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दूसरे पार्ट में भी जम कर ली

mayank shekhar | Aug 08, 2012, 16:49PM IST
Genre: एक्शन थ्रिलर
Director: अनुराग कश्यप
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Plot: फिल्म बिजली की तरह आपके दिलोदिमाग पर छा जाती है। बेशक, डायरेक्टर का यही मकसद था।

रामधीर सिंह फिल्म के पहले पार्ट से काफी बूढ़ा हो चुका है। अब तक सिर्फ एमएलए की कुर्सी पा सकने में सफल रामधीर इस बात से खुश है कि इतने पापों के बावजूद वह जिंदा है। वह अपने साथी शाहिद खान, उसके बेटे सरदार खान और सरदार के बड़े बेटे को भी मौत के घाट उतार चुका है।

 

 वह अपने साथियों से पूछता है, 'आपको क्या लगता है, मैं जिंदा क्यों बच गया?' किसी के पास कोई जवाब नहीं होता। वह कहता है, 'क्योंकि मैं फिल्में नहीं देखता।' रामधीर सिंह के रूप में अनुराग ने तिग्मांशु धूलिया में एक बेहतरीन एक्टर खोज निकाला है। अब पूरा धनबाद जिला रामधीर की मुट्ठी में है।


फिल्म के पहले सीन में मूवी 'मैंने प्यार किया' का पोस्टर दिखता है। इससे पता चलता है कि हम साल 1989 में हैं। यह वही दशक है जब कम्युनिकेशन रेवल्यूशन ने लैंडलाइन फोन को रिप्लेस कर पेजर और सेलफोन को घर-घर पहुंचा दिया था। फोन के मोटे-मोटे तार घरों के छत पर पड़े हैं। साफ झलक रहा है कि समय बदल चुका है। अब कोई डॉन किसी से दुश्मनी ले ज्यादा दिनों तक बच नहीं सकता।


सरदार खान का बड़ा बेटा मर चुका है, इसलिए फैजल को घर की जिम्मेदारियां उठानी पड़ती हैं। हालांकि, इस काम में उसका मन नहीं लगता, पर वह बिजनेस बढ़ाता जाता है। मुझे लगता है कि नौजवानों के साथ काम करने के कारण वह जल्द ही कामयाबी हासिल कर पाता है। उसकी गैंग में सबसे कम उम्र का लड़का 'परपेंडिकुलर' है जो 'ब्लेड रनर' है। वह दो-धारी ब्लेड चलाने में माहिर है। उसके असिस्टेंट का नाम 'टैनजेंट' है। फैजल के पिता सरदार को अपने सौतेले भाई से बहुत प्यार है, जो पागल है। उसका नाम 'डेफिनिट' है। साथ मिल ये सारे पूरे शहर में हंगामा करते हैं। फैजल के नाम से ही लोग कांपते हैं। फिल्म में भरपूर खून-खराबा है। हालांकि, फैजल रामधीर से पैच-अप करना चाहता है, पर हम समझ जाते हैं कि यह टेम्पररी ही है।


फैजल खान (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) को अकेले ही लड़ाइयां लड़ना पसंद है। नवाजुद्दीन अपने किरदार को जीवंत कर गए हैं। उनकी सबसे बड़ी खूबी है आम आदमी के लुक्स और कमाल की बॉडी लैंग्वेज। उनके सामने इस साल सिल्वर स्क्रीन पर आए सभी एक्टर्स नकलची बंदर से कम नहीं लगते। मुकेश छाबड़ा भी अपनी दमदार एक्टिंग की बदौलत तालियां बटोर ले गए हैं। फिल्म के एक-एक किरदार का चयन काफी होशियारी से किया गया है। यहां तक कि बड़े दांतों वाला वह थानेदार भी जीशान कादरी द्वारा लिखी इस कहानी में अपनी उपयोगिता साबित कर जाता है। पिछले कुछ सालों में एक प्रोड्यूसर-डायरेक्टर के रूप में अनुराग कश्यप जिस तरह के एक्टर्स को पर्दे पर लाए हैं, उससे वे देश के टॉप फिल्म-मेकर्स की लिस्ट में शामिल हो गए हैं। अगर ऐसा कहें कि वे खुद ही एक जीता-जागता फिल्म स्कूल हैं तो कुछ गलत नहीं होगा। एक दशक पहले तक राम गोपाल वर्मा ने कुछ ऐसी ही पहचान बनाई थी। यह निस्संदेह अनुराग की बेस्ट फिल्म है।


धनबाद जिले का वासेपुर अब गांव नहीं रहा। साल 2000 में बिहार के विभाजन के बाद वह अब झारखंड का हिस्सा बन चुका है और धनबाद का नजदीकी टाउन है। फैजल अब शादीशुदा है। वह अपनी पत्नी को बहुत चाहता है। वह भी उससे प्यार करती है। दोनों 'फ्रस्टियाओ नहीं मोरा, नरवसाओ नहीं मोरा' गाने को सुनना पसंद करते हैं। गाने पर उस क्षेत्र की भाषा का प्रभाव साफ दिखता है। डायरेक्टर ने डिटेलिंग पर बहुत ध्यान दिया है, चाहे किसी के मर्डर का सीन हो या बूथ कैप्चरिंग का। अगर इससे ज्यादा डिटेलिंग होती तो शायद हम उस जगह की खुशबू भी महसूस कर पाते। इस जगह से ताल्लुक रखने वालों को पर्दे पर इसका वास्तविक फिल्मांकन देख खुशी होगी, वहीं नए लोग इसे पूरी तरह इंज्वॉय करेंगे।


520 मिनट के मिनी सीरीज फॉर्मेट में बनी इस फिल्म में डायरेक्टर ने खूब क्रिएटिविटी दिखाई है। सनसनीखेज मर्डर्स और बेहतरीन डायलॉग्स के साथ अनुराग की फिल्म छा गई है। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर-2' अपने पहले पार्ट से ज्यादा इंटरेस्टिंग है। वह इसलिए क्योंकि पहले पार्ट की शुरुआत का अंत इस भाग में होता है। फिल्म अपने मकसद में कामयाब है। दर्शकों को कहानी समझने के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ती। थिएटर से निकलते हुए आप तरोताजा महसूस करेंगे, पर यह आपके विचारों को भी झकझोर देगी। फिल्म बिजली की तरह आपके दिलोदिमाग पर छा जाती है। बेशक, डायरेक्टर का यही मकसद था।

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