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कालातीत हैं आंसू और मुस्कान

 
Source: Jay Prakash Choksey   |   Last Updated 9:45 AM (09/02/2012)
 
 
 
 
7 फरवरी 2012 को चार्ल्स डिकेंस का जन्म हुए 200 वर्ष हो गए हैं और इस अवसर पर उनका स्मरण किया जा रहा है। उनकी रचनाओं पर आधारित फिल्मों का पुनरावलोकन हो रहा है। लंदन में उनके उपन्यासों में वर्णित सड़क, चौराहे और मकानों का सेट लगाया गया है। उनके द्वारा लिखे 'ऑलिवर ट्विस्ट' उपन्यास पर अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस और भारत में अनेक बार फिल्में बनी हैं। भारत में सातवें दशक में बनी एक फिल्म में संजीव कुमार नायक थे और 1980 में प्रदर्शित 'कन्हैया' में नसीरुद्दीन शाह और अमजद खान ने काम किया था। अमेरिका में 'ऑलिवर ट्विस्ट' पर बनी ऑपेरानुमा फिल्म को कालजयी रचना माना जाता है।



चाल्र्स डिकेंस की महत्वाकांक्षा नाटकों में अभिनय करना थी। असफल होने पर उन्होंने पत्रकारिता में हाथ आजमाया। गौरतलब है कि अभिनेता बनने की महत्वाकांक्षा के कारण उनके लेखन में नाटकीयता आई और साथ ही वह पाठक के सामने अभिनय कर रहे हैं, ऐसी शैली उन्होंने ईजाद की। उनके हृदय में पाठक से भावनात्मक तादात्म्य बनाने की ललक बहुत तीव्र थी।



अपने पाठकों को बांधकर रखने और उनकी संख्या बढ़ाने की इच्छा के कारण वे मजेदार प्रसंग रचते थे और पाठकों की प्रतिक्रिया का सम्मान करते हुए चरित्र-चित्रण में परिवर्तन भी करते थे। ज्ञातव्य है कि उन दिनों अखबारों और पत्रिकाओं में धारावाहिक उपन्यासों का प्रकाशन होता था। इसी तर्ज पर भारत के अखबारों में, विशेषकर बंगाली भाषा में प्रकाशन होता रहा है और आज इसी विधा का थोड़ा-सा दूसरा रूप टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले सीरियल भी हैं।



टेलीविजन पर सोप ऑपेरा आने के लगभग 150 वर्ष पूर्व ही चार्ल्स डिकेंस ने इस लोकप्रिय विधा का पूर्वानुमान प्रस्तुत कर दिया था। दरअसल आज चार्ल्स डिकेंस की प्रणाली को समझना जरूरी है, क्योंकि वर्तमान कालखंड लोकप्रियता को वृहद पैमाने पर गढऩे का कालखंड है। आज राजनीति, समाज, साहित्य, टेलीविजन और सिनेमा में लोकप्रियता के उलूक पर ही लक्ष्मी सवार है।



मीडिया में लोकप्रियता नई टकसाल है और इसे प्राय: सत्य भी माना जा रहा है। मीडिया पर सारे वर्ष सतत् होली जारी है, परंतु गुलाल से अधिक कालिख का प्रयोग होता है। धारावाहिक रूप से प्रस्तुत कथा के हर खंड में प्रारंभ, मध्य और अंत बनाना होता है और टेलीविजन में अंतिम दृश्य में अगले दिन की कथा में दर्शक की रुचि और उत्तेजना जगी रहे, इसके जतन करने पड़ते हैं। यह कतरा-कतरा, लम्हा-लम्हा नशा बनाने की तरह है।



दर्शक पाठक की कोहनी में गुड़ लगाने की तरह है, जो उसे हमेशा दिखता है, परंतु उसका मुंह वहां तक नहीं पहुंचता, गोयाकि खिलाते हुए भूख बनाए रखना है, पिलाते हुए प्यास बनाए रखना है। मुद्दा यह है कि क्या यह सृजन का बाजारीकरण करना नहीं है, सृजन की व्यावसायिकता नहीं है! यह दो विपरीत चीजों को मिलाना है और शुद्धता का नाश है। इसके साथ ही यह बात भी जुड़ी है कि आप जो सामाजिक सोद्देश्यता की बात कर रहे हैं, उसका अधिकतम लोगों तक पहुंचना जरूरी है, इसीलिए लोकप्रियता को भी साधना होता है। अगर श्रीकृष्ण ने गीता अर्जुन के कान में कही होती तो वह गीता नहीं बन पाती।



दो मित्रों का निजी वार्तालाप मात्र रहता। लोकप्रियता के हाथी पर बैठे महावत को अंकुश का प्रयोग करना आना चाहिए अन्यथा मदांध हाथी सब कुछ कुचल देता है और महावत को सूंड से उठाकर फेंक देता है। चाल्र्स डिकेंस के 'डेविड कॉपरफील्ड' में एक षड्यंत्र रचने वाली महिला पात्र मिस मोचर के बारे में पाठकों की शिकायत आने के बाद, लोकप्रियता की खातिर कुछ दिनों बाद पात्र की वापसी पर उसके द्वारा बोले गए झूठ को किसी के हित में न्यायसंगत ठहराया गया।



आजकल प्रसारित अनेक सीरियलों में षड्यंत्र करने वाली महिला को न्यायसंगत ठहराया जाता है। यहां यह कहने का प्रयास नहीं हो रहा है कि चाल्र्स डिकेंस खराब लेखक थे या सीरियल लेखक के समकक्ष थे। अच्छे साहित्यकार होने के साथ वे जानते थे कि लोकप्रियता बने रहने पर ही वे शक्तिपुंज की तरह टिके रहेंगे।



उस दौर में धारावाहिक प्रकाशन की अपनी सीमाएं थीं, परंतु आज दो सदी बाद भी चाल्र्स डिकेंस पढ़े जाते हैं, क्योंकि उन्होंने जमीन से जुड़े विविध पात्रों की रचना की और थीम में सामाजिक सोददेश्यता थी। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ 'ब्लीक हाउस' की रचना की थी। उनके गढ़े चरित्र फेगिन्स, आर्टफुल डॉजर, डेविड, पिकविक जीवंत पात्र हैं। उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित उनकी जीवनी से ज्ञात हुआ कि पिता के कर्ज के कारण उन्हें बंधुआ मजदूर की तरह अपना बचपन गुजारना पड़ा। उनकी रचनाओं में दर्द की तरंग उनके भोगे हुए यथार्थ के कारण जन्मी थी और आंसू किसी भी सदी में बहाए गए हों, उनकी नमी हमेशा महसूस होती है।
 
 
 
 
 
 
 
 
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