ओह माय गॉड: भगवान के नाम पर...

आखिर कोई धर्म के बारे में तटस्थ होकर कैसे बात कर सकता है? बहुत कठिन है। ईश्वर के बारे में कुछ भी कहो तो या किसी की संवेदनाओं को ठेस पहुंच जाती है या दुनियाभर में आक्रोश की लहर फैल जाती है। इन मायनों में, यह फिल्म उतनी ही जरूरी है, जितनी कि खुली बहसें जरूरी होती हैं और तब इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। कम से कम यह फिल्मी सवाल पूछने का साहस तो दिखाती है। लेकिन आखिरकार यह एक व्यावसायिक फिल्म है, जिसकी एक नजर उन संवेदनशील दर्शकों पर है, जो ईश्वर में आस्था रखते हैं और इसीलिए वे कभी उन लोगों में शामिल नहीं होंगे, जो ईश्वर पर सवाल उठाते हैं। खुद सवाल उठाना तो दूर की बात है।
इसीलिए, यह फिल्म दो कदम आगे बढ़ाती है तो तीन कदम पीछे लौट जाती है। परेश रावल, जिन्हें गुजराती दर्शकों के बीच अभिनय के भगवान की हैसियत प्राप्त है, इस फिल्म में एक ऐसे व्यक्ति कंजीलाल की भूमिका निभा रहे हैं, जो भगवान को नहीं मानता। होता यह है कि एक भूकंप में उसकी दुकान तहस-नहस हो जाती है। मुझे लगता है कि कंजीलाल को भगवान नहीं, बल्कि भगवान के नाम पर होने वाले कर्मकांडों और संगठित धर्म से प्रॉब्लम है, जिसके तहत पंडित और मौलवी भगवान के स्व नियुक्त एजेंटों की तरह अपना प्रभाव स्थापित करते हैं और पैसा कमाते हैं। उसकी यह सोच वाजिब ही है कि ये लोग आम आदमी को या तो असहाय बना देते हैं या खूंखार आतंकवादी।
कंजीलाल की दुकान का बीमा कराया गया था, लेकिन इंश्योरेंस कंपनी 'ईश्वर के प्रकोप' जैसे बिजली गिरना, भूकंप या सुनामी से उसकी दुकान को होने वाले नुकसान के एवज में कोई रकम नहीं दे सकती। जाहिर है, वह ईश्वर के विरुद्ध तो कोई केस दायर नहीं कर सकता, लेकिन चूंकि चेरिटेबल ट्रस्ट, मंदिर, गिरजाघर और मस्जिदें ईश्वर के प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं, इसलिए यह तर्कसंगत ही होगा कि वे ईश्वर के स्थान पर इस केस का सामना करें। चमत्कार की बात तो यह है कि हाईकोर्ट भी इस केस को दर्ज कर लेती है! तब यह फिल्म एक साथ बहुत मजेदार और गंभीर हो जाती है।
यह फिल्म एक लोकप्रिय नाटक 'किशन वर्सेस कन्हैया' पर आधारित है, जिसे भावेश मांडलिया ने लिखा है। परेश रावल वास्ताव में इस नाटक में भी मुख्य भूमिका निभा चुके हैं। दुख की बात यही है कि यह फिल्म मंचित किए जाने वाले नाटकों की अतिरंजित मुद्राओं से उबर नहीं पाती। इस खूबसूरत स्क्रिप्ट को एक बेहतर ट्रीटमेंट की दरकार थी, ताकि वह उतना ही अच्छा स्क्रीन प्ले भी साबित हो पाती। लेकिन फिल्ममेकर स्क्रिप्ट में केवल एक ही बेहतर आयाम जोड़ने के बारे में सोच पाए हैं और वह है 'आइटम सॉन्ग'!
फिल्म में भगवान की भी एक भूमिका है। ब्रूस आलमाइटी जैसी फिल्मों (या फिर सलमान खान की गॉड तुस्सी ग्रेट हो, जो उस हॉलीवुड फिल्म की नकल थी) की तरह मनुष्य को बनाने वाले भगवान यहां खुद एक आधुनिक और पश्चिमी वेशभूषा धारण करने वाले व्यक्ति की तरह दिखाए जाते हैं। उन्हें देखकर लगता नहीं कि उन्होंने दूसरे ग्रहों और जीव-जंतुओं की भी रचना की होगी। यह भूमिका छरहरे अक्षय कुमार ने निभाई है, जो स्पोर्ट्स बाइक पर अवतरित होते हैं और बांसुरी बजाने के शौकीन हैं। शायद यह छवि भगवान कृष्ण को ध्यान में रखते हुए गढ़ी गई होगी। आखिरकार, नास्तिक कंजीलाल आस्तिक बन जाता है। वह हमें उपदेश देता है कि दुनिया की सभी समस्यायओं के जवाब कुरान, गीता और बाइबिल में हैं।
हम अचानक आस्था पर सवाल उठाना बंद कर देते हैं। समझौता जाहिर है। लेकिन इसके बावजूद यह फिल्म काफी हद तक धर्म और उसके संदर्भों पर बहस करने को तैयार दिखती है। सभी कलाओं को यही करना चाहिए, लेकिन आजकल वे इतनी भयभीत हो गई हैं कि ऐसा नहीं कर पातीं।
हमें इस बात की खुशी होनी चाहिए कि एक नाटक को फिल्म का स्वरूप दिया गया, फिर चाहे यह बेढंगे क्लोज-अप्स, दूसरे दर्जे के स्टूडियो सेट्स और औसत परफॉर्मेंस वाली फिल्म ही क्यों न हो। यह लगभग तय है कि देर-सबेर यह फिल्म टीवी पर भी प्रसारित की जाएगी। वास्तव में इसे देखे जाने की सही जगह भी वही है। उम्मीद है कि इसे देखने के बाद इस पर बहस भी की जाएगी।






