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मूवी रिव्यू: 'तलाश'

Mayank Shekhar | Nov 30, 2012, 15:30PM IST
Genre: सस्पेंस/थ्रिलर
Director: रीमा कागती
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Plot: वास्‍तव में तलाश एक मर्डर मिस्‍ट्री है। इसमें आमिर एक आम आदमी की भूमिका निभा रहे हैं, या कह सकते हैं मुंबई जैसे गहमागहमी भरे शहर में एक मामूली पुलिस वाले की जो हैसियत हो सकती है, इस फिल्‍म में उनकी भी वही हैसियत है।

शेखावत दंपती (आमिर खान, रानी मुखर्जी) एक पुलिस हाउसिंग कॉलोनी के एक नए अपार्टमेंट में रहने आए हैं। उनकी अधेड़ पड़ोसन (शेरनाज पटेल), जो उनके लिए अपरिचित है, उनके दरवाजे पर दस्‍तक देती है।


वह उनकी मददगार होने का दिखावा करती है, चाय मांगती है, घर में टहलने लगती है, बंद बक्‍सों के एक ढेर के बीच एक युवा लड़के की तस्‍वीर देखती है और अचानक कहती है : हैलो, ये तो करन है। तकरीबन आठ साल का यह लड़का, जो शेखावत दंपती की इकलौती संतान था, अब इस दुनिया में नहीं है।


हमें अभी तक यह पता नहीं है। यह फिल्‍म का शुरुआती दृश्‍य है। अब हमें यह भी पता चलता है कि वह अधेड़ औरत मृतात्‍माओं से बात कर सकती है। हम फौरन समझ जाते हैं कि यह फिल्‍म हमारे दिमाग को कुछ समय तक उलझाए रखने वाली है। कुछ हद तक वह ऐसा करने में कामयाब भी होती है।


 


अपनी इकलौती संतान गंवा चुके एक अवसादग्रस्‍त दंपती की यह समांतर उपकथा इस फिल्‍म को एक मजबूत बुनियाद मुहैया कराती है। जिन माता-पिता को अपने इकलौते बेटे का अंतिम संस्‍कार करना पड़ा हो, उनके दर्द को बयां नहीं किया जा सकता। इस तरह के जख्‍म कभी नहीं भर पाते हैं, वे हमेशा हमारे भीतर जिंदा रहते हैं। न तो पति और न ही पत्‍नी, इस हादसे से अब तक उबर पाए हैं। पूरी फिल्‍म में यह त्रासदी एक अंतर्धारा की तरह बहती है। पत्‍नी उस अधेड़ औरत की बातों में आ जाती है, लेकिन पति को उसकी बातों पर यकीन नहीं होता।


आमतौर पर थ्रिलर फिल्‍मों की आलोचना करना आसान होता है, लेकिन इस थ्रिलर फिल्‍म में सुपरनेचुरल का भी पुट है। इस तरह की अनेक फिल्‍मों में कोई भावनात्‍मक आधार नहीं होता। ऐसे में यदि फिल्‍म की बुनियाद कमजोर साबित हुई तो पूरी संभावना बनी रहती है कि फिल्‍म बेसिर-पैर की साबित हो जाए।


वास्‍तव में 'तलाश' एक मर्डर मिस्‍ट्री है। इसमें आमिर एक आम आदमी की भूमिका निभा रहे हैं, या कह सकते हैं मुंबई जैसे गहमागहमी भरे शहर में एक मामूली पुलिस वाले की जो हैसियत हो सकती है, इस फिल्‍म में उनकी भी वही हैसियत है।


फिल्‍म में आमिर का लहजा शांत और संयत है, लेकिन उनमें दृढ़ता की कमी नहीं है। पुलिस वालों की कहानियों से जुड़ी घिसी-पिटी बातों को यह फिल्‍म आराम से नजरअंदाज करती है। वह हमें यह नहीं बताती कि यह पुलिस वाला कितना बहादुर है। इसके बजाय वह हमें यह बताती है कि वह कितना कुशल इन्वेस्टिगेटर है।


वह जिस हाई प्रोफाइल केस को डील कर रहा है, वह एक टॉप फिल्‍म स्‍टार से संबंधित है, जिसकी कार अलसुबह अचानक समुद्र में जा गिरी थी। इस लोकप्रिय अभिनेता की लाश कार के भीतर से ही बरामद होती है। इस सितारे की मौत और इंस्‍पेक्‍टर शेखावत के बेटे की मौत के बीच एक बात समान है : दोनों की मौत पानी में डूबने से हुई थी।



तहकीकात के दौरान पुलिस इंस्‍पेक्‍टर की मुलाकात शहर के कुछ अजीबोगरीब किरदारों से होती है। इनमें सबसे अहम है चकलाघर संचालक का विकलांग गुर्गा, जिसका नामकरण उचित ही तैमूरलंग के नाम पर किया गया है।


यह भूमिका बेहतरीन अदाकार नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने निभाई है। इंस्‍पेक्‍टर की मुलाकात एक खूबसूरत प्रॉस्ट्टीयूट (करीना कपूर) से भी होती है, जो इस केस को सुलझाने में उसकी मदद करने को तैयार है।


तहकीकात यह की जा रही है कि फिल्‍म सितारे ने मरने से पहले नोटों की एक गड्डी किसे दी थी और इसके लिए चकलाघर संचालक पूछताछ के दायरे में है। हम समझ जाते हैं कि हर अपराध के पीछे मूलत: दो ही कारण होते हैं : पैसा या सेक्‍स।


फिल्‍म अंधेरे पहलुओं को उजागर करती है। कुछ गीत गुनगुनाने लायक हैं, लेकिन बैकग्राउंड स्‍कोर न के बराबर रखा गया है। इस तरह की खामोश फिल्‍म में जबर्दस्‍त संवादों की बहुत दरकार होती है, लेकिन दुख की बात है कि फिल्‍म के संवाद इतने दमदार नहीं हैं।


आमिर का अभिनय उनके द्वारा 'धोबी घाट' में निभाई गई भूमिका की याद दिलाता है, जो 'थ्री इडियट्स' में उनके द्वारा निभाई गई भूमिका से नितांत भिन्‍न था।


फिल्‍म का कथानक संतुलित है और वह हमें बांधकर रखने में कामयाब होता है। फिल्‍म देखते समय मैं तो भूल ही गया था कि मैं एक खचाखच भरे प्रेस प्रिव्‍यू शो में बैठा हूं।


इंटरवल में जाकर मुझे या शायद हम सभी को यह समझ आया कि वास्‍तव में हम एक थिएटर में बैठे हैं, लेकिन इंटरवल में भी लोग यही बात कर रहे थे कि वे जानते हैं आमिर ही खूनी हैं।


लोग कह रहे थे कि उन्‍हें एसएमएस मिला है कि आमिर ही मर्डरर हैं। किसी भी फिल्‍म का इससे बेहतर प्रचार नहीं हो सकता कि लोग उसकी कहानी के बारे में जिज्ञासा के साथ बातें करें। इस मायने में यह फिल्‍म लोगों की जिज्ञासा जगाने में तो कामयाब होती ही है।




 


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