'बर्फी': एक कलात्मक भेल-पूरी
Mayank Shekhar | Sep 15, 2012, 11:08AM IST

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Star Cast:रनबीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा, इलिएना डीक्रुज
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Director:अनुराग बसु
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Producer:यूटीवी मोशन पिक्चर्स
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Music Director:
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Genre:रोमांटिक कॉमेडी
कहानी
पचास के दशक की बात है। जब इस फिल्म के नायक का जन्म होता है, उसके घर पर मर्फी बज रहा होता है। मर्फी ट्रांजिस्टर का एक पॉपुलर ब्रांड था, जिसके लोगो पर एक बच्चे का चित्र हुआ करता था। बस यहीं से नायक को उसका नाम मिलता है। उसे खुश होना चाहिए कि उसके परिवार के पास बुश रेडियो नहीं था। यदि ऐसा होता तो शायद कुछ समय बाद उसे अपने इसी नाम से झुंझलाहट होने लगती।अगर मैं यह बताऊं कि इस फिल्म का केंद्रीय चरित्र गूंगा और बहरा है तो यह किसी नेशनल सीक्रेट का खुलासा करने जैसा नहीं होगा। जब वह अपना नाम मर्फी बोलने की कोशिश करता है तो वह बर्फी की तरह सुनाई देता है। सभी उसे बर्फी कहने लगते हैं। और यही वह इकलौता मौका है, जब वह फिल्म में अपना मुंह खोलता है। यह अजीब है, क्योंकि अधिकांश गूंगे-बहरे लोग भले ही बोल न पाते हों, लेकिन वे इशारों की भाषा में बात करने के लिए आवाज निकाल कर कुछ बताने की कोशिश जरूर करते हैं। शायद, इस फिल्म का नायक इस बात को लेकर चौकस है कि कहीं वह ऐसा करते समय अजीबोगरीब न नजर आए। वजह? अरे, उस पर इतने सारे कैमरों की नजर जो लगी हुई है!जाहिर है, फिल्म के परदे पर आने से पहले ही दर्शकों की सहानुभूति इस खूबसूरत लेकिन अभागे लड़के के साथ जुड़ जाती है। फिल्मकार भी यह बात जानते हैं। शारीरिक रूप से लाचार बहुतेरे चरित्रों को दर्शकों का ऐसा ही बेशर्त प्यार मिलता है। बर्फी मूलत: खानाबदोश किस्म का शख्स है। वह लिख-पढ़ सकता है और खासा स्मार्ट भी है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि वह अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए कोई काम करता है। वह शरारती है। उसके शहर के इंस्पेक्टर का पूरा कॅरियर उसका पीछा करने में ही बीत जाता है। इससे हमें यह भी पता चलता है कि 1970 के दशक के दार्जिलिंग में अपराध की क्या स्थिति थी।इंस्पेक्टर (सौरभ शुक्ला) कीस्टोन कॉप्स का एक हिस्सा हो सकता है। सिनेमा के शुरुआती दौर में हॉलीवुड की साइलेंट कॉमेडी फिल्मों में नजर आने वाले नाकारा पुलिस वाले कीस्टोन कॉप्स कहलाते थे। बर्फी (रनबीर कपूर) के हाव-भाव निश्चित ही चार्ली चैप्लिन से प्रेरित हैं, जो साइलेंट फिल्मों के दौर के सर्वाधिक प्रभावशाली सितारों में से एक थे और 1950 के दशक में रनबीर के दादा राज कपूर की फिल्में भी उनसे काफी हद तक प्रेरित थीं। ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ इसकी मिसाल हैं। वास्तव में यह फिल्म भी बहुत हद तक एक साइलेंट फिल्म ही है, क्योंकि इसमें दुनिया को एक गूंगे-बहरे नायक के नजरिये से देखने की कोशिश की गई है। इन मायनों में मुख्यधारा के सिनेमा के लिए यह एक बेहद साहसी फिल्म है।यदि ‘द आर्टिस्ट’, जो एक साइलेंट ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म है, ने इसी साल अनेक ऑस्कर पुरस्कार नहीं बटोरे होते तो इस विचार का नयापन हमें और हैरत में डाल देता।लिहाजा, फिल्म का मूल विचार है हमारी आत्मा को सहलाना, हमारे दिलों को छूना और पुरानी दुनिया की एक ऐसी तस्वीर पेश करना, जहां प्यार की मासूमियत जिंदा थी। आमतौर पर इस तरह की फिल्मों की बुनियाद मजबूत बनाने के लिए एक सशक्त पृष्ठभूमि की जरूरत होती है। मिसाल के तौर पर ‘लाइफ इज ब्यूटीफुल’ एक कॉमेडी होने के साथ ही पॉलिटिकल फिल्म भी थी और वह नाजी यातना शिविरों की पृष्ठभूमि में फिल्माई गई थी। यदि ‘द आर्टिस्ट’ को ही लें, जिसका मं
तव्य यूं तो साइलेंट सिनेमा और टॉकीज के प्रारंभिक दौर को एक आदरांजलि देना था, लेकिन उसमें फिल्मी सितारों के उदय और पतन पर भी विमर्श किया गया था। इन मायनों में ‘बर्फी’ के पास ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है। तब यह एक लाचार व्यक्ति द्वारा अपने आत्मीय जनों की तलाश की नीरस परिपाटी वाली फिल्म बनकर रह जाती है।‘बर्फी’ को एक प्यारी-सी लड़की (इलिआना डीक्रूज) से प्यार हो जाता है, जिसकी पहले ही सगाई हो चुकी है। वह ऊंचे खानदान की लड़की है। नायक गरीब घर का लड़का है। लड़की की मां लेडी चटर्जी (रूपा गांगुली द्वारा निभाए गए इस चरित्र का नामकरण शायद डीएच लॉरेंस के उपन्यास ‘लेडी चैटर्लीज लवर’ के आधार पर किया गया है) द्वारा एक गरीब लकड़हारे के साथ किए
जाने वाले हिकारत भरे बर्ताव से हमें पता चल जाता है कि उसका मिजाज कैसा है। बर्फी को इसके बाद एक बार फिर प्यार होता है। इस बार लड़की मानसिक रूप से विक्लांग है, जिसकी मां शराबी और पिता जुआरी हैं। यह भूमिका प्रियंका चोपड़ा ने निभाई है। इस बात के मद्देनज़र कि रनबीर और प्रियंका दोनों ने ही इन भूमिकाओं को चुना है, आप कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी होगी। वे अपने दर्शकों को निराश नहीं करते। कर नहीं सकते। बात इतनी ही है कि यह फिल्म ही उन्हें निराश करती है।बहुत कम लोग इस बात से असहमत होंगे कि इस फिल्म के निर्देशक अनुराग बसु का सौंदर्य बोध उच्चकोटि का है और वे उन चुनिंदा भारतीय फिल्मकारों में शामिल हैं, जो बेहद दर्शनीय सिनेमा रचते हैं। वे इस मायने में संजय लीला भंसाली और मणि रत्नम की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। दिक्कत यह है कि ऐसे फिल्मकार कभी-कभी दर्शकों को अपनी फिल्म की दर्शनीयता से चकाचौंध कर देने में ही पूरा जोर लगा देते हैं। इस फिल्म के एक सामान्य दृश्य में एक सामान्य-सी सड़क पर एक कार गुज़र रही होती है, लेकिन वहां भी एक कोने में हम वायलिन वादकों का एक झुंड देख सकते हैं।बसु की ‘काइट्स’ खराब कहानी के कारण पिटी थी। लेकिन बर्फी की कमजोरी है कुशल संपादन का अभाव। अनेक लोग मानते हैं कि फिल्म के संपादक का काम होता है यथासंभव लंबे शॉट्स को जोड़कर एक फिल्म तैयार करना, जो सच भी है। लेकिन संपादकों को यह भी ध्यान रखना होता है कि कहानी की एक लय हो, चीजें प्रभावी रूप से आगे बढ़ें, लंबे दृश्य हों, छोटे दृश्य हों, हल्के-फुल्के दृश्यों के साथ नाटकीय दृश्य की ठीक संगति हो। इस फिल्म में हमें इन चीजों की कमी अखरती है। तब यह फिल्म बेहतरीन मोंताज शॉट्स की एक लयहीन श्रंखला भर बनकर रह जाती है। बसु की ही एक अन्य फिल्म ‘लाइफ इन अ मेट्रो’ में यह युक्ति कारगर साबित हुई थी, लेकिन वहां छह कहानियां थीं। इस फिल्म में केवल एक ही कहानी है।बर्फी नायिका की मां लेडी चटर्जी का सामना करता है और उनकी बेटी के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करता है। वह उनके घर जाता है। वहां उसकी प्रेमिका का मंगेतर भी मौजूद है। वह अपना प्रेम पत्र आगे बढ़ा देता है। मंगेतर ग्रामोफोन का वॉल्यूम
बढ़ा देता है। हम उसके चमकीले चश्मों के पीछे छिपी उसकी आंखों को देख सकते हैं। पिता को लगता है कि वह मदद की गुहार करने आया है। अपमानित नायक को वहां से लौटना पड़ता है। वह अपनी प्रेमिका के सामने अपनी निराशा जाहिर करता है, लेकिन इसके बावजूद वह अपने चुलबुलेपन को भी बरकरार रखता है। यह सीक्वेंस लगभग दो मिनट तक चलता है। पूरे दृश्य पर खामोशी का परदा टंगा रहता है। यह एक ऐसा अनूठा सिनेमाई क्षण है, जिसे बहुत कम फिल्में जीवंत बना पाती हैं। इन मायनों में इस फिल्म में मेहनत तो वाकई की गई है। बस दुख की बात यही है कि ये छोटे-छोटे लम्हे जुड़कर एक मार्मिक सिनेमाई अनुभव नहीं बन पाते। यकीनन, बर्फी ‘बॉर्न-फ्री’ (आजाद मिजाज) है, लेकिन वह ‘बोर-फ्री’ साबित नहीं हो पाता।




