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बैटमैन ने मारा चौका, छक्का नहीं!

Mayank Shekhar | Jul 20, 2012, 20:09PM IST
Genre:
Director: क्रिस्टोफर नोलन
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Plot: “मैं अब भी बैटमैन में भरोसा करता हूं, भले ही आप न करें,” एक युवा सर्जेंट, अरबपति ब्रूस वेन (क्रिश्चियन बेल) से कहता है, जबकि वह भलीभांति जानता है कि

 

“मैं अब भी बैटमैन में भरोसा करता हूं, भले ही आप न करें,” एक युवा सर्जेंट, अरबपति ब्रूस वेन (क्रिश्चियन बेल) से कहता है, जबकि वह भलीभांति जानता है कि वही बैटमैन है। एक पैर से लंगड़ाकर चलने वाला हैरान-परेशान वेन सालों से अपने घर की चहारदीवारी में छुपा हुआ है। अचानक, जैसी कि हम उम्मीद कर सकते हैं, उसके गोथम शहर को फिर से उसकी जरूरत आन पड़ी है। जाहिर है सिने दर्शकों को भी अचानक उसकी जरूरत आन पड़ी है – वस्तुत: उनमें से सभी बैटमैन में सर्जेंट जितना ही भरोसा करते हैं, या कम से कम लगता तो ऐसा ही है।

 

अकल्पनीय बजट से एक विलक्षण रूप से विश्वसनीय वैकल्पिक संसार रचने वाली ईवेंट पिक्चर्स, अगर आप पहले ही गौर नहीं कर चुके हों तो, हाल-फिलहाल के दिनों में युवा दर्शकों के लिए मिथकों में रची-बसी कॉमिक बुक्स में तब्दील हो चुकी हैं। अब ये बच्चों की फिल्में नहीं रहीं। इस फिल्म की गंभीर भ्रमपूर्ण विषय वस्तु से भी बच्चे लगाव महसूस नहीं कर पाएंगे। बैटमैन अब एक धर्म बन चुका है। इस मायने में निर्देशक क्रिस्टो फर नोलन को आधुनिक काल का वाल्मी‍कि कहा जा सकता है।

 

तीन चीज़ें हैं, जिनमें नोलन कोई फेरबदल नहीं कर सकते। पहली, चूंकि यह एक सुपर-हीरो फिल्म है, लिहाजा इसमें एक सुपर-हीरो का होना जरूरी है। दूसरी, उसका कोई जानी दुश्मन भी जरूर होगा। और तीसरी, उसे उस पागल विलेन की क्रूर शक्तियों के विरुद्ध लड़ते हुए दुनिया को बचाना होगा। ये तीनों ही चीजें इस फिल्म में हैं।

 

इस पुरानी परिपाटी में नोलन को कुछ ऐसी बारीकियां ईजाद करनी थीं, जो दर्शकों के दिलो-दिमाग को गुदगुदाएं। ‘द डार्क नाइट’ में वे बेहतरीन रूप से ऐसा करने में कामयाब रहे थे और शायद इसीलिए बैटमैन त्रयी की इस अंतिम किश्ती के लिए अभूतपूर्व हाइप थी। लेकिन क्या इतनी हाइप होनी चाहिए? शायद किसी भी हाइप को उपयुक्त नहीं कहा जा सकता है। तब क्या यह फिल्म ओवर-रेटेड है? हो सकता है। लेकिन ये तो रेटिंग की समस्या‍एं हैं, फिल्म की नहीं।

 

मैं आमतौर पर देरी से उठता हूं, लेकिन इस डार्क नाइट के उदय का पहला शो देखने के लिए मैं भोर होते ही जाग गया था। मैं जानता था कि दुनिया भर के लाखों दर्शक भी ऐसा ही कर रहे होंगे। शायद उन्हें भी यह अंदाजा हो गया होगा कि ‘द डार्क नाइट’ में जो नयापन था, यह फिल्म उसके पास भी नहीं है। लेकिन इससे इस फिल्म के प्रशंसकों में कोई कमी नहीं आने वाली। न ही इससे किसी प्रकार की असहमति को बर्दाश्त किया जाएगा। धार्मिक आस्थाएं ऐसी ही होती हैं।

 

बैटमोबाइल और अब बैटसाइकिल के अलावा जो चीज़ बैटमैन को अन्य‍ सुपर-हीरो से अलग करती है, वह है उसका बहुत निष्कवच होना, लगभग हम इंसानों की ही तरह। गोथम सिटी पर जो एटमी खतरा मंडरा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे हमारी दुनिया पर मंडरा रहा है, उससे हमारी रक्षा करना शायद सुपर-हीरो के लिए भी मुश्किल होगा। विलेन को बेलगाम अमीरों से खुन्नस है। यह फिल्म वर्ग संघर्ष के बारे में है।

 

वह पहले स्टॉंक एक्स‍चेंज पर हमला बोलता है, जेल में कैद अपराधियों को मुक्त कराता है, फुटबॉल मैदान को उधेड़ देता है, और पूरे शहर को एक ऐसे एटमी हथियार के मार्फत तहस-नहस कर देना चाहता है, जो कि निश्चित ही गलत हाथों में चला गया है : “एक आदमी का औजार दूसरे का हथियार है।” यकीनन, एक पूरे शहर को ध्वस्त कर देने का मतलब होगा अनेक लोगों का कत्लेआम, जिनमें वे भी शामिल होंगे, जिनके लिए वह लड़ रहा है। लेकिन यह एक दूसरा मामला है।

 

यह फिल्म का बाद वाला हिस्सा है, जो हमें अपनी सीट पर चिपक जाने को मजबूर कर देता है और हमारे होशो-हवास को हौले-हौले झटके देता रहता है। डार्क गोथम बड़ी आसानी से मुंबई या न्यूयॉर्क सिटी हो सकता है। समानताएं स्पष्ट हैं। यह डराने वाला होने के साथ ही मजेदार भी है। हम इस नजारे से स्तब्ध रह जाते हैं। और इसके लिए आपको मोटे 3डी चश्मों की दरकार नहीं है।

 

अनेक बैटमैन फिल्मों की तरह, यह भी पूरी तरह से विलेन की फिल्म‍ है। लेकिन इसके बावजूद बॉडी बिल्डर बेन (टॉम हार्डी), जिसका चेहरा आधा ढंका रहता है और वह इतने अस्पष्ट, तरीके से बोलता है कि हम बामुश्किल ही समझ पाते हैं कि वह क्या कह रहा है, हीथ लेजर के यादगार जोकर के सामने कुछ भी नहीं है। यह निराशाजनक है, क्योंकि बेन शायद बैटमैन से भी अधिक ताकतवर है। शायद लेखकों ने बेन की शख्सियत के करिश्माई न होने की भरपाई कुछ अन्य किरदारों को रचकर और एक बेहतरीन कास्ट तैयार करके की है।

 

इनमें शामिल है ख़ूबसूरत चोर कैट-वूमैन (एनी हैथवे), एक अन्य करोड़पति मिस्टजर टेल (मारियन कोटिलार्ड), और इनके अलावा विलक्षण और मंजे हुए कलाकार माइकल केन (अल्फ्रेड द बटलर की भूमिका में), मार्गन फ्रीमैन (बैटमैन के जीनियस आविष्कर्ता लूसियस फॉक्सर की भूमिका में) और गैरी ओल्डमैन (गोथम सिटी के पुलिस कमिश्ननर की भूमिका में)।

 

अलबत्ताफ, इनमें से कोई भी इस पूरी तरह ग़ैर रोमांटिक और हास्यबोध से रहित फिल्म में हमें राहत देने में कामयाब नहीं हो पाता। हालांकि दर्शक इस फिल्म को कॉमेडी के लिए नहीं देखने आ रहे हैं, फिर भी अगर इसमें थोड़ा डार्क ह्यूमर होता तो वह मददगार साबित होता : “भला इतना सीरियस क्यों होना?” क्या मैं ‘द डार्क नाइट’ से इसकी कुछ ज्यादा ही तुलना कर रहा हूं? लेकिन, आखिर ऐसा करने से बचा भी कैसे जाए?

(मयंक शेखर जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं, वे www.dainikbhaskar.com से जुड़े हैं) 

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