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'फरारी की सवारी': लंबी है पर लुभावनी है

Mayank Shekhar,Film Critic | Jun 15, 2012, 20:52PM IST
Genre: ड्रामा
Director: राजेश मापुस्कर
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Plot: फिल्म रिव्यू: पढ़िए दैनिकभास्करडॉटकॉम से जुड़े जाने-माने फिल्म समीक्षक मयंक शेखर द्वारा लिखा गया रिव्यू।

जब बेहरम देबू महज़  14 साल की उम्र में मैदान में उतरा, तब वह बंबई की ओर से रणजी ट्रॉफी खेलने वाला सबसे युवा खिलाड़ी था। उसने जिस अंदाज में शुरुआत की, उसे देखकर लगा था कि इतिहास की किताबों में उसका स्थान सुरक्षित होना तय है। लेकिन चीज़ें उम्मीद के मुताबिक़ नहीं हुईं।
 
 क्रिकेट क्लब में बेहरम का सबसे जिगरी दोस्त दिलीप ही उसका जानी दुश्मन साबित हुआ और उसने न केवल भारतीय टीम में शामिल होने के उसके अवसरों पर पलीता लगा दिया, बल्कि उसे जीवनभर का ज़ख्म भी दे दिया। 38 सालों तक बेहरम अपने भूतपूर्व दोस्त के लिए मन में बैर पाले रहा। दिलीप अब क्रिकेट बोर्ड का शीर्ष अधिकारी है, जबकि बेहरम महज एक आम अधेड़।
 
आखिरकार दोनों की मुलाक़ात होती है। दोनों के बीच कोई जानदार डायलॉगबाजी तो नहीं होती, लेकिन केवल वह दृश्य ही यह बता देता है कि भारत के दो बेहतरीन अभिनेता बोमन ईरानी (बेहरम) और परेश रावल (दिलीप) यदि एक ही फ्रेम में हों तो वे क्या गजब ढा सकते हैं। उनकी अदाकारी आपके रोंगटे खड़े कर सकती है।
बेहरम की बीती हुई जिंदगी इस फिल्म की मुख्य कहानी की पृष्ठभूमि है। जैसा कि सभी चतुर पटकथाओं के साथ होता है, इस फिल्म में भी बेहरम की बीती हुई जिंदगी देरी से परदे पर आती है और उसे बहुत जल्द चलता भी कर दिया जाता है। आप यह फिल्म मुख्यत: उसकी कहानी के लिए देखते हैं। बेहरम अपनी आत्मीयतापूर्ण पारसी कॉलोनी के लैट में अपने बेटे रूसी और पोते कायो (रित्विक सोहोरे ने बाल कलाकार होने के बावजूद इस भूमिका में अद्भुत सहजता के साथ अभिनय किया है) के साथ रहता है।
 
नन्हा कायो जूनियर लेवल क्रिकेट क्लब का कप्तान है। उसे देखकर पता चल जाता है कि आखिर उसके दादाजी उससे नाराज़ क्यों रहते होंगे। ‘यदि आप दादर स्टेशन पर एक पत्थर उछालें तो वह किसी न किसी क्रिकेट कप्तान पर ही जाकर गिरेगा, इसमें कौन-सी बड़ी बात है,’ बेहरम कहता है। शायद यह बात भारत के बहुतेरे रेलवे स्टेशनों के बारे में सच हो। इस देश में क्रिकेट खेलना फिल्मप्रेमी होने की ही तरह है। यहां लगभग सभी क्रिकेटप्रेमी और फिल्मप्रेमी हैं। इसमें वाक़ई कौन-सी बड़ी बात है! लेकिन वास्तव में नन्हे कायो में विलक्षण प्रतिभा  नज़र आती है।
 
उसके पिता की नज़रों से उसकी प्रतिभा छुप नहीं पाती और वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनका बेटा अपने सपनों को पूरा कर सके। क्रिकेट का मक्का कहलाने वाले लॉर्डस मैदान पर प्रशिक्षण पाने का अनूठा अवसर शायद इस नन्हे चैम्पियन के लिए मददगार साबित हो। लेकिन देबू परिवार मध्यवर्गीय है। कायो के पिता मुंबई के परिवहन विभाग में सरकारी बाबू हैं और लंदन यात्रा के लिए ज़रूरी डेढ़ लाख रुपए तो दूर, वे अपने बेटे के लिए एक अच्छा क्रिकेट बैट और स्पोर्ट्स शूज़ भी मुश्किल से ही ख़रीद सकते हैं। लेकिन इसके बावजूद उनके इरादे अडिग हैं।
 
कायो के पिता की भूमिका शरमन जोशी ने निभाई है। शायद उन्हें पहली बार किसी फिल्म में एकल मुय भूमिका निभाने का अवसर मिला है। राजकुमार हीरानी ने उन्हें ‘स्टाइल’ (2001) नामक एक अल्पज्ञात फिल्म में देखा था और उनकी पारखी नज़रों ने शरमन की प्रतिभा को पहचान लिया। इस भूमिका के लिए आमिर ख़ान पहली पसंद थे। फिल्म के संवाद हीरानी ने लिखे हैं।
 
 आप समझ सकते हैं कि हीरानी और आमिर ने इस फिल्म में एक साथ काम क्यों नहीं किया। यह ‘3 इडियट्स’ के आसपास भी नहीं है। हां, हीरानी की सभी फिल्मों (मुन्नाभाई एमबीबीएस, लगे रहो मुन्नाभाई) की तरह यह फिल्म भी इंसान के भीतर पैठी स्वाभाविक भलाई की तलाश करती है। यह मीठी भावनात्मक फिल्म हमारी आत्मा के लिए निर्मल आनंद की तरह है। हम इस तरह की फिल्मों से प्यार करते हैं, क्योंकि वे हममें उम्मीदें जगाती हैं। ऐसा होना भी चाहिए।
 
आखिरकार कायो के पिता के सामने एक ऐसा अवसर आता है कि वे रातोंरात डेढ़ लाख रुपए कमा सकते हैं। इसके लिए उन्हें किसी भी तरह एक स्थानीय नेता के बेटे की शादी में चंद घंटों के लिए एक फ़रारी कार पहुंचानी होगी। हम जानते हैं कि मुंबई में फ़रारी किसके पास है : निश्चित ही, सचिन तेंडुलकर। वर्ष 2002 में फ़रारी कंपनी ने सचिन को यह कार भेंट की थी।
 
हमें यह इसलिए पता है, क्योंकि उन्होंने कार को भारत लाने के लिए कस्टम ड्यूटी माफ़ करवाई थी। यह सचिन के सार्वजनिक जीवन से जुड़े चुनिंदा विवादों में से एक है। ‘फ़रारी की सवारी’ जैसी फिल्म के लिए सबसे मुश्किल चुनौती यही है कि वह हमें यह विश्वास दिला सके कि रूसी जैसा एक आम आदमी सचिन के सुरक्षित बांद्रा अपार्टमेंट तक पहुंच सकता है, चाबी चुरा सकता है और उनकी फ़रारी ले उड़ता है।
 
रूसी वास्तव में ऐसा ही करता है, लेकिन जब वह ऐसा करता है तो यह वास्तविक जान पड़ता है। एक अच्छी पटकथा की यही ताक़त होती है। हम कभी अंतरिक्ष में नहीं गए हैं, लेकिन हमें पता है कि वहां कैसा महसूस होता है।
 
लेकिन अफ़सोस की बात है कि सबसे मुश्किल चुनौती पार कर लेने के बावजूद फिल्मकार उसके बाद कहानी का एक संभावित विकासक्रम खोजने की जटिल समस्या का हल नहीं खोज पाते। या शायद समस्या यह हो कि फिल्म में बहुत अधिक कहानी हो।
 
फिल्म इसलिए लंबी महसूस होती है, क्योंकि वह एक सरल-सी कहानी सुनाने में ज़रूरत से ज़्यादा समय लेती है और हमें हंसाने और रुलाने की कोशिश भी करती है। हां, यह सच है कि फिल्म देखते समय जब-तब हम पाते हैं कि हमारा गला रुंध गया है या हमारे होंठों पर मुस्कराहट खिल गई है, लेकिन एक समय के बाद फिल्म बोझिल मालूम होने लगती है। शायद बच्चे इस फिल्म को अधिक पसंद करें। मैंने थिएटर में अनेक बच्चों को हंसते-खिलखिलाते देखा। यह अप्रत्याशित नहीं था।
 
यह फिल्म भारत के अग्रणी आइकॉन सचिन को समर्पित है, जिन्होंने लाखों लोगों को बड़े सपने देखने और विनम्र बने रहने के लिए प्रेरित किया है। रूसी और कायो की यह अद्भुत कहानी वास्तव में अजित तेंडुलकर और अनेक प्रेरक मां-बाप, निस्वार्थ भाई-बहनों और उदार दोस्तों के बारे में है, जो ख़ुद गुमनामी की छाया में रहकर एक नायक को रचते हैं। यही बात दिल को छू जाती है। जैसा कि यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का लोकप्रिय विज्ञापन कहता है : ‘आपके सपने केवल आपके ही नहीं होते।’
(मयंक शेखर जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं, वे www.dainikbhaskar.com से जुड़े हैं)

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