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'ओह माय गॉड' से जुड़े 5 Facts

जय प्रकाश चौकसे | Sep 28, 2012, 10:22AM IST
 
 



फिल्म 'ओह माय गॉड' का नायक कांजी मेहता धर्म के नाम पर चल रहे व्यापार की पोल खोल देता है और जब जनता धर्म के ठेकेदारों की पिटाई करना चाहती है, तब वह उन्हें रोककर इन ठेकेदारों को सुरक्षित जाने की अपील करता है। वह आम आदमी से कहता है कि इन झूठे आडंबरों की अवहेलना करें, उनकी 'दुकानें' बंद कर दें। सबसे बड़े मठाधीश मिथुन जाते समय कहते हैं कि धर्म एक अफीम है, इसकी लत आसानी से नहीं छूटती और कुछ ही समय बाद ये सब हमारी 'दुकानों' पर लौटेंगे, ये हजारों वर्ष पुरानी लत है। (पढ़ें, राखी गुलजार की 5 हकीकत: 15 साल बाद खोला मुंह, अमिताभ की शिकायत)




 

दरअसल इस अंतिम दृश्य में हम आस्था का आदर्श और आस्था के व्यापार की ताकत देखते हैं। मिथुन द्वारा बोला संवाद भारतीय सामूहिक अवचेतन का गहन क्लोज-अप है, उसका यथार्थ है। मनुष्य में आत्मविश्वास की कमी है और वह अपनी आस्था की खोट के कारण ही इन 'दुकानों' की ओर भागता है, जहां सुख, संतान, सफलता और स्वर्ग के 'पुडिय़ा' तावीज बेचे जाते हैं और धर्मभीरु लोगों को न केवल 'नर्क' का भय दिखाया जाता है, वरन उसके तथाकथित श्रेणीकरण का भेद भी बताया जाता है, जिसे सुनकर लगता है कि नर्क पकौड़े तलने की 'दुकान' है।


 

 
 
 

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