Home » Reviews » Movie Reviews » Movie Review: David

MOVIE REVIEW: तीन डेविड, कहानी एक भी नहीं!

Mayank Shekhar | Feb 02, 2013, 09:43AM IST
Genre: थ्रिलर
Director: बिजॉय नांबियार
Loading
Plot: स्‍क्रीनराइटिंग ही लेखन की इकलौती ऐसी विधा है, जिसे उसके मुकम्‍मल मुकाम तक पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपयों की जरूरत होती है।

स्‍क्रीनराइटिंग ही लेखन की इकलौती ऐसी विधा है, जिसे उसके मुकम्‍मल मुकाम तक पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपयों की जरूरत होती है, जबकि लेखन की अन्‍य विधाओं के लिए ज्‍यादा से ज्‍यादा अपनी अंगुलियों को की-बोर्ड पर ही चलाना होता है। निश्चित ही इस तरह के लेखन में जितना समय लगता है, वह पैसों से कम कीमती नहीं होता, लेकिन ऐसा लेखन अपने आपमें एक संतोषजनक विधा साबित हो सकती है। लेकिन शायद एक स्‍क्रीनप्‍ले बेचना, उसे लिखने जितना ही कठिन है।


लिहाजा, मैं दूर की कौड़ी जैसा एक अनुमान लगाना चाहता हूं कि इस फिल्‍म की कहानी (अगर उसे कहानी कहा जा सके तो) के साथ क्‍या हुआ होगा। फिल्‍मकार के दिमाग में सबसे पहले तो एक माफिया डॉन के सरोगेट सन (नील नितिन मुकेश) की कहानी होगी। कहानी की पृष्‍ठभूमि होगी 1975 का लंदन। भारत सरकार पाकिस्‍तानी मूल के इस डॉन को खोज रही है, जिसने नईदिल्‍ली में एक बम धमाका करवाया था। यह सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, क्‍योंकि तब भारत में इस तरह की आतंकी वारदातें नहीं होती थीं। भारतीय एजेंसी डॉन के सरोगेट सन को धर-दबोचने की कोशिश करती है। इस सिलसिले में नाहक ही खूब गोला-बारूद बरबाद किया जाता है। लेकिन शायद यह कहानी बिकी नहीं होगी। या शायद उन्‍होंने पहले-पहल ऐसा नहीं सोचा होगा।


इसके बाद उन्‍होंने एक ईसाई पादरी के बेटे से जुड़ी कोई कहानी सोची होगी। कहानी की पृष्‍ठभूमि 1999 की बंबई रही होगी। लड़का एक महत्‍वाकांक्षी संगीतकार (विनय वीरमानी) रहा होगा। लेकिन वह एक हिंदू राष्‍ट्रवादी समूह द्वारा किए गए अपने पिता के अपमान का बदला लेने के लिए वह अपने सपने को तिलांजलि दे देता है। लेकिन शायद एक पूरी तरह से राजनीतिक कहानी पर फिल्‍म बनाने के लिए पैसा जुटाना आसान नहीं रहा होगा या शायद कोई भी उल्‍लेखनीय कलाकार मुख्‍य भूमिका निभाने को तैयार नहीं हुआ होगा।


तो फिर ऐसा हुआ होगा कि वास्‍तव में वे एक फील-गुड, हैप्‍पी-गो-लकी विषय पर फिल्‍म बनाना चाह रहे होंगे, जिसकी पृष्‍ठभूमि वर्ष 2010 का गोवा हो। यह एक शराबी (विक्रम) की कहानी होगी, जो अपने लिए एक उपयुक्‍त लड़की की तलाश करने में बार-बार नाकाम रहता है।


लगता तो यही है कि वे शायद यही फिल्‍म बनाना चाह रहे होंगे, क्‍योंकि निश्चित ही यह तीसरा भाग ही पूरी फिल्‍म का सबसे अच्‍छा हिस्‍सा है। इसमें एक प्‍यारा-सा सेंस ऑफ ह्यूमर है, झोपड़-पट्टियों में गोवा का एंथम ‘मारिया पिताची’ बजता रहता है और इस दौरान होने वाली घटनाएं रोचक और मजेदार हैं।


और यह तो है ही कि इस सेगमेंट में इस फिल्‍म के दो सर्वश्रेष्‍ठ कलाकार शामिल हैं : विक्रम और तब्‍बू। वैसे, फिल्‍मकार ने अच्‍छी-खासी स्‍टारकास्‍ट जुटाई है और कई जाने-माने कलाकारों ने बहुत ही छोटे-मोटे अजीबो-गरीब रोल निभाए हैं, जैसे एक गाने में सारिका नजर आती हैं, एक दृश्‍य में मिलिंद सोमण घूरकर देखते हैं, निखिल चिनप्‍पा फाइट करते हैं, लारा दत्‍ता गिटार बजाती हैं।


लेकिन आखिर में हमारे पास कुल-मिलाकर एक ही नाम (डेविड) के तीन किरदार रह जाते हैं, जो अपनी अलग-अलग टाइमलाइन में अपनी जिंदगी की जंग लड़ते रहते हैं। फिल्‍म में पृष्‍ठभूमि के तौर पर जिन वर्षों का उल्‍लेख किया गया है, वे असंगत हैं। उनके बीच कोई तुक नहीं है। यह कोई हाइपर-लिंक फिल्‍म नहीं है, जिसमें एक पेचीदा कहानी अच्‍छी संरचना और चुस्‍त संपादन की मदद से अगली कहानी से जुड़ जाती है। 160 मिनटों की यह फिल्‍म तीन भागों में बंट जाती है। एक थका-हारा डेविड ब्रेक लेता है और दूसरे की कहानी शुरू हो जाती है। ऐसे में गोवा वाले सेगमेंट का हल्‍का-फुल्‍कापन कॉमिक रिलीफ की तरह लगता है, क्‍योंकि बाकी दोनों सेगमेंट की कहानियां बोझिल और एक फर्जी त्रासदपन लिए हुए हैं।


लेकिन बड़ी त्रासदी तो यह है कि यह अधकचरी फिल्‍म एक प्रतिभाशाली फिल्‍मकार (बिजॉय नांबियार, जिन्‍होंने शैतान बनाई थी) ने बनाई है। नांबियान को विजुअल कला की बहुत दुर्लभ समझ है और वे बार-बार क्‍लोजअप शॉट को स्‍लो-मोशन में दिखाना पसंद करते हैं। इस फिल्‍म में भी कैमरा वर्क, प्रोडक्‍शन और साउंड डिजाइन उत्‍कृष्‍ट और कलात्‍मक है, लेकिन दुख की बात यह है कि फिल्‍म देखते समय हम यह सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि ये लोग प्रतिभाशाली लगते हैं, फिर उन्‍होंने ऐसी फिल्‍म क्‍यों बनाई?

Light a smile this Diwali campaign
 
 
 
Email Print Comment