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'हीरोइन': मनोहर कहानियां!

मयंक शेखर | Sep 21, 2012, 16:05PM IST
Genre: ड्रामा
Director: मधुर भंडारकर
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Plot: मूवी रिव्यू: पढ़िए दैनिकभास्कर.कॉम से जुड़े फिल्म क्रिटिक मयंक शेखर द्वारा लिखा गया रिव्यू।

एक फिल्म अवार्ड शो के दौरान जो इस फिल्म के बजट को देखते हुए काफी भव्य कहा जा सकता है, गुजरे जमाने की मोहक अभिनेत्री हेलन को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया जाता है। हेलन इस फिल्म में शगुफ्ता रिजवी की भूमिका निभा रही हैं। अपनी एक्सेप्टेंस स्पीच में शगुफ्ता उन सभी लोगों का शुक्रिया अदा करती हैं, जिन्होंने उनके करियर के दौरान उनका साथ दिया। लेकिन गौरतलब यह है कि वे उन लोगों का भी शुक्रिया अदा करती हैं, जिन्होंने मुसीबत की घड़ी में उनका साथ छोड़ दिया, क्योंकि जैसा कि वे ठीक ही कहती हैं, ये ही वे लोग हैं जो हमें जिंदगी के सबसे जरूरी सबक सिखाते हैं।

शगुफ्ता अब बूढ़ी हो चली हैं और उन्हें नॉन-लीड रोल्स निभाने को मजबूर होना पड़ा है। भारतीय फिल्म उद्योग में ऐसे कलाकारों को 'चरित्र अभिनेता' कहा जाता है। उन्हें जितना कम पैसा मिलता है, उतना ही कम सम्मान भी मिल पाता है। शगुफ्ता न‍िश्चित ही ऐसी फिल्मों की हकीकत को बयां करती हैं। एक अन्य दृश्य में वे कहती हैं कि प्रसिद्धि जितना देती है, उससे ज्यादा हमसे छीन लेती है। वह हमारी आत्मा को रूखा-सूखा बना देती हैं। वे बिल्कुल सही हैं।

एक दशक से भी अधिक समय से मुंबई में जर्नलिज्म‍ करने और खासतौर पर मनोरंजन जगत को कवर करने के बाद मैं कह सकता हूं कि शो बिजनेस के सितारों और खासतौर पर बड़े सितारों का प्रसिद्धि के लिए पागलपन फिल्मी दुनिया की सबसे भयावह हकीकतों में से एक है। कुछ सितारे तो ऐसे हैं, जो प्रसिद्धि पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। वे निजी और सार्वजनिक बातचीत के दौरान खुद का भी अपमान करने से नहीं चूकते, ताकि इसी बहाने सही, दुनिया को पता तो चले कि उनका भी कोई वजूद है।

ऐसे में प्रसिद्धि की पागल तलाश अपने आपमें जीवन का मकसद बनकर रह जाती है। यह निश्चित ही चिंतनीय है। मेरा मानना है यह फिल्म प्रसिद्धि के इसी पागलपन के बारे में है। वह ऐसा कर पाने में कामयाब भी होती है, लेकिन केवल एक ही नजरिये से, जैसा कि भंडारकर की फिल्में अब तक करती रही हैं।

शगुफ्ता चंद लम्हों के लिए ही नजर आती हैं। इस छद्म त्रासदी के केंद्र में सेक्स है। यह एक भयावह परिदृश्य है, जिसमें मनोरंजन का पेशा रसूखदारों के लिए महज यौन सुख पाने का एक जरिया बनकर रह गया है। शायद, यही सच्चाई भी हो। बहरहाल, किसी फिल्म के लिए दुनिया को इस नजरिये से देखना उनके लिए मुनाफे का जरिया हो सकता है।

हीरोइन की मां एक कैबिनेट मंत्री के साथ संबंध बनाती है, जो उसकी बेटी के लिए पद्मश्री रिकमेंड करता है। हीरोइन का पुरुष सहायक एक अन्य पुरुष कॉरर्पोरेट प्रमुख को खुश करता है, ताकि हीरोइन एक एंडॉर्समेंट डील हासिल कर सके। हीरोइन खुद ड्रग्स और अल्कोहल के नशे में एक अन्य महिला अभिनेत्री को चूमती है। और यदि वह अपनी फिल्म के हीरो को अपसेट कर देती है (अपसेट करना यानी यदि वह उसके साथ संबंध बनाने को राजी नहीं होती है) तो सभी मान लेते हैं कि वह फिल्म के पोस्टर में एक स्टैलम्पो-साइज फोटो तक सिमटकर रह जाएगी। फिल्म के हीरो इसीलिए अपनी सह-अभिनेत्रियों में दिलचस्पी लेते हैं, ताकि वे ऑन स्क्रीन और ऑफ स्क्रीन उनसे अपना मन बहला सकें।

करीना कपूर (जिन्होंने कुशल और प्रभावी अभिनय किया है) ने हीरोइन की भूमिका निभाई है। वे खुद लंबे समय से बॉलीवुड की शीर्ष हीरोइन हैं। इन मायनों में, हो सकता है कि वे स्वयं को अभिनीत कर रही हों। वे जान-बूझकर अपने दर्शकों को शो-बिजनेस की उन अंधेरी गलियों में ले जाती हैं, जहां बेदिल, घमंडी और कामुक पुरुष जो चाहे कर सकते हैं। फिल्म बताती है कि यहां किसी भी औरत के सामने आगे बढ़ने का और कोई रास्ता नहीं है, सिवाय इसके कि वह खुद नर्क की इस आग में जलने को राजी हो जाए।

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म चांदनी बार के बाद से मधुर भंडारकर की अनेक फिल्मों की यही मूल थीम रही है। यह फिल्म केवल इन मायनों में उनकी पिछली फिल्मों से अलग है कि इसमें हीरोइन हिसाब बराबर करने की भी कोशिश करती है।

इस फिल्म की ट्रैजेडी क्वीन हीरोइन न केवल एक टूटे हुए परिवार की सदस्य है, बल्कि वह खुद बाय-पोलर डिसऑर्डर से ग्रस्त है। दवाइयों और मनोविश्ले‍षकों से भी उसे मदद नहीं मिलती। ऐसे में उसे केवल एक ही इलाज सूझता है और वह है आक्रामक प्रचार। वह शो-बिज गेम खेलने लगती है। वह एक क्रिकेट सितारे के साथ डेट करती है, जैसा कि बॉलीवुड की अनेक हीरोइनें करती हैं। यह स्वाभाविक भी है। जिस देश में कोई राष्ट्रीय नेता और नायक न हो, वहां क्रिकेटरों और फिल्म सितारों जैसी लोकप्रियता कम ही लोगों को मिल पाती है।

वे या तो इस प्रसिद्धि से फूलकर कुप्पा हो सकते हैं या अपनी चंद लम्हों की प्रसिद्धि के साथ सहज होकर रह सकते हैं। फिल्म की हीरोइन माही अरोरा यही करती है। हमें फिल्म के ये हिस्से इसलिए अच्छे लगते हैं, क्योंकि हम उसकी अद्भुत कामयाबी से प्रेरित हो सकते हैं। लेकिन दुख की बात है कि फिल्म में ऐसे अच्छे लम्हे चंद ही हैं।

निश्चित ही जिस फिल्म का शीर्षक हीरोइन हो, वह एक हीरोइन की दास्तान ही बयां करेगी। लेकिन इसके बावजूद हम उसके बारे में ज्यादा नहीं जानते। वह कभी इतनी बड़ी स्टार नहीं बन पाई थी कि उसके पतन से किसी को कोई फर्क पड़ता। वास्तव में पूरी फिल्म के दौरान हम प्रसिद्धि के जंगल में 'जीरोइन' से 'जीरोइन' तक के उसके सफरनामे को देखते हैं।

फिल्म इंडस्ट्री की पड़ताल करने वाली मुख्यधारा की बॉलीवुड फिल्में अब अपने आपमें एक विधा बन चुकी हैं। हाल ही में रिलीज हुई इस तरह की ढेरों फिल्मों में रामगोपाल वर्मा की 'नाच' सबसे बारीक पड़ताल करने वाली फिल्म थी, जोया अख्तर की 'लक बाय चांस ' सबसे ज्यादा रियलस्टिक और मिलन लुथरिया की 'द डर्टी पिक्चर' सबसे ज्यादा एंटरटेनिंग। इस कड़ी में 'हीरोइन ' एक स्पष्टवादी फिल्म है।

भंडारकर की फिल्मों की लोकप्रियता का एक राज यह भी है कि वे अमीरों (कॉरर्पोरेट), मशहूर लोगों (फैशन) या दोनों (पेज थ्री) के बारे में हमें कुछ सनसनीखेज बातें बताती हैं। हमारे दर्शकों में से एक बड़ा वर्ग ऐसे लोगों का है, जो इस दुनिया से अनजान हैं और वे कभी वहां तक नहीं पहुंच सकते। ऐसे में जब वे इस तरह की फिल्में देखकर थिएटर से बाहर निकलते हैं तो यही सोचते हैं कि वास्तव में उनका जीवन ही बेहतर है। इस फिल्म में सितारों के घर होने वाली तड़क-भड़क भरी पार्टियों में आमंत्रित किए जाने वाले अभिनेता भी अपने मेजबान को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। वे कहते हैं - इस ग्लैमर इंडस्ट्री में कौन फ्रॉड नहीं होता। जाहिर है, यह फिल्म बॉलीवुड के प्रति इस स्याह नजरिये को ही और मजबूत बनाने की कोशिश करती है।

ऐसे में इस फिल्म का वास्तविक रोमांच केवल अटकलों तक सीमित रह जाता है। मिसाल के तौर पर हीरोइन किस क्रिकेटर के साथ डेटिंग कर रही है : युवराज सिंह? और वह शादीशुदा अभिनेता कौन है, जो अपनी आत्मकथा लिख रहा है : शाहरुख खान? जब हीरोइन एक महिला के सिर पर रेड वाइन का गिलास उड़ेल देती है तो क्या यह रवीना टंडन के जीवन की एक घटना को दोहराने की कोशिश है? वह अभिनेता कौन है, जिसने हीरोइन का रोल कटवा दिया : अक्षय कुमार या आमिर खान? क्या अवार्ड शो के दौरान भी पुरस्कारों को लेकर मोल-भाव चलता रहता है?

हीरोइन कहती है, 'यदि मेरा कैरियर डावांडोल होता है तो मैं किसी उद्योगपति से ब्याह रचा लूंगी और एक आईपीएल टीम खरीद लूंगी। यदि मैं शिल्पा शेट्टी या प्रीति जिंटा होता तो मैं निश्चित ही मधुर भंडारकर पर मुकदमा ठोक देता!

लेकिन सस्ती गपशप के शौकीन इससे संतुष्‍ट हो जाते हैं। वैसे भी गहराई से यह जानने में उनकी कोई दिलचस्‍पी नहीं होती कि बॉलीवुड के अभिनेता और फिल्‍ममेकर्स वास्‍तव में इस फिल्‍म में दिखाए चरित्रों की तुलना में किस तरह अधिक प्रतिभाशाली और मेहनती होते हैं। क्‍या ये ही वे घटिया और गैर पेशेवर लोग हैं, जो ऐसी फिल्‍में बनाते हैं, जिनका पूरा देश दीवाना हो जाता है? लेकिन ये तो दीगर बातें हैं।

आप कोई भी फिल्‍म बना सकते हैं और यदि आपने उसका जोरदार प्रचार किया है तो लोग उसे देखने जाएंगे। जिस तरह से इस फिल्‍म को प्रचारित करके बेचा गया है, उससे तो यही लगता है कि शायद फिल्‍मकारों की यह सोच ही सही है।

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