विज्ञापन
 
 
 
 
 

'रियलिटी शो तो चार दिन की चांदनी हैं'

 
Source: राजेश गाबा   |   Last Updated 12:22 PM (14/01/2012)
 
 
 
 
मेरी जिंदगी में संगीत से पहले पेंटिंग आ गई थी गायक न बनता तो आर्टिस्ट होता। लेकिन आज भी कैनवस पर खासा समय बिता रहा हूं। कुछ समय पहले ही मैंने सलमान खान को उनकी फिल्म दबंग का पोट्रेट बना कर दिया है। यह कहना है सुप्रसिद्ध प्लेबैक सिंगर शब्बीर कुमार का। वे शुक्रवार भोपाल उत्सव मेले में परफार्म करने शहर आए। इस अवसर पर दैनिकभास्कर ने जाना उनका संगीतमय सफर।



किसी जमाने में मैं दो से आठ रूपये में वडोदरा में चित्र बना कर कमा लेता था और उससे अपनी पॉकेट मनी निकाल लेता था। जब तक रेडियो पर गीत बजता था मेरी कलम और कूची कैनवास पर पोट्रेट बनाती थी। संगीत का बेहद शौक था। दोस्तों के कहने पर मैंने आर्केस्ट्रा में गाया। मेरी आवाज को काफी पसंद किया गया। इस तरह मेरा हौसला बढ़ा। सोलह वर्ष की उम्र में 1965 में बड़ोदरा में एक संगीत प्रतियोगिता में भागीदारी मेरे लिए टर्निग पाइंट साबित हुई। इसके बाद स्टेज शो में मौका मिलता गया। करीब डेढ़ दशक के संघर्ष के बाद सबसे पहले संगीतकार ऊषा खन्ना ने फिल्म तजुर्बा में ब्रेक दिया। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने कुली फिल्म में गाने का मौका दिया। फिल्म कुली के गीत पहले रिकॉर्ड हो गये थे लेकिन अमिताभ बच्चन के शूटिंग के दौरान घायल हो जाने पर फिल्म देर से प्रदर्शित हुई। आरडीबर्मन साहब के साथ बेताब फिल्म से प्लबैक सिंगर के रुप में पहचान मिली स्वरकोकिला लता मंगेशकर जी के साथ सभी युगल गीत सुपरहिट साबित हुए। लताजी के साथ गाना किसी भी आर्टिस्ट के लिये जि़न्दगी का सबसे बड़ा ईनाम हो सकता है जो मुझे भी मिला। रफी साहब तो मेरे लिये ख़ुदा हैं। वे मेरे आदर्श हैं।



महान गायक विश्वविद्यालय के समान



किशोर दा, रफी साहब, मुकेशजी, मन्ना डे, लताजी और आशाजी तो हम गाने वालों के लिये एक तरह के घराने हैं। इस बात को कुबूल करने में कोई संकोच और झिझक नहीं कि कहीं न कहीं इन सर्वकालिक महान आवाजों से ही हमने गाना सीखा और ये ही आवाजे और फनकार हमारे लिये एक विश्वविद्यालय रहे हैं।



गीत में बोल अहम..



फिल्मी गीत की खासियत होते हैं शब्द और अब न वैसे शायर हैं न कवि जिन्हें फिल्म की सिचुएशन पर बात को कहने का माद्दा हो। आस रह जाती है गुलजार और जावेद अखतर साहब से जो आज भी इस शोर के अंधेरे में एक उम्मीद की किरण हैं।



रियलिटी शो चंद समय की चमक दमक



रियलिटी की शुरूआत बहुत अच्छी है यह आर्टिस्ट को शोहरत और पैसा दोनो दिलवाते हैं, फिर खो जाते है गुमनामी के अंधेरे में। ये चंद समय की चमक दमक। ये चार दिन की चांदनी के समान है। फिर वह कलाकार कहां गुम हो जाता है पता ही नहीं चलता। भारतीय संगीत में इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों के बढ़ते उपयोग बेहद चिंता हो रही है। इससे कई ख्यातिनाम वाद्ययंत्र वादक भूखों मरने के कगार पर हैं।



शुरु हुई दूसरी पारी



मैं तो अभी स्टेज शो कर रहा हूं। साथ ही साल 2010 में अक्षय कुमार के लिए फिल्म हाउसफुल में गाकर मैंने दूसरी पारी शुरू की। मेरा बेटा दिलशाद भी गा रहा है उसने एआर रहमान के लिये ब्लू में गाया है और फिल्म रॉ-वन में भी उसकी आवाज सुनाई दी है। आने वाले दिनों में एक रोमांटिक एलबम भी जारी होगा। साथ ही फिल्म लकीर का फकीर में भी अपनी आवाज दी है।



शायरी, कविता को समझें



नई आवाजों के लिए मैं यह कहना चाहता हूं कि प्लैबैक सिंगिंग अहसास की गायकी है। सबसे पहले शब्द की अहमियत को समझो। शायरी, कविता को समझो तो जानोगे कैसे अच्छा गया जाता है।
 
 
 
 
 
 
 
 
आपके विचार

 
 
कोड :
2 + 7

 
 
 
 
विज्ञापन
 
 
 

बड़ी खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

रोचक खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

जीवन मंत्र

 
 
 
 
 
 
 
 
 

क्रिकेट

 
 
 
 
 
 
 
 
 

बिज़नेस

 
 
 
 
 
 
 
 
 

जोक्स

 
 
 
 
 
 
 
 
 

पसंदीदा खबरें

 
 
 
 
 
 
 
 
 

फोटोगैलरी

Most Viewed

Amazing Body Paintings
Controversies that rocked B-town
Just Added

करियर कॉलेज में फेयरवेल पार्टी के दौरान स्टूडेंट्स ने बिखेरे रंग
Bollywood Stars at Cannes
 
 
 
विज्ञापन
 
| Email  Print Comment
| Email  Print Comment