देव आनंद शम्मी कपूर की तरह नाच नहीं सकते थे, लेकिन रूमानी दृश्यों में उनका कोई सानी न था। लगता था कि वे अपनी नायिकाओं ही नहीं, बल्कि अपने गीतों के साथ भी रोमांस करते थे।
पिछले पांच माह में मैंने अन्ना आंदोलन और लोकपाल पर इतने शो किए हैं कि सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मैं उसी बारे में कुछ कहना चाहूंगा। मैं यह भी लगातार कहता आ रहा हूं कि अब इस बहस का निर्णायक क्षण आ गया है। लेकिन आज मैं एक ऐसे विषय पर बात करना चाहता हूं, जो मेरे दिल के करीब है। मैं उन तीन किंवदंतियों के प्रति अपनी आदरांजलि अर्पित करना चाहता हूं, जिन्होंने संगीत और संगीत के प्रस्तुतीकरण के विभिन्न रूपों के माध्यम से अपनी कलात्मक मेधा का परिचय दिया। शम्मी कपूर, जगजीत सिंह और देव आनंद में अगर कोई बात समान थी, तो वह यही थी कि उन्होंने संगीत को एक विशिष्ट अभिव्यक्ति प्रदान की और इसके जरिये अपना एक मुकाम बनाया।
इन तीन किंवदंतियों को हाल ही में हमने एक-एक कर गंवा दिया। उनके बारे में बात करते समय मुझे उनके संगीत के साथ ही उनके गीतों की गुणवत्ता भी याद आती है। १९५० और ६० के दशक के उन भूले-बिसरे दिनों की शम्मी कपूर और देव आनंद की रूमानी अदाएं आज भी एक स्टाइल स्टेटमेंट है। वहीं जगजीत सिंह ने एक समूची पीढ़ी के लिए गजलों के जादू को पुनर्परिभाषित किया था। उनका संगीत लोकप्रिय भी था और शुद्ध भी। शम्मी कपूर और देव आनंद द्वारा अभिनीत गीत और जगजीत की गजलें इतने सालों बाद भी अपनी ताजगी और अर्थवत्ता कायम रखे हुए हैं और इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाले अनेक वर्षों तक उनका जादू बरकरार रहेगा। आज भी उनके गीतों को रीमिक्स के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
निश्चित ही यहां यह महत्वपूर्ण होगा कि शम्मी कपूर और देव आनंद पर फिल्माए गीतों की धुनें रचने वाले संगीतकारों को उनकी श्रेष्ठता और माधुर्य का श्रेय दिया जाए, लेकिन यह भी सच है कि इन सितारों की मोहक अदाओं ने इन गीतों को जो सार्वभौमिक अपील दी है, उसे अन्यथा प्राप्त कर पाना कठिन होता। दुख की बात है कि इन अमर गीतों के रीमिक्स में उनके शब्दों के साथ छेडख़ानी की जाती है और उन पर नए दौर के कलाकारों द्वारा सस्ती हरकतें की जाती हैं।
उदाहरण के तौर पर देव साहब की फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ के मौलिक हिप्पी गीत की तुलना उसके रीमिक्स से करें। ‘अभी आंख सेंक रहा है... फिर मेरी स्कर्ट खींचेगा’ जैसे बोल गीत लेखन की कला में एक दुर्भाग्यपूर्ण पतनशीलता को ही रेखांकित करते हैं। इस तरह के गीतों की कोई रिकॉल वैल्यू नहीं है, इन्हें आज से पचास साल बाद कोई याद नहीं रखेगा। मुझे गहरा संदेह है कि ‘ऊ ला ला... चुटकी जो तुमने काटी तो’ (द डर्टी पिक्चर) जैसे हल्के गीत वक्त के कठिन इम्तिहान में कामयाब हो पाएंगे।
चलिए, अब एक-एक कर इन किंवदंतियों के बारे में बात करते हैं। सबसे पहले शम्मी कपूर। एक बार लंदन में एक विवाह समारोह के दौरान मुझे शम्मीजी के पास बैठने का सौभाग्य मिला था। मुझे याद है, जब उनकी तस्वीरें उतारी जा रही थीं तो वे एक के बाद एक मजाकिया चेहरे बनाते जा रहे थे, ताकि कोई भी उनका एक सामान्य फोटो न ले सके। उन्हें देखकर मुझे उनकी रुपहले परदे की उन अदाओं की याद हो आई, जिनके चलते वे सबका मन मोह लिया करते थे।
‘आजा आजा... मैं हूं प्यार तेरा’ और ‘ओ हसीना जुल्फों वाली जाने जहां’ जैसे गीत आज भी नाइटक्लबों में बजाए जाने वाले किसी भी गीत पर भारी पड़ते हैं। ये गीत अपने जमाने में बेहद लोकप्रिय थे और आज भी हमें झूमने को मजबूर कर देते हैं, लेकिन उनमें कोई सस्तापन न था। संगीत की ध्वनियां स्पष्ट थीं, हेवी डिजिटल ऑर्केस्ट्रा न था। और सबसे बड़ी बात यह कि इन गीतों पर थिरकने वाले शम्मी कपूर थे। आज की लगभग यांत्रिक कोरियोग्राफी की तुलना में उनकी स्टाइल और संगीत का प्रस्तुतीकरण बेजोड़ था।
देव आनंद शम्मी कपूर की तरह नाच नहीं सकते थे, लेकिन रोमांटिक दृश्यों में उनका कोई सानी नहीं था। मुझे हमेशा यही लगा कि वे केवल अपनी नायिकाओं ही नहीं, बल्कि अपने गीतों और गीतों की धुनों के साथ भी रोमांस करते थे। देव साहब पर फिल्माए अमर गीतों की गिनती बहुत लंबी हो सकती है। श्रोताओं पर उन गीतों के प्रभाव को आज भी महसूस किया जा सकता है। आज भी ऐसे गीत कम ही मिलेंगे, जिनका अपने श्रोताओं पर इतना गहरा असर पड़ा हो। मैं यह नहीं कह रहा कि आज प्रतिभाशाली लोग कम हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि जब सभी जानते हैं कि देव साहब के दौर के गीत अविस्मरणीय हैं, फिर आज के प्रतिभाशाली संगीतकारों को ऐसे मधुर गीत रचने के नियमित अवसर क्यों नहीं मिलते? खुद देव साहब ने जो फिल्में बनाई हैं, उनका संगीत भी अमर है और वे संगीत के प्रति उनके लगाव को प्रमाणित करती हैं।
जगजीत सिंह पूरी तरह बॉलीवुड संगीत का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। उन्होंने संगीत का एक समांतर संसार रचा और गजल को एक लोकप्रिय कलारूप बना दिया। पंकज उधास और अनूप जलोटा जैसे मेरे मित्र हमेशा याद करते हैं कि किस तरह जगजीत सिंह ने संगीत के एक नए दौर का सूत्रपात किया था। मैंने जगजीत सिंह के अनेक कंसर्ट देखे हैं और उनमें श्रोताओं को उनके साथ गाते-गुनगुनाते, तालियों की ताल देते भी देखा है। लेकिन इतनी लोकप्रियता के बावजूद उनकी कला की शुद्धता कभी कमतर नहीं पड़ी। उन्होंने गुलजार साहब के साथ मिलकर गालिब की गजलों को जन-जन तक पहुंचा दिया। जगजीत सिंह का हास्यबोध भी कमाल का था और वे अपने दर्शकों को बांधे रखना जानते थे। जगजीत सिंह ने हमेशा सीधे-सरल, लेकिन दिल छू लेने वाले गीत गाए।
संगीत के एक पूर्व विद्यार्थी के नाते मैं कहना चाहूंगा कि आज के प्रतिभाशाली लोग भी इन किंवदंतियों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। उनकी कला ने कभी मर्यादाएं नहीं लांघी, फिर भी उनकी लोकप्रियता तमाम सीमाओं से परे थी। वे अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कला के मूल्य हमेशा जीवंत रहेंगे।