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मूवी रिव्यू: 'जोकर' तो हम ही हैं

Mayank Shekhar | Aug 31, 2012, 18:17PM IST
Genre: ड्रामा
Director: शिरीष कुंदर
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Plot: सबसे पहली बात तो यह कि इस फिल्मर का नाम जोकर क्यों रखा गया है?

सबसे पहली बात तो यह कि इस फिल्मर का नाम जोकर क्यों रखा गया है? खैर, एक हद तक तो शायद इसीलिए कि यह फिल्म हमारी बुद्धिमत्ता का ही मजाक बनाती है।

इसके अलावा, फिल्म का यह शीर्षक ताश के उस पत्ते की ओर इशारा करता है, जिसका अपना कोई वजूद नहीं होता। यह पगलापुर नामक एक गांव के लिए रूपक है, जो किसी भी राज्य का हिस्सा नहीं है।

आजादी के समय एक नक्शाहनवीस ने देश के नक्शे पर इस गांव का नाम इसलिए दर्ज नहीं किया था, क्योंकि उसे पता चला था कि गांव के पागलखाने से पागलों का एक झुंड भाग निकला है और गांव में अफरातफरी मचाए हुए है।

लेकिन, निश्चित ही, यह गांव नक्शे पर न होने के बावजूद हकीकत में मौजूद था। एक बांध के कारण गांव को पानी की कोई दिक्कत नहीं होती और गांववाले उसकी मदद से खेती-बाड़ी कर सकते हैं।
रात को इस वीराने में जुगनुओं की रोशनी रहती है। 600 लोगों की आबादी वाले इस गांव के लोग ठीक-ठाक कपड़े पहनते हैं और फर्राटेदार हिंदी बोलते हैं। हालांकि उनमें से एक (श्रेयस तलपड़े) ने अपनी एक भाषा विकसित कर ली है।

एक बुजुर्ग व्यक्ति (असरानी) को लगता है कि वह अब भी 1940 के दशक में ही है और दूसरा विश्व युद्ध चल रहा है। एक और व्यक्ति है, जो मैटल का एक भारी ग्लोब दूसरे को थमाते हुए कहता है, 'कर लो दुनिया मुट्ठी में'।
जाहिर है, आप भारत सरकार से बचकर रह सकते हैं, लेकिन रिलायंस से कतई नहीं! इस अलग-थलग कस्बेर में हर उम्र के लोग हैं, लेकिन चूंकि यहां न के बराबर महिलाएं नजर आती हैं, इसलिए यह राज ही बना रहता है कि आखिर यहां बच्चे कैसे पैदा होते होंगे।
अक्षय कुमार ने एक ऐसे व्यक्ति का चरित्र निभाया है, जिसका जन्मा पगलापुर में ही हुआ है। वह जैसे-तैसे इस जंगल से बाहर निकलता है और अमेरिका में एक नौकरी पाने में कामयाब होता है। लगता है यह किसी को नहीं पता कि वह आखिर यहां से कैसे निकला?

अलबत्ता वे लोग उसे खोज निकालने के लिए एक फोन का बंदोबस्त कर लेते हैं। वे चाहते हैं कि वह वापस लौट आए और उनकी रक्षा करे। उनकी प्रॉब्लम बहुत सिंपल है, या कहें वह भारत की समस्या ओं से बहुत अलग नहीं है : पानी और बिजली। समाधान भी इतना ही आसान है : गांव वालों की दुर्दशा की ओर राजनेताओं का ध्यांन खींचना।
अक्षय कुमार इस फिल्मा में वैज्ञानिक अगस्य की भूमिका निभा रहे हैं, जिसके पास एलियंस से कनेक्ट करने वाली 'दुनिया की पहली मशीन' है। धरती से बाहर जीवन की तलाश करने के अपने प्रोजेक्टल के लिए उसे एक माह का एक्स टेंशन दिया गया है। सोनाक्षी सिन्हा (जिनके रोल की लंबाई पहली बार किसी गाने की लंबाई से अधिक है) हीरो की गर्लफ्रेंड का रोल निभा रही हैं।

 अगस्य वही करता है, जो वह अच्छी तरह से कर सकता है यानी देहातियों को यह सिखाना कि जमीन पर बने गोल घेरों का पता कैसे लगाया जाए। गोल घेरे यह साबित कर सकते हैं कि यहां एलियंस ने लैंडिंग की थी।
इससे हमें यह भी पता चलता है कि फिल्मकार मनोज नाइट श्यामलन की 'द साइन्सस' (2002) और शायद 'द विलेज' (2004) के भी फैन हैं। न्यूज मीडिया इस खबर को हाथोंहाथ लेता है। इस उपेक्षित गांव में अब ओबी वैन की कतार नजर आने लगती है। राजनेता भी इस मौके को भुनाने की कोशिश करते हैं। इससे यह साबित होता है कि हमारे फिल्मकार यह मानते हैं कि अनुशा रिजवी की फिल्म 'पीपली लाइव' (2010) और बड़े बजट के साथ बनाई जानी चाहिए थी। खैर, उन्होंने उसकी रीमेक तो वैसे भी बना ही ली है।
यदि मैं गलत नहीं हूं तो शायद इस फिल्म की योजना पहले एक 3डी साय-फाय एडवेंचर के रूप में बनाई गई थी। जाहिर है यदि गानों का बॉलीवुड रीमिक्स बनाया जा सकता है तो किसी साय-फाय कहानी का क्योंह नहीं। आखिर स्टीवन स्पिलबर्ग की एलियंस फिल्मि 'ईटी' (1982) भारत की ही तो देन थी। माना जाता है कि स्पिलबर्ग की उस ब्लॉकबस्टर फिल्मी के पीछे बुनियादी विचार सत्यजित राय का था। कोलंबिया पिक्चर्स ने वह आइडिया खरीदा और फिर दो दशकों तक हॉलीवुड उस पर फिल्में बनाता रहा। यह कोई बांग्ला कॉन्स्पिरेसी थ्योरी नहीं है, बात कुछ हद तक सही है।
इस फिल्‍म में हम जो एलियंस देखते हैं, वे वेजीटेबल्‍स से बने हैं। ऐसा जान-बूझकर किया गया है, क्‍योंकि वे एलियंस हैं ही नहीं। इसी तरह यह फिल्‍म भी एक साइंस फिक्‍शन फिल्‍म नहीं है। तो फिर यह एग्‍जैक्‍टली क्‍या है? यह तो इस फिल्‍म के लेखक, संपादक, निर्देशक शिरीष कुंदर ही बता सकते हैं। यदि उनकी पिछली फिल्‍मों ('जानेमन', 'तीस मार खां') से तुलना करें तो कम से कम इस फिल्‍म में एक आइडिया तो है ही। किशोर कुमार के गीत 'पांच रुपैया बारह आना' का एक वर्शन पूरी फिल्‍म में बजता रहता है। फिल्‍म का बैकग्राउंड स्‍कोर भी कुंदर ने ही रचा है।
अंत में अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई की टुकडि़यां इस गांव में दाखिल हो जाती हैं, वे मशीन गन और टैंक से हमला बोल देती हैं, हथियारों से लैस वाहनों की गहमागहमी शुरू हो जाती है… तब जाकर हम समझ पाते हैं कि किसी व्‍यक्ति को जाकर इस फिल्‍म के निर्देशक से कहना चाहिए कि वे अपनी क्रिएटिविटी की लगाम कसें। निश्चित ही, अक्षय कुमार ऐसा नहीं करने वाले। और न ही इस फिल्‍म के दर्शकों या दर्शकों की गैर मौजूदगी से ही ऐसा हो सकता है।

 
 
 
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