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सिनेमा में कायम अखिल भारतीयता

Jay Prakash Chouksey | Oct 13, 2012, 11:40AM IST

आज खंडवा में मध्यप्रदेश शासन द्वारा लेखक सलीम खान (जिनका जन्म इंदौर में हुआ था) को किशोर कुमार पुरस्कार दिया जाएगा।


ज्ञातव्य है कि किशोर कुमार मुंबई में स्वयं का परिचय हमेशा खंडवावाले के रूप में दिया करते थे और उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप उनका दाह संस्कार उनके पुत्र अमित कुमार ने खंडवा में ही किया था।


मध्यप्रदेश सरकार इंदौर में जन्मी लता मंगेशकर के सम्मान में भी पुरस्कार समारोह आयोजित करती आ रही है और यह सिलसिला तीन दशक से जारी है। आज लताजी 83 वर्ष की हैं और सलीम साहब 77 वर्ष के हैं।


मुंबई फिल्म उद्योग को संवारने भारत के अनेक शहरों से लोग आए,जैसे कमाल अमरोही, साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी इत्यादि; परंतु अनेक प्रतिभाशाली लोगों ने अपने नाम के साथ अपने गांव या शहर का नाम नहीं जोड़ा, जैसे बड़नगर के कवि प्रदीप जिनका असली नाम प्रदीप भी नहीं है।


पेशावर से आए दिलीप कुमार और राज कपूर तथा पंजाब से देव आनंद, धर्मेद्र, दारा सिंह इत्यादि अनगिनत कलाकार। सतना से प्रेमनाथ और श्रीमती कृष्णा राज कपूर। देश के कोने-कोने से आकर लोग फिल्म उद्योग से जुड़े। कुमार सचिन देव बर्मन की तरह प्रथमेश बरुआ भी सामंतवादी परिवार से आए थे और अनन्य सुंदरी वनमाला भी ग्वालियर राजघराने से जुड़ी थीं।


देविका रानी भी रबिंद्रनाथ टैगोर के परिवार से संबंध रखती थीं और मीना कुमारी की मां भी टैगोर वंश की थीं। इस तरह देश के सभी क्षेत्रों से आए लोग अपने इलाके का लोकसंगीत और परंपराएं लेकर मुंबई आए और ऐसी फिल्में रचीं, जो सारे देश में लोकप्रिय हुईं।


दरअसल अखिल भारतीयता का एक प्रमाण फिल्में भी रहीं हैं और आज जब क्षेत्रवाद और विघटनकारी प्रवृत्तियां जोर पकड़ रही हैं, तब फिल्में एकता के भाव को अक्षुण्ण रखे हुए हैं। यह सच है कि भ्रष्टाचार चिंता का विषय है, परंतु देश का एक बने रहना उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है। नेताओं ने अपने बौनेपन से देश की विराटता को आंकने का प्रयास किया है।


आज भ्रष्टाचार और उसका विरोध आवश्यक होते हुए जिस तरह फोकस में है, उसमें अन्य विषयों पर बात ही
नहीं हो रही और शायद विकास भी पिछली कतार में बैठा दिया गया है।


विकल्प के अभाव में विरोध अपनी धार खो देता है। बिजली के बिल फाड़े जा रहे हैं और सस्ती बिजली का उत्पादन तथा बिजली की कमी के दौर में उसकी चोरी को नजरअंदाज किया जा रहा है। यहां तक कि आईपीएल तमाशे में बिजली के अपव्यय की बात कोई नहीं करता।



कई बार शंका होती है कि कहीं सारे विरोध आवरण तो नहीं हैं और असल मुद्दों को हाशिये में डालने की साजिश
तो नहीं है। हो सकता है कि दशकों बाद सबूत मिले कि भारत को ठप कर देने के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ था।


आज माओवाद के प्रभाव में इतने क्षेत्र आ रहे हैं कि देश के नक्शे पर लाल रंग सीधे आपकी आत्मा में प्रवेश कर जाता
है। माओवादी भी भारतीय ही हैं और उनका विरोध दलितों और भूमिहीनों को कुचले जाने के कारण है, परंतु अंधड़
और अंधकार रचने वाले इस ज्वलंत मुद्दे को उठने ही नहीं देते।


उत्तर-पूर्व के सारे प्रांत गैरभारतीयता की लहर की चपेट में आ चुके हैं और अब सरहदी इलाकों में आतंकवाद नई क्षेत्रीयता की शक्ल में सामने आ रहा है। इसका कोई विरोध नहीं करता। उपरोक्त हालात के बीच सिनेमा की अखिल भारतीयता की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है और इसीलिए खंडवा में किशोर कुमार की स्मृति में पूरी तरह धर्मनिरेपक्ष सलीम खान को सम्मान से नवाजा जानामहत्वपूर्ण हो जाता है।


किशोर कुमार की बहुमुखी प्रतिभा एक दैवीय चमत्कार था। उनके सनकीपन के किस्से प्रचारित हैं, परंतु मुझे दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि उनका एक दोस्त आर्थिक संकट में था और उस स्वाभिमानी को सीधे धन देना संभव नहीं था, अत: उन्होंने उससे कहा कि स्वप्न में उन्हें सर्पदंश का भय सताता है, अत: बंगले के चारो ओर खाई खोदने का ठेका अपने उस बिल्डर मित्र को दिया और बाद में शासन द्वारा इस तरह की खाई के काल्पनिक विरोध पर उसे टालने का ठेका दिया।


इसी तरह घर सज्जा का एक विदेश में प्रशिक्षित भारतीय विदेश से उनके पास गर्मियों के दिनों में थ्रीपीस गरम सूट पहनकर आया तो उसे टालने के लिए किशोर कुमार ने कहा कि मेरे ड्राइंग रूम को छोटे-से तालाब में बदलो, अतिथि नाव में बैठें, नौकर नाव में चाय लाए और छत में चौकोर छेद करो, ताकि चांदनी रात में
नौका विहार का आनंद प्राप्त करें। तीन पीस सूटधारी उलटे पैर भागा।


किशोर कुमार ने शास्त्रीय संगीत का अध्ययननहीं किया था, परंतु सुरों से वह बचपन से ही खिलौनों की तरह खेलते रहे और बाद में अपने औघड़पन से जोड़कर माधुर्य का संसार रचा।


सलीम साहब ने भी पटकथा लेखन का शास्त्र नहीं पढ़ा था, परंतु भारतीय किस्सागोई उनके जींस में थी और दरवेश की तरह उन्होंने जीवन यात्रा करते हुए पटकथा लेखन का ग्रामर रचा। पटकथा लेखन में सा रे गा मा पा धा नि सा की संगीत पट्टी का इस्तेमाल किया।


किशार कुमार की तरह सलीम साहब ने अपने बचपन की मासूमियत को अपने दिल में बचाए रखा। ज्ञातव्य है कि सागर के विट्ठलभाई पटेल ने प्रतिव्यक्ति मात्र एक रुपए का चंदा एकत्रित करके किशोर स्मारक बनाने की पहल की थी।  ?

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