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अपरिचय के विंध्याचल और संवेदना का सेतु

Jay Prakash Chouksey | Sep 29, 2012, 10:12AM IST
निर्माता आर. बाल्की की पत्नी गौरी शिंदे ने श्रीदेवी को लेकर फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’ बनाई है, जो पांच अक्टूबर को प्रदर्शित होने जा रही है। कई बार फिल्मों के नाम से उनकी कथा का अनुमान नहीं लग पाता, मसलन आज ‘बर्फी’ के लिए चर्चित अनुराग बसु की ‘गैंगस्टर’ एक प्रेमकथा थी। प्रारंभ में विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हीरानी की ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ कुछ-कुछ डेविड धवननुमा फिल्म लग रही थी, परंतु देखने पर ही ज्ञात हुआ कि यह महान फिल्म है। आज से छह दशक पूर्व पीएल संतोषी ने फिल्म बनाई थी ‘शिन शिनाकी बुबला बू’।

अनेक लोग विचित्र अबूझ नाम देखकर फिल्म देखने गए और कई लोग इसी कारण नहीं गए। बहरहाल, गौरी शिंदे की फिल्म के टाइटिल से अनुमान होता है कि यह भाषा को लेकर बनाई गई हास्य फिल्म है, परंतु देखने पर ज्ञात होता है कि पारिवारिक एवं मानवीय रिश्तों की भावनाप्रधान फिल्म है और संवेदना के अद्भुत संकेत इसमें हैं। यह फिल्म दो सतहों पर चलती नजर आती है, परंतु अंतिम दृश्य में स्पष्ट हो जाता है कि वे दोनों सतहें एक ही विचार-बिंदु पर आकर मिलती हैं। कथा की बुनावट रेशम की तरह महीन और मुलायम है। ऊपरी तौर पर हमें लगता है कि एक विवाहित स्त्री के अंग्रेजी सीखने की बात की जा रही है, परंतु फिल्मकार रिश्तों में आई दरार की बात कर रही हैं और असल मुद्दा तो वर्तमान कालखंड में संवेदना के भोथरा होने का है।

जीवन की भागमभाग हमें भावना संसार से दूर ले जा रही है और हम अपने स्वजनों की सुख-सुविधा के लिए साधन जुटाते-जुटाते उनकी भावनाओं को ही नजरअंदाज करके उन्हें भीतर से आहत कर रहे हैं। रोजमर्रा के जीवन में हम इतने निर्मम एवं क्रूर हो चुके हैं कि उन्हें कब, कैसे आहत कर दिया, इसका हमें अहसास तक नहीं होता। हम जान ही नहीं पाते कि अपनी बुद्धि, कार्य की व्यस्तता और सफलता के चक्रव्यूह में उलझे हम ऐसे सख्त एवं निर्मम हो चुके हैं कि जिधर से गुजरते हैं, उधर लहूलुहान भावनाओं का अंबार लग जाता है।

इस फिल्म को देखकर आपके बेहतर इंसान होने की संभावना है। हम इस कदर आत्मकेंद्रित व आत्ममुग्ध हैं कि हमें अपनी गर्वीली नाक के परे कुछ नजर नहीं आता। हम अपने स्वजनों को कब, कैसे अटाला या कचरे की पेटी बना देते हैं, यह भी नहीं जा पाते। हम सारा समय जज बने घूमते हैं, फैसले सुनाते हैं या फतवे जारी करते हैं।

फिल्म में अंग्रेजी सीखने का प्रयास करने वाली नायिका को मैनहट्टन याद करने के लिए ‘मैन’ और ‘हट्टन’ को अलग-अलग करने की सलाह दी जाती है और एक निर्णायक क्षण में बेचारी जजमेंटल (फैसले और फतवे देना) को भी जज और मेंटल अर्थात पागल में विभाजित करती है, परंतु अनजाने ही वह आत्मकेंद्रित व्यक्ति को पागल ही कह रही है, जो सत्य के निकट है।

फिल्म में इससे भी अधिक अनेक सूक्ष्म संकेत हैं। भारत में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है और यह भाषा समाज में सम्मान का प्रतीक बन चुकी है। फिल्म की नायिका को अपने परिवार के सदस्यों का सम्मान पाने के लिए भाषा सीखना जरूरी हो गया है और भाषा की राजनीति का सीधा संबंध मनुष्य की संवेदनहीनता से जुड़ जाता है और संवेदनहीनता के इसी बिंदु पर फिल्मकार हमें ले आती हैं, अत: कथा को दो सतह पर चलते देखने की भूल हो सकती है।

फिल्मकार ने अत्यंत किफायत से यह बात कही है। कहीं भी अतिरेक नहीं है, न भावना का और न ही भावाभिव्यक्ति का। यह नियंत्रण और सृजनात्मक अनुशासन पहली ही फिल्म में दिखाने वाली गौरी शिंदे को सलाम किया जाना चाहिए।फिल्म में नायिका कोई बारह बरस बाद अपनी सगी बहन की बेटी से मिलती है, परंतु समय के अंतराल, देशों और भाषा के अलग होने के बावजूद भांजी अपनी मौसी के दिल की भावना को समझ जाती है, जबकि
उसकी अपनी कोख से जन्मी बेटी दिन-रात साथ में रहकर भी नहीं समझ पाती।

पति बिस्तर पर बिछी चादर की सिलवटों को भी देख लेता है, परंतु अपनी पत्नी के भावना-संसार से अनजान है। इस फिल्म में तमाम रिश्ते यह भी कहते हैं कि दूरियां, सरहदें, सांस्कृतिक अंतर इत्यादि के बावजूद अगर आप संवेदनशील हैं, तो मनुष्य को समझ सकते हैं। मनुष्य और मनुष्य के बीच असली सेतु संवेदनशीलता है, यह एक सार्वभौमिक सर्वकालीन भाषा है।श्रीदेवी तकरीबन पंद्रह वर्ष बाद परदे पर आ रही हैं और यह उनके जीवन का श्रेष्ठ अभिनय है।

उसकी कोई मुद्रा, चाल-ढाल कुछ भी हमने अभी तक नहीं देखा है - वह पात्र शशि गोडबोले हैं। इस तरह पात्र की आत्मा में पैठना कम ही कलाकार कर पाते हैं। कई वर्ष पूर्व कमल हासन अभिनीत ‘सदमा’ में श्रीदेवी ने जिस अभिनय प्रतिभा को प्रस्तुत किया था, प्रतिभा के उसी सूर्योदय की तमतमाती दोपहर है, उनकी ‘इंग्लिश-विंग्लिश’।
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