देखिए-वेखिए जरूर ये 'इंग्लिश-विंग्लिश'!

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Star Cast:श्रीदेवी, आदिल हुसैन
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Director:गौरी शिंदे
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Producer:आर बाल्की
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Music Director:
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Genre:ड्रामा
कहानी
उसका नाम शशि है। यदि मैं ग़लती नहीं कर रहा हूं तो फिल्मकार उसका सरनेम नहीं बताता है, या कम से कम उस पर ज्यादा जोर नहीं देता है। इस तरह वह इस तथ्य को नजरअंदाज कर देता है कि वह देश के किस हिस्से से है, जो शायद इतना जरूरी है भी नहीं। वह घर पर तो अपने पति (आदिल हुसैन, उसकी तुलना में एक कमज़ोर किरदार) और दो बच्चों से हिंदी में ही बात करती है। उसके पति की हिंदी बहुत अच्छी नहीं जान पड़ती, लेकिन ज़ाहिर है यह कोई प्रॉब्लम नहीं है। प्रॉब्लम यह है कि शशि अंग्रेजी बोलने में बहुत सहज नहीं है।
शहरी भारत में अंग्रेजी बोलना भर ही काफी नहीं है, आपको उसे ब्रिटेन की महारानी की तरह बोलना आना चाहिए। ग्रामर की जरा-सी गलती या उच्चारण की छोटी-सी भूल भर से ही आप फौरन हंसी के पात्र बन सकते हैं। शशि ‘जैज़’ को ‘झास’ बोलती है। उसकी तेरह साल की बेटी, जिसे उस पर शर्म आती है, हंस पड़ती है। ऐसी अंग्रेजी बोलने वाली मम्मी के अच्छे दोस्त बनने से रहे।
लिहाजा शशि एक कम आत्मविश्वास वाली महिला बनी रहती है। यदि फौरी तौर पर देखें तो परंपरागत साड़ी पहनने वाली इस सुंदर, सुशील महिला, जो शायद अपनी उम्र की चौथी दहाई में है, को बड़ी आसानी से किसी भी मिडिल क्लास हाउसवाइफ में से एक माना समझा जा सकता है। लेकिन यह फिल्म धीरे-धीरे यह बताती है कि एक मां और पत्नी होना भी कोई छोटी-मोटी बात नहीं है, क्योंकि वह परिवार नाम के छोटे-से आशियाने को अनेक सालों तक सजाती-संवारती रहती है और परिवार ही हर समाज की बुनियादी इकाई होता है। लेकिन यह एक थैंकलेस जॉब है।
शशि के काम के महत्व को कुछ इस तरह नजरअंदाज किया जाता है कि शायद वह अपने ही महत्व को नजरअंदाज करने लगती है। लेकिन हर व्यक्ति में कोई न कोई खास प्रतिभा होती है। जैसे कि शशि की प्रतिभा यह है कि वह बेहतरीन लड्डू बना सकती है!
हिरणी जैसी आंखों वाली, साहसी, चंचल श्रीदेवी, जिन्हें हमने लम्हे, चांदनी, चालबाज जैसी फिल्मों में देखा है, इस फिल्म में शशि की भूमिका निभा रही हैं। श्रीदेवी? नहीं। मैं पिछले एक दशक में इस अभिनेत्री के इतने भक्तों से मिला हूं कि मुझे लगता है उन्हें ‘श्रीश्रीदेवी’ कहा जाना चाहिए। श्रीश्रीदेवी को भारत की पहली महिला सुपर सितारा कहा जाता है और यह वाजिब भी है। इसका कारण बता पाना कठिन है।
स्टारडम दर्शकों और कलाकार के बीच एक कॉस्मिक संबंध की तरह होता है। इसका उसकी फिल्मों से ज्यादा नाता नहीं होता। श्रीदेवी की आखिरी हिट फिल्म मेरे ख्चाल से लाडला थी, जो 1994 में आई थी। इसलिए यह फिल्म उनकी ‘कमबैक’ फिल्म मानी जा सकती है।
किसी जमाने में लोकप्रिय रहे, किंतु अब अपनी चमक गंवा चुके सितारों की नई फिल्मों के लिए ‘कमबैक’ शब्द का अक्सर बेजा इस्तेमाल किया जाता है।
खैर, कलाकार तो हमेशा वहीं रहते हैं, वास्तव में ‘कमबैक’ तो दर्शकों का होता है। लेकिन क्या अब वे ही दर्शक फिर से उस कलाकार की फिल्में देखने आएंगे? यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि पहले उन्होंने उस कलाकार की फिल्में देखना क्यों बंद कर दिया था।
किसी सुपर सितारे को अपनी फिल्म में लेना, जिसकी एक शानदार छवि दर्शकों के मन में बसी हुई है, और उसे अपने शिखर के दिनों के बुजुर्ग अवतार के रूप में पेश करना बेतुका है। अमिताभ बच्चन की मृत्युदाता और माधुरी दीक्षित की आजा नच ले के साथ ऐसी ही भूलें हुई थीं।
किसी भी सुपर सितारे की वह स्टारडम तो पहले ही इतिहास में दर्ज हो चुकी होती है और अपने मुकाम पर सुरक्षित रहती है। इन मायनों में श्रीदेवी, जो अब 49 साल की हो चुकी हैं, यहां एक सही व्यक्ति के साथ काम कर रही हैं। यह फिल्म श्रीदेवी की मौजूदगी से बहुत हैरान नजर नहीं आती।
इस फिल्म के निर्माता बाल्की ने अमिताभ बच्चन को चीनी कम में एक प्यारा-सा किरदार निभाने का मौका दिया था, जिसके पास मौजूदा दौर के हावभाव थे। अमिताभ के दर्शक इसके अभ्यस्त नहीं थे। पा में उन्होंने यह भी दिखाया कि वास्तव में अमिताभ कितने जबर्दस्त अभिनेता हैं। 70 के दशक के सुपर सितारे राजेश खन्ना की मृत्यु से पहले उन्होंने उन्हें सीलिंग फैन के एक विज्ञापन में खुद पर हंसने का मौका दिया।
फिल्म की निर्देशक गौरी शिंदे बाल्की की पत्नी हैं। लगता है गौरी की गहरी दिलचस्पी इस बात में है कि एक सीधी-सरल, दिल को छू लेने वाली कहानी कैसे सुनाई जाए। श्रीदेवी की लोकप्रियता से केवल इतना ही फ़ायदा होता है कि इस कहानी को लोगों की एक बड़ी तादाद तक पहुंचाया जा सकता है। ऐसा ही होना भी चाहिए।
अपने कैरियर के दौरान ही अक्सर श्रीदेवी की आलोचना उनकी खराब हिंदी के लिए की जाती थी। शायद इस बात से हम अंदाजा लगा सकते हैं कि उन्होंने इस भूमिका को क्यों चुना होगा। वे निश्चित ही अपने किरदार को बहुत अच्छी तरह से समझी हैं। शशि अपनी भतीजी की शादी के सिलसिले में न्यूयॉर्क पहुंचती है।
यह शहर अनेक संस्कृतियों का संगम स्थल है। शशि तय करती है वह कोई इंग्लिश स्पीकिंग क्लास जॉइन करेगी। अपनी अंग्रेजी दुरुस्त करने के लिए वह किसी को बताए बिना होबोकेन से मैनहटन की ट्रेन पकड़ती है। रास्ते में उसके कुछ नए दोस्त बनते हैं। हम जानते हैं कि उसकी जिंदगी बदल सकती है। लेकिन गनीमत है कि फिल्म उसके जीवन के इस बदलाव को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताती। यह बदलाव बहुत बारीकी-से दिखाया जाता है। आखिर चार हफ्तों के दौरान परिस्थितियां इतनी ही तो बदल सकती हैं।
एक गोरे व्यक्ति को इस खूबसूरत स्त्री से प्यार हो जाता है, जबकि वह खुद यह भूल चुकी होती है कि वह अब भी कितनी आकर्षक है। वह व्यक्ति फ्रांसीसी है, इसलिए उसकी भी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं है। लेकिन भारतीय होने के नाते शशि दो भारतीय भाषाएं अच्छी तरह बोल लेती है।
फर्क यह है कि फ्रांसीसी भाषा, जर्मन, या जापानी या स्पेनिश की ही तरह, अंग्रेजी के औपनिवेशिक श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त नहीं है। जबकि भारत में अंग्रेजी स्टेटस और क्लास का पैमाना बन गई है। वह नकचढ़े और सीधे-सरल लोगों को विभाजित करने वाली सीमारेखा हो सकती है।
एक तरफ कॉन्वेंट में पढ़े लोग हैं, दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में पढ़े लोग, एक तरफ पॉश रेस्तरां है तो दूसरी तरफ मामूली-सा ठिया, एक तरफ चतुरसुजान पिता है तो दूसरी तरफ वह मां, जो दुनिया के बारे में कुछ नहीं जानती। शशि भारत की कोई भी मिडिल क्लास मां हो सकती है। वेकअप सिड की मां का किरदार भी ऐसा ही था, जो नाहक ही एक जटिल भाषा से संघर्ष करती है। ब्रिटिश सीरिज माइंड योर लैंग्वेज से प्रेरित लोकप्रिय टीवी शो जबान संभाल के भी इसी पर आधारित है।
अंग्रेजी भाषा शहरी भारत में एक मजबूत लेकिन बेवकूफीभरा विभाजन बन गई है। किसी भी दूसरी भारतीय फिल्म ने इस आयाम को इतनी खूबसूरती से आज नहीं फिल्माया था। गौरी शिंदे अपने संजीदा और हल्के-फुल्के लम्हों से भरपूर स्क्रीनप्ले की मदद से ऐसा कर दिखाती हैं। हां, हमें यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए और केवल इसी कारण नहीं कि श्रीदेवी इस फिल्म से कमबैक कर रही हैं।



