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‘एक था टाइगर’: हिट तो थी ही, फिट भी है!

Mayank Shekhar | Aug 15, 2012, 15:37PM IST
Genre: एक्शन/रोमांस
Director: कबीर खान
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Plot: सलमान खान की किसी फिल्मा का रिव्यू करना एक जोड़ी जीन्स की इस्तरी करने की तरह है : वाकई, आखिर इसमें भला क्या तुक है?

सलमान खान की किसी फिल्म का रिव्यू करना एक जोड़ी जीन्स की इस्तरी करने की तरह है : वाकई, आखिर इसमें भला क्या तुक है? दर्शक तो सलमान खान की फिल्म वैसे भी देखेंगे ही। फिल्मकार भी यह जानते हैं। एक बार इस सुपर सितारे को साइन करने के बाद उनके पास ज्यादा काम बाकी नहीं रह जाता, सिवाय इसके कि वे ‘सलमान-मैनिया’ को जमकर भुनाएं। यहां इस बात के ज्यादा मायने नहीं रह जाते कि फिल्म में सलमान कौन-सा किरदार निभा रहे हैं।
दर्शक मानते हैं कि सलमान खुद एक किरदार हैं। वे सलमान की अदाओं पर रिएक्ट करते हैं। वे यह भी जानते हैं कि कैटरीना कैफ उनकी एक्स-गर्लफ्रेंड हैं। फिल्म में कैटरीना कहती हैं कि अभी तक सलमान की शादी नहीं हुई। दर्शक हंस पड़ते हैं। अगर फिल्म सलमान की है तो कोई बेतुकी रीमेक (जैसे ‘बॉडीगार्ड’ और ’रेडी’) भी काफी होगी, लेकिन इन मायनों में ‘काबुल एक्सप्रेस’ और ’न्यूयॉर्क’ जैसी फिल्में निर्देशित कर चुके कबीर खान की ’एक था टाइगर’ एक बेहतरीन अपवाद है।
पहली बात तो यही कि समझदार और सुलझे हुए निर्देशक ने यह सुनिश्चित किया है कि फिल्म में एक कहानी हो। क्रेडिट में हमें बताया जाता है कि फिल्म की कहानी ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ और ‘रब ने बना दी जोड़ी’ जैसी फिल्में लिखने वाले आदित्य चोपड़ा ने लिखी है। दो दुश्मन मुल्कों के खुफिया एजेंट्स की बेपनाह मोहब्बत की दास्तान के रोमांटिक ख्याल के पीछे आदित्य चोपड़ा की कल्पना ही हो सकती है। एक जासूस आईएसआई (पाकिस्तान की इंटर सर्विस इंटेलीजेंस) से है और दूसरा रॉ (इंडियाज़ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) से।
फिल्म की नायिका इस भूमिका में बहुत सहज और बेहद खूबसूरत लगी हैं। और हीरो भी खैर हीरो ही है। दोनों सलीकेदार कपड़े पहनते हैं और एक-दूसरे से बेहद जुदा तीन शहरों डब्लिन, इस्ताम्बुल और हवाना में प्यार की पींगें बढ़ाते हैं। फिल्म की लोकेशंस मोहक हैं। क्रॉस-बॉर्डर रोमांस की शिद्दत भी हम महसूस करते हैं। सलमान और कैटरीना की केमिस्ट्री कामयाब साबित होती है। फिल्म देखकर आप कह सकते हैं कि उसके निर्माता यशराज ने यहां अपने अप्रवासी दक्षिण एशियाई दर्शकों के साथ ही भारतीय ‘सिंगल स्क्रीन’ के सलमान खान के परंपरागत दर्शकों को भी साधने की कोशिश की है। और दोनों ही तरह के दर्शकों को इस फिल्म से निराशा नहीं होगी।
सलमान खान ने एक रॉ एजेंट की भूमिका निभाई है, जिसका कोड-नाम टाइगर है। पिछले बारह सालों से उसने छुट्टी नहीं मनाई है और वह एक इंटरनेशनल असाइनमेंट से दूसरे में व्यस्त रहा है। गोपी (रनवीर शौरी) उसका सहायक है। उसका नामकरण निश्चित ही मिथुन चक्रवर्ती के गन मास्टर जी9 (‘सुरक्षा’, ‘वारदात’) पर किया गया है। दोनों जासूसों को एक भारतीय मिसाइल वैज्ञानिक का पता लगाने डब्लिन भेजा जाता है, जो अब एक यूनिवर्सिटी प्रोफेसर है। यह भूमिका रोशन सेठ ने निभाई है और सलमान खान की फिल्म में उन्हें देखना चौंकाता है। उनके घर में एक लड़की (कैटरीना कैफ) अक्सर नजर आती है।
उसे देखकर यह बता पाना मुश्किल लगता है कि वह कोई स्टूडेंट है या वैज्ञानिक की कोई रिश्तेदार। शायद वैज्ञानिक अपने देश के रहस्य आईएसआई को बताता हो। लेकिन हम अभी यह नहीं जानते। या शायद, हम जानते हैं। आपको क्या लगता है? इसके बाद वैज्ञानिक पूरी तरह से फिल्म से गुमशुदा हो जाता है और सलमान उभरकर सामने आते हैं। आयरलैंड में अनेक एजेंटों द्वारा उनका पीछा किया जाता है, जैसा कि इससे पहले इराक और इससे बाद में क्यूबा में भी होता है। वे ट्राम पर दौड़ते हैं और वह किसी मिनी ट्रक से जा भिड़ती है या वे एक लेज के सहारे सीढि़यों पर फिसलते हैं। इस दौरान वे दो गन से गोलियां भी दागते रहते हैं। लोकल पुलिस बस सलमान के करतब देखती रह जाती है!
जिन फिल्मों का जरूरत से ज्यादा प्रचार होता है, उनसे साथ यह दिक्कत होती है कि ट्रेलर्स में उनके बेहतरीन हिस्सों को बार-बार दिखाकर उनका रोमांच खत्म कर दिया जाता है। फिल्म देखते हुए हमें लगता है कि इसके कुछ बेहतरीन दृश्यों को तो हम प्रोमोज़ में पहले ही देख चुके हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इन हैरतअंगेज एक्शन दृश्यों को फिल्माने का श्रेय फिल्मकारों को न दिया जाए। हॉलीवुड की फिल्में इससे दस गुना बजट खर्च करने के बावजूद इससे बेहतर एक्शन दृश्य नहीं फिल्मा सकती थीं। सलमान की पिछली फिल्मों से यह फिल्म इन मायनों में अलग है कि इसमें नायिका को भी इमारतों से छलांग लगाने, उड़नखटोले उड़ाने और एकाध मुक्का जमाने का मौका मिलता है।
फिर हमें पता चल ही जाता है कि लड़की आईएसआई एजेंट है। रॉ के चीफ (गिरीश कर्नाड) दुखी मन से कहते हैं : ‘दुनिया के दो सौ मुल्कों की लड़कियों में से टाइगर को केवल एक पाकिस्तानी लड़की से ही इश्क हुआ।’ निश्चित ही, यह उसकी ड्यूटी के दायरों से बाहर की बात थी। ऐसे में सरकार को निश्चित ही टाइगर की लानत-मलामत करना है। रॉ की कार्यप्रणाली को पर्याप्त यथार्थवाद के साथ दिखाया गया है। आईएसआई दुनियाभर में बदनाम है। हर नजरिये से देखा जाए तो भारतीय खुफिया एजेंसियों पर खर्च की जाने वाली ‘अनडिस्लोम हैज्ड्’ रकम (यह कई ट्रिलियन्सो में हो सकती है) के मद्देनजर इस फिल्म‘ का भारत निश्चित ही न तो गांधीवादी है और न ही सॉफ्ट स्टेट।
लेकिन नायक और नायिका दोनों ही अपने देश के साथ दगा नहीं करते। वे बस एक-दूसरे से प्यार करते हैं। हम जानते हैं अंत में जीत प्यार की ही होगी। और यकीनन, हम यह भी जानते हैं कि अंत में जीत सलमान खान की ही होगी। अभी जब मैं यह रिव्यू लिख रहा हूं, तब मेरे लिए यह अनुमान लगाना कठिन है कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कितना पैसा कमाएगी। लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता कि इससे पहले मुझे कब सुबह नौ बजे के शो के लिए एडवांस में खरीदे गए टिकट के बावजूद लंबी कतार में लगकर मल्टीप्लेक्स में दाखिल होने को मजबूर होना पड़ा हो! जबकि यह तो अभी पंद्रह अगस्त ही है, ईद अभी बाकी है। एक पूरा सप्ताहांत भी शेष है। जैसी कि मिसाल है, ‘जब खुदा मेहरबान…’, खैर मैं इससे आगे कुछ नहीं कहना चाहूंगा।
सलमान खान की यह फिल्म जरूर ही आपके पैसे वसूल करवा देती है। ‘दबंग’ के चुलबुल पांडे के बाद एक बार फिर यहां इस अभिनेता ने एक जीवंत किरदार को निभाया है, और यह अपने आपमें बहुत बड़ी बात है।

 
 
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