल्मों में अभिनय किया, क्योंकि हर फिल्म की अपनी तैयारी के लिए उन्हें समय लगता था। अगर वे पैसे के मोह में एक ही समय में अनेक फिल्में अनुबंधित करते तो काम में गहराई नहीं आती। उनके पिता पेशावर से आकर इगतपुरी में बसे थे और फलों का व्यापार करते थे। दूसरे विश्वयुद्ध के समय तत्कालीन सरकार ने उनका बंगला अपना रक्षा दफ्तर खोलने के लिए ले लिया तो परिवार को मुंबई आना पड़ा।

उनके पिता फिल्मों के खिलाफ थे और अपने मित्र पृथ्वीराज कपूर से कहते थे कि तू कैसा पठान है, जो भांडों का काम करता है। उनके पुत्र यूसुफ को बॉम्बे टॉकीज की देविकारानी ने दिलीप कुमार के नाम से 'ज्वारभाटा' में प्रस्तुत किया और फिल्म प्रदर्शन के बाद ही पिता को मालूम पड़ा तो उन्होंने उसे समझाने की कोशिश की। उन्हीं दिनों खबर थी कि मौलाना अब्दुल कलाम बंबई आ रहे हैं। अत: यूसुफ को लेकर पिता बॉम्बे सेंट्रल पहुंचे और मौलाना से इल्तिजा की कि बच्चे को समझाएं कि पठानों का काम अभिनय नहीं है। मौलाना साहब ने यूसुफ खान को सिर्फ इतना कहा कि जो भी करो, पूरी मेहनत और ईमानदारी से इबादत की तरह करना। दिलीप कुमार ने अभिनय प्रार्थना की तरह ही एकाग्रता और संजीदगी से किया। उन दिनों अभिनय पर पारसी थिएटर का प्रभाव था।


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