EXCLUSIVE:लोगों के दुख ने कर दिया 'सत्यमेव जयते' बनाने पर मजबूर

आमिर खान इन दिनों अपने शो 'सत्यमेव जयते' की वजह से चर्चा में हैं। उन्होंने इस शो के जरिए जिस तरह से सामाजिक मुद्दों पर प्रकाश डाला, उसने क्या आम, क्या खास, सबका दिल अंदर से झकझोर कर रख दिया। इस शो के जरिए एक बार फिर टेलीविजन की ताकत सामने आई जिसे केवल बुद्धू बक्सा समझकर छोटा कह दिया जाता था। 50 के दशक में एक बार जानेमाने टीवी पत्रकार एडवर्ड बरोस ने टीवी के बारे में कहा था कि मनोरंज़न से मन बहलाने और सीखने के लिए लिए इससे बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता। टीवी से आप सीख सकते हैं, आप चीज़ों को जान सकते हैं, प्रेरित भी हो सकते हैं। लेकिन ये सब उन लोगों पर निर्भर करता है जो टीवी पर दिखाई जाने वाली चीजों की प्राथमिकता निर्धारित करते हैं।
एडवर्ड की इस सोच को आमिर खान ने 'सत्यमेव जयते' के माध्यम से सच कर दिखाया है। इस बात पर उन्होंने दैनिकभास्कर.कॉम के वरिष्ठ पत्रकार मार्क मैनुअल को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में सहमति जताई। मार्क की आमिर से काफी लंबी बातचीत हुई। इस इंटरव्यू के कुछ चुनिंदा अंश हम एक सीरीज के तौर पर आपके लिए लेकर आएंगे। पेश है आमिर के इंटरव्यू का तीसरा अंश:
इतने सारे कैमरा आस-पास होते हुए और भी परेशानी होती होगी?
हमने ज्यादातर कैमरा हाइड कर दिए थे। बहुत कम कैमरे ही विजिबल थे। इसलिए, एक बार स्टूडियो में आ जाने पर कोई कैमरे से घिरा नहीं होता था। हमने यह भी तय किया था कि एक बार जब गेस्ट से बातचीत शुरु हो जाए, तब कोई टेकनिकल बात नहीं होगी।
लोगों की दुखभरी कहानियों से खुद को कैसे उबारते थे?
मुश्किल तो होता है, पर इसका दूसरा पहलू भी है। मैं आपको दो मिसाल देता हूं और आप समझ जाएंगे मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं। मेरी मुलाकात रिजवान नाम के एक बच्चे की मां से हुई, जिसे मार दिया गया था। उस कहानी को सुनना काफी दर्दनाक था। अंदर तक चुभ जाती हैं ऐसी बातें। पर जरा उस औरत की ओर भी देखिए। क्या आपने कभी किसी औरत को इतनी गरिमा, प्यार और अपनेपन से बात करते देखा है? ऊपर से उसके बच्चे की मौत हो चुकी थी। मैं अपने बच्चे को खो दूं तो पागल हो जाउंगा, खून का प्यासा हो जाउंगा। मैं कह नहीं सकता मैं कैसे रिएक्ट करूंगा। क्या मेरे अंदर कभी इतनी ताकत आएगी कि मैं कहीं बैठ कर उसके बारे में बात कर पाऊं, या फिर इतना बड़प्पन आ पाएगा कि जिन पर मुझे इस घिनौने काम को करने का शक है, मैं उनके बारे में इज्जत से बात कर पाऊं। (थोड़ा रुकते हैं और आंखों में आंसू आ जाते हैं) यह वाकई प्रेरणादायक है। इससे मैंने सीखा कि माफ करने की शक्ति कितनी महान होती हे। यह इतनी सकारात्मरक ताकत है कि हर उन बुराइयों को माफ कर देती है, जो लोगों ने की है।
या फिर आप मनोज और बबली को ही ले लीजिए, जिनका जिक्र ऑनर किलिंग वाले एपिसोड में हुआ था। मुझसे मनोज की मां चंद्राबती और बहन सीमा ने बातें कीं। उनके साथ जो भी हुआ वह वहशियाना था। इन सबके पीछे एक रूढ़िवादी पैतृक समाज की सोच है, जहां यह सब जायज है। मनोज की मां कहती है कि उसके बेटे ने जो किया, सही था। उसने प्यार किया और अपनी पसंद की लड़की से शादी की। अपने आप को जरा उस हालात में रख कर सोचिए। उनके घर का एकमात्र मर्द मारा जा चुका है। खाप उसके परिवार को ढूंढने के लिए निकल पड़ी है। उसकी बहनें दहशत में जी रही हैं। उन्हें पैसे देने की कोशिश की जा रही है। वे कहते हैं, जो चाहे मांग लो, पर केस वापस ले लो। ऐसा नहीं किया तो वे उन्हें भी मार डालेंगे। उन पर सामाजिक दबाव तो है ही, राजनीतिक प्रेशर बनाने की भी कोशिश की जा रही है।
गांव में कोई उन्हें कोई दूध तक नहीं देता। वे खुद यह काम करती हैं, ब्लडी हेल (थोड़ा रुक कर आंसू पोंछते हैं)। क्या आपमें और मुझमें ऐसा करने की ताकत है? हम दोनों मुम्बई में बैठे हैं। अगर अभी कोई पोलिटिकल पार्टी बंद की घोषणा कर दे, कोई बाहर नहीं निकलेगा। यह इतना बड़ा शहर है। उस गांव में, जहां एक पुलिस स्टेशन भी नहीं है, ये महिलाएं सारे काम खुद करती हैं, एक दिन के लिए नहीं, सारी उम्र इन्हें ऐसा ही करना है। यह आश्चर्यजनक रूप से प्रेरणादायी है।









