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नादिरा, लुबना और माधवी

Jay Prakash Chouksey | Apr 26, 2012, 10:12AM IST
इस वर्ष ३ मई को कथा फिल्मों की शताब्दी के अवसर पर हर वर्ष की तरह आयोजित एक समारोह में राष्ट्रीय फिल्मों को पुरस्कृत किया जा रहा है। उस दिन सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दो फिल्मों को दिया जाएगा- मराठी भाषा की ‘दीओल’ और कर्नाटक की ‘ब्यारी’, जो साहित्यकार टी.के. रहीम की कहानी पर आधारित है।

कर्नाटक में बसा ब्यारी समुदाय कोई १३क्क् वर्ष पूर्व भारत आया था। उनकी अपनी भाषा भी है, जिसमें मलयाली और उर्दू तथा फारसी के शब्द हैं, परंतु लिपि कर्नाटक की है। बहरहाल, यह फिल्म महिला केंद्रित है और इसे स्त्री विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा मान सकते हैं। नायिका नादिरा का पिता धन के लालच में उससे उम्र में तीन गुना बड़े व्यक्ति से उसका शादी करा देता है।

उसके बचपन का मित्र और सखा अब्दुल बहुत गरीब है। नादिरा पूरी निष्ठा से पत्नी धर्म का पालन करती है और बच्चे को जन्म भी देती है। उसका उम्रदराज पति उसका और बच्चे का पूरा ध्यान रखता है, परंतु नादिरा के पिता का पैसे के लेन-देन को लेकर विवाद होता है और पिता अपनी पुत्री को घर ले आता है। नादिरा का पति अपना बच्च ले जाता है। लालची पिता एक अमीर शादीशुदा से उसकी शादी करना चाहता है, परंतु नादिरा के विद्रोह को देखकर सहम जाता है और उसके पति से लेन-देन के मामले में समझौता कर लेता है, परंतु इस्लाम के नियम के अनुसार वह अपनी तलाक दी गई नादिरा से विवाह नहीं कर सकता।

अब नादिरा का विवाह तीसरे पुरुष से हो और बाकायदा सुहागरात भी मनाई जाए, तब उसके तलाक देने के बाद ही नादिरा का निकाह उसके पूर्व पति से हो सकता है। यह शर्त इसलिए रखी गई है कि कोई भी पुरुष आवेश या क्रोध में तलाक नहीं दे और पश्चाताप की दशा में अपनी पत्नी को दोबारा पाने की उसे एक जज्बाती कीमत देनी पड़े। नादिरा का पति और पिता मिलकर ऐसे पुरुष की तलाश करते हैं, जो पैसा लेकर नादिरा से शादी करे और सुहागरात न मनाकर तलाक दे दे। इस काम के लिए नादिरा के बचपन के मित्र अब्दुल को चुना जाता है, जिसे दुबई जाकर रोजी-रोटी की तलाश के लिए धन चाहिए।

समझौते के तहत विवाह होता है, परंतु सुहागरात के समय अब्दुल तो अपने कौल पर टिका रहता है कि कमरे के अकेलेपन में किसने देखा कि शरीयत के मुताबिक पति-पत्नी हमबिस्तर हुए या नहीं, परंतु नादिरा कहती है कि कोई ऐसी जगह नहीं, जहां अल्लाह न हो। वह अपनी बात पर कायम है और अपने बचपन के सखा के साथ प्रेम करती है।

१९७७-७८ में मोहम्मद भाई नामक निर्माता ने कबीर खान के निर्देशन में कम बजट की ‘लुबना’ नामक फिल्म बनाई थी, जिसमें मानस मुखर्जी का संगीत था और निदा फाजली के गीत थे। कुछ इसी तरह की कहानी में नायिका का पति जिसने आवेश में तलाक दिया था, उसे दोबारा पाने के लिए एक ट्रक ड्राइवर को पैसे देकर शादी करने और बाद में तुरंत तलाक देने के लिए सौदा करता है। ट्रक ड्राइवर को अपनी पत्नी से बेइंतिहा इश्क हो जाता है और वह सौदे की रकम उसके पूर्व पति को वापस करता है, परंतु तलाक नहीं देने का फैसला करता है।

बलदेवराज चोपड़ा की तलाक की नायिका भी कहती है कि उसे वस्तु समझकर बार-बार खरीदा और बेचा नहीं जा सकता। इस फिल्म के किरदार नवाब थे, परंतु ‘लुबना’ और ‘ब्यारी’ मध्यम एवं निम्न वर्ग के पात्र प्रस्तुत करती है, क्योंकि सभी धर्मो की चक्की इन्ही दो वर्गो की महीन पिसाई करती है। यूं तो राज कपूर की ‘संगम’ की नायिका भी कहती है कि क्या तुम दोनों दोस्तों ने मुझे फुटबॉल समझा है?

हर देश का समाज महिलाओं के साथ दोहरे मानदंड अपनाता है और नादिरा तथा लुबना तो काल्पनिक पात्र हैं, परंतु इस्मत चुगताई, कृष्णा सोबती, मैत्रेयी पुष्पा और सारा शगुफ्ता जैसे अदीबों को भी नहीं बख्शा गया है। दुनिया के तमाम धर्मो में महिला के प्रति अन्याय हुआ है। ईसाई धर्म में भी नन के जीवन पर अनेक कहानियां हैं कि उन्हें कैसा कठिन और अस्वाभाविक जीवन जीना पड़ता है। माधवी को भी उसके पिता द्वारा अपने गुरु को दक्षिणा देने के लिए 500 सफेद घोड़ों की खातिर चार बार विवाह करना पड़ता है और अंत में गुरु उसे देखकर कहते हैं कि इतनी सुंदर कन्या को ही दक्षिणा के रूप में दे देते तो इतने कष्टों से नहीं गुजरना पड़ता। सभी धर्मो में आपसी विवाद हैं, परंतु महिला विरोधी समानता सभी में विद्यमान है।

आज इस्लाम के ७२ सेक्ट्स हो गए हैं और सभी एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं। हिंदू धर्म के विभिन्न संप्रदायों में सदियों संघर्ष रहा है। स्त्री को भोग्या बना दिया है। पुरुष के पास भोगने की शक्ति सीमित है, परंतु लालसा असीमित है। सलीम साहब का कहना है कि मोहम्मद साहब ने अपने बनाए सारे नियमों में केवल तलाक पर अपनी दुविधा अैर दु:ख जाहिर किया था। इस लेख का आधार रत्नोत्तमा सेनगुप्ता के लेख से साभार लिया गया है।
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