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...जब बिग बी को सांड ने उठाकर फेंक दिया था

Sharad Thakar | Oct 09, 2012, 15:03PM IST



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इधर अमिताभ के मुंडन के अवसर आ पहुंचा। बच्चे के जन्म के बाद उसके सिर के बाल उतारने की विधि को ‘मुंडन’ कहते हैं। मनसा खानदान में बच्चों के मुंडन विंध्याचल के जंगल में स्थित एक मंदिर में करने का रिवाज था। यह मंदिर विंध्यावासिनी देवी का मंदिर था। कवि हरिवंशराय जब 6 वर्ष के थे तब उनका मुंडन भी इसी स्थान पर हुआ था।



हालांकि इस समय की एक भीषण याद कवि की यादों में अब भी ताजा थी। खानदानी रिवाज के अनुसार बच्चों के मुंडन के इस प्रसंग पर देवी माता की पूजा के साथ एक बकरे की बलि देने का भी चलन था। 6 वर्षीय हरिवंश राय ने जिंदगी में पहली बार किसी अबोल प्राणी का कत्ल होते हुआ देखा था। यह याद उनके लिए बहुत डरावनी थी, कई दिनों तक वे इस घटना को भूल नहीं सके थे और बार-बार उनकी आंखों के सामने वही दृश्य घूमता रहा था।



बस, इसी बात को याद करके उन्होंने पत्नी तेजी से कहा.. ‘मुन्ना का मुंडन हम घर पर ही करेंगे, विंध्यावासिनी देवी के मंदिर में नहीं। क्योंकि वहां पर बकरे की बलि देनी होगी और मैं यह सहन नहीं कर सकता।..’



जबकि अमिताभ के मुंडन को लेकर कुछ और ही होना तय था। इन्हीं दिनों जब अमिताभ घर के आंगन में खेल रहे थे तभी यहां अचानक आ पहुंचे एक सांड ने उन्हें उठाकर फेंक दिया। जिससे अमिताभ के सिर में गंभीर चोट आ गईं। ताबड़तोड़ उन्हें चिकित्सालय ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने सिर में टांके लगाने की बात कही।



सिर में टांके लगाने के लिए बाल उतारने की जरूरत आन पड़ी। तुरंत ही बाल काटने वाले को बुलाकर अमिताभ के बाल उतार दिए गए। समय बहुत कम था इसलिए डॉक्टर ने ऐनेस्थेसिया दिए बगैर ही अमिताभ के सिर पर टांके भी लगा दिए, लेकिन अमिताभ इस दर्द के बाद भी रोए नहीं।



घर आकर उन्होंने गर्व के साथ पिताजी से कहा .. पिताजी आपने देखा! मुझे इतनी तकलीफ थी, फिर भी मैं नहीं रोया ।



शायद यही बात अमिताभ एक दिन पूरी दुनिया के सामने बोलने वाले थे कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’। वर्षो बाद फिल्म ‘मर्द’ के एक दृश्य में अमिताभ यह कहते हुए भी नजर आए कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता!’



ऐसी ही एक और घटना अमिताभ के बचपन में ही घटित हुई। अमिताभ की जिंदगी में सबसे पहले दो घनिष्ठ मित्र थे- नरेश पाल दास और शशि मुखर्जी।



एक बार नन्हे अमिताभ शाम के समय शशि के घर पर गिल्ली-डंडा खेल रहे थे। उस समय गिल्ली-डंडा उनका प्रिय खेल था। शशि के घर के बगीचे में दो पेड़ थे. एक अमरूद और दूसरा जामुन का।


अमिताभ को कच्चे अमरूद बहुत भाते थे। वे रोज अमरूद के पेड़ की डाली पर बैठकर ही अमरूद खाया करते। लेकिन एक बार उन्हें जामुन खाने का विचार आया। वह जामुन के पेड़ पर चढ़ गए, लेकिन जैसे ही एक डाली पर उन्होंने पैर रखा, डाली टूट गई और अमिताभ नीचे आ गिरे। हाथ-पैर छिल गए और पैरों में भी चोट लग गई।



खबर मिलते ही कवि बच्चन यहां दौड़े आए और अमिताभ लंगड़ाते-लंगड़ाते उनके साथ चल दिए। लेकिन इस बार भी शांत स्वभाव कवि ने अमिताभ को डांटा नहीं।


इसी बीच अमिताभ, पिताजी से कहते हैं.. ‘आपने देखा, मुझे कितनी चोट लगी, लेकिन मैं फिर भी नहीं रोया!’



कवि पिता ने समझाया, ‘बेटा कोई दुख हो या चोट लग जाए तो इस पर भी न रोना कोई महानता का काम नहीं, बल्कि समझदारी तो इसमें है कि हम यह कोशिश करें कि ऐसी स्थित ही उत्पन्न न हो।’


‘तुम्हें पता होना चाहिए कि जामुन के पेड़ की डालियां कमजोर होती हैं, जबकि अमरूद के पेड़ की डालियां मजबूत, इसलिए अमरूद की डालियों पर बैठा भी जा सकता है, लेकिन जामुन की डालियों पर नहीं।’



इधर पिता से उलट मां तेजी, अमिताभ की इस गलती पर फिर बिफर उठीं और उन्होंने अमिताभ को जमकर डांट लगाते हुए सख्त हिदायत दे डाली कि ‘आज के बाद तुम किसी पेड़ पर नहीं चढ़ोगे।’



लेकिन इस पर भी पिता का यही कहना था कि ‘मुन्ना, पेड़ पर चढ़ना कोई बुरी बात नहीं, बस यह ध्यान और सावधानी रखनी चाहिए कि कहीं तुम उस पर से नीचे न गिर जाओ।’



कवि के इन्हीं शब्दों ने अमिताभ को यह सीख भी दे डाली कि जिंदगी किस तरह चलती है। अमिताभ अपने जीवन में कई ऊंचाईयों पर पहुंचे लेकिन उन्होंने इस बात का हमेशा ध्यान रखा कि वे गिर न पड़ें। और वे कभी गिरे भी तो हर बार पिता की सीख को उन्होंने याद किया और उस पर अमल भी।


इसके साथ ही वे कठिन से कठिन समय मंे भी कभी रोए नहीं। फिलॉसफर पिता के चिंतन को स्पर्श कर उन्हांेने जीवन में यह बात हमेशा याद रखी..



‘लोग आपकी हंसी मंे शामिल होकर आपकी तरह हंस सकते हैं, लेकिन रोने पर वे आपके साथ रोएंगे नहीं’। इसलिए व्यक्ति को अपनी अंगत वेदना सहन करनी सीख लेना चाहिए, एक भी आंसू बहाए बिना।

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