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MOVIE REVIEW: 'काई पो छे'

dainikbhaskar.com | Feb 22, 2013, 10:24AM IST
MOVIE REVIEW: 'काई पो छे'
Genre: ड्रामा
Director: अभिषेक कपूर
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Plot: अगर आपको ऐसी फिल्में देखने का शौक है जिसमें कोई संदेश हों,सकारात्मक विचार हों,जिसकी कहानी ऐसे लोगों के इर्द गिर्द घूमती है जो जीवन में संघर्ष कर अपनी मंजिल तक पहुंच जाते हैं तो आपको 'काई पो छे' किसी भी कीमत पर मिस नहीं करनी चाहिए।

तीन पक्‍के दोस्‍तों की कहानी वाली किसी भी फिल्‍म में एक दृश्‍य जरूर होता है। बैकग्राउंड में म्‍यूजिक बज रहा होता है। नौजवानों का समूह शहर से बाहर किसी दूर-दराज की जगह पर है। नशे की झोंक में वे जरा उन्‍मुक्‍त हो जाते हैं। अपनी शर्ट उतारते हैं, अपनी बलिष्‍ठ काया का प्रदर्शन करते हैं और प्राइवेट स्विमिंग पूल के बजाय किसी कम्‍युनिटी लेक में छलांग लगा देते हैं।


इस फिल्‍म में भी इसी से मिलता-जुलता एक दृश्‍य है। हो सकता है कि इस दृश्‍य की प्रेरणा रंग दे बसंती से मिली हो, जिसका निर्माण इस फिल्‍म की ही तरह यूटीवी ने किया था।


रॉक ऑन में भी इसी तरह का एक दृश्‍य था, जिसके निर्देशक अभिषेक कपूर ने यह फिल्‍म भी निर्देशित की है। लेकिन इस फिल्‍म के दोस्‍तों का एक समूह नईदिल्‍ली और मुंबई की तुलना में छोटे शहर अहमदाबाद से वास्‍ता रखता है। बहरहाल, उनकी ख्‍वाहिशें अलग नहीं हैं।


इस फिल्‍म में मुख्‍य भूमिकाएं निभाने वाले तीनों अभिनेता नए कलाकार हैं। इससे यह फायदा होता है कि फिल्‍म इस तरह के झमेले में नहीं पड़ती कि उनमें से केंद्रीय किरदार कौन है, कौन किससे बेहतर है, किसका रोल बड़ा है और हीरोइन का प्‍यार उनमें से किसको मिलेगा, वगैरह-वगैरह।


इससे यह भी फायदा होता है कि कलाकार पूरी तरह से फिल्‍म की लय के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं। जाहिर है, इससे फिल्‍मकार भी अपनी कहानी ज्‍यादा बेहतर ढंग से सुना सकते हैं।


तीनों दोस्‍तों में से एक (सुशांत सिंह राजपूत, इस भूमिका के लिए उनका चयन सूझबूझपूर्ण था) एक नाकाम क्रिकेटर है। वह गुस्‍सैल मिजाज का नौजवान है, लोगों में आसानी से घुलता-मिलता नहीं है, लेकिन जैसा कि इस तरह के लोगों के बारे में अमूमन कहा जाता है : वह दिल का भला और यारों का यार है।


दूसरा दोस्‍त (राजकुमार यादव, बेहतरीन कलाकार) एक टिपिकल गुजराती है : उद्यमी, एकाग्र, पैसे वाला और हिसाब-किताब से चलने वाला। तीसरा दोस्‍त (अमित साध) एक हिंदू पुजारी का बेटा है, लेकिन उसकी अपनी कोई शख्सियत नहीं है।


दोस्‍तों के ग्रुप में इस तरह के किरदार अमूमन कॉमन होते हैं, जो केवल अपने दोस्‍तों के साथ रहकर ही खुश रहते हैं। फिलवक्‍त ये तीनों ही दोस्‍त एक क्रिकेट कोचिंग एकेडमी, खेल के उपकरणों की दुकान और मैथ्‍स ट्यूशन सेंटर के अपने-अपने काम में मशगूल हैं।


ये लड़के अहमदाबाद के लोअर मिडिल क्‍लास परिवेश में पलकर बढ़े होते हैं। जवानी की देहलीज पर कदम रखने इस तरह के अनेक नौजवान यह महसूस करते होंगे कि लड़कियों के साथ एक सामान्‍य रिश्‍ता रखने के मामले में वे कितने कमतर साबित होते हैं।


खैर, इनमें से एक लड़के को अपने बेस्‍ट फ्रेंड की बहन से प्‍यार हो जाता है। डांडिया नाच के बाद एक रात को दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्‍थापित होते हैं, जबकि सुनीता राव का गीत ‘परी हूं मैं’ बैकग्राउंड में बजता रहता है। इससे हमें यह भी पता चलता है कि यह फिल्‍म किस कालखंड की है।


इसी कालखंड में गुजरात में अनेक दु:खद घटनाएं घटी थीं। सबसे पहले तो वर्ष 2001 में गुजरात में भयावह भूकंप आया और उसके बाद वर्ष 2002 में गुजरात में नृशंस दंगे हुए। इस फिल्‍म में भी हम गोधरा और गुजरात दंगों के दृश्‍यों को देखते हैं।


लेकिन खबरों की सुर्खियों के परे इन तीनों युवाओं की जिंदगी में इस घटना के बाद हमेशा के लिए बदल जाती है। निश्चित ही यह कोई पॉलिटिकल फिल्‍म नहीं है, लेकिन इसके बावजूद यह फिल्‍म हमारे दिल पर किसी राजनीतिक पेम्‍फलेट से ज्‍यादा असर छोड़ती है। काई पो चे का मतलब होता है – काटा है। गुजरात में पतंग काटने के बाद बच्‍चे यही चिल्‍लाकर जश्‍न मनाते हैं।


इस फिल्‍म में हम ऐसी कटी पतंगों को देखते हैं, जो बिना किसी खास वजह के अपना रास्‍ता गंवा बैठती हैं। या कहें, ऐसा तीन वजहों से होता है, क्‍योंकि यह फिल्‍म चेतन भगत के ‘थ्री मिस्‍टेक्‍स ऑफ माय लाइफ’ नामक उपन्‍यास पर आधारित है। यह विलक्षण है कि ये तीन मिस्‍टेक्‍स किस तरह भारत के तीन सबसे बड़े जुनूनों को प्रदर्शित करती हैं : धर्म, शादियां और क्रिकेट।


चेतन भगत के उपन्‍यासों पर आधारित यह तीसरी फिल्‍म है। पहली फिल्‍म हैलो (वन नाइट एट द कॉल सेंटर पर आधारित) बुरी तरह फ्लॉप हुई थी, तो दूसरी फिल्‍म थ्री इडियट्स (फाइव पॉइंट समवन पर आधारित) सुपरहिट हुई थी।


राजकुमार हीरानी की उस मास्‍टरपीस फिल्‍म की तुलना में 'काई पो छे' कॉमेडी तो नहीं है, यह ज्‍यादा यथार्थ आधारित है, लेकिन यह निश्चित ही मनोरंजक और हमें बांधकर रखने वाली है। एक दर्शक के रूप में इस फिल्‍म को मिस करना एक मिस्‍टेक होगी।


 

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