कमाल धमाल मालामाल: सच में कमाल है!

जब सभी फिल्मकार अपनी फिल्में विदेशों में या दिल्ली, मुंबई में फिल्माने लगे हैं तो आप बेचारे प्रियदर्शन को दोष नहीं दे सकते कि उन्होंने गांवों को भुला दिया है। उनकी फिल्में बिल्लू, मालामाल वीकली, भूल भुलैया या यह फिल्म ग्रामीण पृष्ठभूमि पर ही हैं। अलबत्ता यह कहना कठिन है कि प्रियदर्शन के गांव भारत के किस हिस्से में बसे होते हैं। इस फिल्म का गांव ईसाई बहुल है, जिसमें पंचायत के लिए एक गिरजाघर है।
यह गोवा या केरल जैसा नहीं लगता, क्योंकि लोग जिस लहजे में बात करते हैं, वह महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश, दोनों से लिया गया मालूम होता है। ऐसा नहीं है कि इन सभी ब्योरों से कोई फर्क पड़ता है। लेकिन इस बात से जरूर फर्क पड़ता है कि इस गांव में जो व्यक्ति आया है, शायद वह भी किसी ऐसी जगह से आया है, जो कुछ भी नहीं है।
इस फिल्म में दर्शाए गए परिवार (ओम पुरी ने परिवार में बूढ़े पिता की भूमिका निभाई है) को लगता है कि यह अजनबी व्यक्ति उनका बिछुड़ा हुआ बड़ा बेटा है। उनका यह बेटा 18 साल पहले घर से भाग गया था! हमारे सामने मौजूद यह अजनबी कम से कम अपनी उम्र के पांचवें दशक में तो है ही। और इसके बावजूद वह परिवार यही बहस करता रहता है कि क्या यह व्यक्ति उनका बेटा हो सकता है।
उन्हें निश्चित ही अब याद नहीं है कि उनका बेटा कैसा दिखता था, कैसे चलता था, कैसे बोलता था, जबकि यह केवल 18 साल पुरानी बात है। खैर, यह भला आदमी पूरे दिन घर के बाहर कुदाल से खुदाई करता रहता है और कुछ न कुछ खाता रहता है। उसके बारे में कहा जाता है कि ‘खोदना और खाना’, वह बस ये ही दो काम करता है। वह कसकर मुक्का भी जमा सकता है। यह घर के दूसरे बेटे के लिए उपयोगी है, जिसकी लगातार पिटाई होती रहती है। लिहाजा अजनबी व्यक्ति उसका बॉडीगार्ड बन जाता है।
यह दूसरा बेटा (श्रेयस तलपड़े) निरा बौड़म है। कामकाज करने में उसका कोई भरोसा नहीं है और उसे बच्चों से भी मार खाने का डर सताता है। वह गांव की एक अमीर खूबसूरत लड़की से प्यार भी करता है। वास्तव में, वह लड़की ही उसे चाहती है। लेकिन आखिर कोई लड़की ऐसे ‘निकम्मे’ आदमी के प्रति आकृष्ट क्यों होगी, यह समझ से परे है। यह प्रेम कहानी ही पूरी पिक्चर के केंद्र में है। इसे कॉमेडी तो कतई नहीं कहा जा सकता। मेरा मानना है, यह पता लगाने के लिए कि नाना पाटेकर का चरित्र वास्तव में है क्या, आपको पूरी फिल्म में बैठकर जम्हाइयां लेनी होंगी।
क्या यह कहानी एक फीचर फिल्म बनाने के लिए काफी है? यदि डायरेक्टर प्रियदर्शन हैं, तो आपको इस सवाल का जवाब देने की कोई जरूरत नहीं। पिछले ढाई दशकों में प्रियदर्शन ने लगभग 70 फिल्में बनाई हैं। 90 के दशक के अंतिम सालों और 21वीं सदी के शुरुआती सालों में बनाई गई कुछ अच्छी फिल्मों (विरासत, हेराफेरी) को छोड़ दें तो वास्तव में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी फिल्में किस बारे में होती हैं, या वे उनकी खुद की मलयालम फिल्मों की रीमेक होती हैं या हॉलीवुड से उड़ाई गई होती हैं।
वर्ष 2005 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना कानून की घोषणा की थी, ताकि सभी भारतीय नागरिकों को साल में कम से कम सौ दिनों का काम दिया जा सके। प्रियदर्शन उससे कुछ समय पहले से बॉलीवुड में ऐसी ही योजना चला रहे हैं।
इससे बॉलीवुड के कुछ ऐसे अच्छे कलाकारों को रोजगार मिलता है, जिनके पास शायद साल के किसी खास समय में कोई काम न हो, जैसे असरानी, ओम पुरी, नीरज वोहरा, परेश रावल, शक्ति कपूर… हीरो या तो अक्षय कुमार को बनाया जा सकता है या सुनील शेट्टी को। कुछ समय बाद यह योजना पिटने लगी। इसलिए इस फिल्म के मुख्य कलाकार पाटेकर और तलपड़े हैं। जाहिर है कि निर्देशक अब भी अपनी किस्मत आजमाना चाह रहा है।






