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शीरीं फरहाद की तो निकल पड़ी: चलिए, अब निकला जाए!

Mayank Shekhar | Aug 24, 2012, 15:21PM IST
Genre: कॉमेडी
Director: बेला सहगल
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Plot: मूवी रिव्यू: पढ़िए दैनिकभास्कर.कॉम से जुड़े फिल्म क्रिटिक मयंक शेखर द्वारा लिखा रिव्यू।

फरहाद पस्ताकिया 45 साल के हो चुके हैं, और यकीनन, वे अब तक कुंआरे हैं। चूंकि वे हमेशा से ही शादी करने में इंट्रेस्‍टेड रहे हैं, इसलिए यह समझ पाना मुश्किल है कि आखिर उन पर अभी तक महिलाओं की मेहरबानी क्योंड नहीं हुई। उनकी उम्र के लिहाजा से वे दिखने में भी बुरे नहीं हैं – लंबे-तगड़े, हैंडसम, मृदुभाषी और खाते-पीते खानदान से ताल्लुक रखने वाले। फिल्म की पटकथा हमें बताती है कि उनकी अभी तक शादी न हो पाने की वजह यह है कि वे एक ब्रा एंड पेंटी शॉप में सेल्समैन हैं। इस एक बात ने ही उनका बेड़ा गर्क किया है।
उनकी मां उन्हें जरूरत से ज्यादा चाहती हैं और उनके लिए एक अच्छी दुल्हन खोजने के लिए कमर कसे हुए हैं। उम्मीदें अब भी हैं। लेकिन मां उन्हें चेताती हैं कि यदि वे इसी तरह कुछ और समय तक अपनी दुल्हन का इंतजार करते रहे तो उन्हें शादी के लिए केवल 'विधवाएं और तलाकशुदा महिलाएं' ही मिलेंगी।
फरहाद पारसी समुदाय से वास्ता रखते हैं। पारसी लोग दसवीं सदी में ईरान से भारत रहने चले आए थे। यहां इतना समय बिताने के बावजूद पारसियों ने अपनी पुरानी समृद्ध परंपराओं को बचाए रखा है और वे अपने समुदाय में ही वैवाहिक संबंध बनाने पर जोर देते हैं। लिहाजा अगर फरहाद सेटल डाउन हो जाना चाहते हैं तो उन्हें एक पारसी लड़की से ही ब्याह करना होगा। लेकिन आखिर उन्हें ऐसी लड़की मिलेगी कहां से? खैर, इस सवाल का जवाब देना बहुत कठिन नहीं है।
अनेक पारसी लड़कियां कॉलोनियों की चहारदीवारी के भीतर रहती हैं और उन्हें जिमखानों में भी अक्सर पाया जा सकता है। इसके अलावा किसी पारसी को दूर से भी पहचाना जा सकता है और इसकी वजह है पारसियों का खास सेंस ऑफ ह्यूमर और ब्रुन मस्का, पुरानी मर्सीडीज बेंज, रसभरी या मैंगो फ्लैवर वाली ड्यूक्स् ड्रिंक के प्रति उनका प्रेम। ड्यूक्स कभी एक पारसी ब्रांड हुआ करता था, लेकिन अब उस पर पेप्सी की मिल्कियत है। वास्तव में पेप्सी ने ही इस फिल्म को स्पॉन्सर भी किया है।
यह फिल्म‍ वास्तव में इस प्यारे और अद्भुत समुदाय की विचित्रताओं और विलक्षणताओं को कैप्च‍र करने की एक कोशिश है। ऐसे पारसी, जिनके सामने हम पब्लिक मीटिंग्स् में मेजें-कुर्सियां उछालने वाले, पिस्तौल दागने वाले और आमतौर पर अधपगले इंसानों की तरह बर्ताव करने वाले मनुष्य नजर आते हैं। मेरा मानना है कि इस दृष्टिकोण से कोई फिल्म बनाना एक थर्ड-रेट हवाई ह्यूमर को बढ़ावा देने जैसा है। यह वाकई फनी नहीं है।
जाहिर है, फरहाद को आखिरकार अपनी शीरीं मिल ही जाती है। शायद शारीं की उम्र भी फरहाद जितनी ही है। वे एक पारसी ट्रस्ट में काम करती हैं। फरहाद को तो मारे खुशी के उछल ही पड़ना चाहिए। यकीनन, वे ऐसा ही करते हैं। उनकी मां भी अब राहत की सांस ले सकती हैं। वेल, अगर ऐसा हो जाए तो फिल्म का मतलब ही क्या रह जाएगा?
लिहाजा, होता यह है कि लड़के की मां को लड़की कतई पसंद नहीं आती। क्यों? क्योंकि लड़की ने उनके घर से एक वाटर टैंक हटवा दिया था। जी हां, यही इस फिल्मी का पेंच है और दर्शकों से उम्मीद की जाती है कि वे दो घंटे तक बैठकर इस बुनियादी पर बनाई गई फिल्म को निहारते रहें।
पारसी फरहाद की भूमिका बोमन ईरानी ने निभाई है। वे इसी तरह के लेकिन इससे बेहतर रोल पहले भी निभा चुके हैं। उनके द्वारा इस अधपकी फिल्म के लिए रजामंदी देने की एकमात्र वजह यही हो सकती है कि बॉलीवुड में उनके जैसे परिपक्व चरित्र अभिनेताओं को केंद्र में रखकर न के बराबर फिल्में बनाई जाती हैं। लेकिन इसके बावजूद यह फिल्म देखने आए अनेक दर्शक किसी खास वजह से ही थिएटरों में आए होंगे। फरहा खान, जो अपने कजिन फरहान अख्तर की ही तरह आधी पारसी हैं, ने शीरीं की भूमिका निभाई है।
वे खुद पेशेवर फिल्म‍मेकर हैं, लेकिन भारत के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में से एक बोमन ईरानी के समक्ष केंद्रीय भूमिका में वे बेहद असहज और अस्वाभाविक लगी हैं। यदि हम उन दोनों के बीच की केमिस्ट्री की बात करने बैठें तो पाएंगे कि इसकी तुलना में शायद केमिस्ट्री की किसी टेक्स्ट बुक के बारे में बात करना ज्यादा दिलचस्प होगा।
निश्चित ही, इस फिल्‍म के शीरीं और फरहाद उन विलक्षण प्रेमियों की दास्‍तान से प्रेरित नहीं हैं, जिनके नाम पर उनका नामकरण किया गया है। यह फिल्‍म स्‍वयं पारसियों से ही प्रेरित है। आज दुनिया में बहुत कम तादाद में पारसी बचे रह गए हैं और भारत के बहुत कम शहरों में पारसियों की बसाहटें हैं। देश की शो-बिज राजधानी मुंबई उन चुनिंदा शहरों में से है, जहां पारसी रहते हैं। और यही कारण है कि हमारी अनेक बॉलीवुड फिल्‍मों में इस समुदाय के लोग पाए जाते हैं।
बीते कुछ सालों में पारसियों पर केंद्रित कुछ फिल्‍में आई हैं और सिनेप्रेमियों ने उन्‍हें खूब सराहा है, जैसे होमी अदजानिया की बीइंग साइरस (2005), सूनी तारापुरवाला की लिटिल जिजू (2009), राजेश मापुस्‍कर की फरारी की सवारी (2012)… लेकिन जब हम इस घालमेल फिल्‍म को देखकर थिएटर से बाहर निकलते हैं तो हमारे जेहन में एक ही बात घूमती रहती है : "डीकरा, व्‍हाट वाज दिस?"

 
 
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