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कौन-सा यूथ, कहां का यूथ?

Mayank Shekhar | Oct 19, 2012, 20:46PM IST
Genre:
Director: करन जौहर
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Plot: पढ़िए दैनिक भास्करडॉटकॉम से जुड़े फिल्म क्रिटिक मयंक शेखर द्वारा रिव्यु।

आप इस फिल्म को “स्टूडेंट ऑफ द ईयर” कहना चाहें, या “सिरदर्द ऑफ द ईयर”, यह पूरी तरह से इस पर निर्भर करता है कि आपका नजरिया क्या है, या शायद इस पर कि आपकी उम्र क्या है। निर्देशक ने यह फिल्म पूरी तरह से एक टारगेट ऑडियंस को ध्यान में रखकर बनाई है, जो देश का युवा है। चूंकि आज बॉलीवुड के अनेक सुपर सितारों को पूरी तरह युवा नहीं कहा जा सकता (यहां तक कि हमारे सुपर सितारों में से सबसे युवा भी 30 की उम्र पार कर चुके हैं), लिहाजा यह फिल्म नए चेहरों को लेकर बनाई गई है। ऐसा करना मजबूरी भी थी।
 
 
इस फिल्म का नैरेशन अब्बास टायरवाला की 'जाने तू या जाने ना' से प्रेरित है। इसकी कहानी अनेक युवाओं द्वारा सुनाई गई है, जो अपनी उम्र की दूसरी दहाई में हैं और कैमरे की ओर सीधे देखते हुए दस साल पहले के अपने हाईस्कूल के अनुभव सुनाते हैं। हमने इस फिल्म के पोस्टर्स देखे हैं, जिनमें एक लड़की और दो लड़के दिखाए गए हैं। हम समझ जाते हैं कि यह एक रोमांस फिल्म है। चूंकि इस फिल्म का शीर्षक 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' है, लिहाजा यह भी जाहिर है कि इन तीनों में से कोई एक ही इस खिताब का हकदार होगा। लेकिन मुझे यहां पर आपको यह भी बता देना चाहिए कि इस शीर्षक का क्या मतलब है।
 
स्टू्डेंट ऑफ द ईयर का मतलब है बॉलीवुड डांसिंग, साइकलिंग, स्विमिंग और रनिंग का एक कॉम्पीटिशन। यदि आप इन चीजों में अच्छे हैं तो निश्चित ही आपको डांस इंडिया डांस या नेशनल गेम्स में जगह मिल सकती है। लेकिन फिल्म में इस कॉम्पीटिशन के विजेता को एक टॉप लेवल (आईवी लीग) अमेरिकन यूनिवर्सिटी की फुली पेड स्कॉलरशिप मिलती है। स्क्रीन पर गाना चलता है 'रट्टा मार'। हम देखते हैं कि स्टूडेंट्स जिम में एक्सरसाइज करते हुए हलकान हुए जा रहे हैं। क्यों ? ताकि वे साल के सबसे अच्छे स्टूडेंट बन सकें!
 
बॉलीवुड की परिपाटी को ध्यान में रखने के बावजूद इस फिल्म में दिखाए गए स्कू्ल की किसी से तुलना नहीं की जा सकती। उसका नाम है सेंट थेरेसाज, जिसे सुनकर लगता है कि यह लड़कियों का स्कूल होगा। इस स्कूल का मालिक एक अमीर आदमी (राम कपूर) है, जो खुलेआम टीचर्स को अपमानित करता है और स्टूडेंट्स से कहता है – 'देखो, आज ये लोग कहां हैं। वे आप लोगों को नियम बताने के सिवाय और क्या करते हैं?' हमें टीचर्स के लिए अफसोस होता है। वे अपना मुंह बंद किए खड़े रहते हैं। स्टूडेंट्स तालियां बजाते हैं।
वरुण धवन (निर्देशक डेविड धवन के पुत्र, जो स्क्रीन पर कंफर्टेबल नजर आए हैं) ने स्कूल मालिक के बेटे की भूमिका निभाई है। आलिया भट्ट (बॉलीवुड की एक जैसी नजर आने वाली महारानियों के बीच वे ताजी हवा के झोंके की तरह हैं) ने हाई स्कूल स्वीटहार्ट की भूमिका निभाई है। वे फिल्मकार महेश भट्ट की बेटी हैं। स्कूल के दिनों में वाकई इस बात से फर्क पड़ता है कि आप किसकी औलाद हैं। पैरेंट्स भी अपने बच्चों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे अमीरजादों से दोस्ती गांठें। मम्मियां अपनी बेटियों को पुश-अप ब्रा का उपयोग करने और कॉस्मेटिक सर्जरी करवाने की सलाह देती हैं ताकि सबसे अच्छे लड़के को फंसाया जा सके। जाहिर है, इस फिल्म में बच्चे जिस स्कूल में पढ़ रहे हैं, वह एक महंगा स्कूल है। यहां का स्टूडेंट होना वाकई मजेदार होगा।
 
स्कूल के डीन (ऋषि कपूर) यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी का वास्ता पढ़ाई-लिखाई से न पड़े। वे मौज-मस्ती पसंद शख्स हैं। शायद, उनके सभी स्टूडेंट्स भी ऐसे ही हैं। स्कूल में एक नए, ऊंचे-तगड़े, हैंडसम नॉर्थ इंडियन लड़के (सिद्धार्थ मलहोत्रा) को देखते ही सभी आहें भरने लगते हैं और यह कहते हुए उसके इर्द-गिर्द नाचने लगते हैं कि यह लेटेस्ट 'मुंडा' कितना 'सोणा' है। इस फिल्म में लड़कों ने इतना अंग प्रदर्शन किया है, जितना इस साल रिलीज हुई तमाम फिल्मों में लड़कियों ने भी नहीं किया होगा। बहरहाल, स्कूल में आने वाला नया लड़का अमीर मालिक के बेटे का सबसे अच्छा दोस्त बन जाता है। इन दोनों के बीच में इतनी सेक्शुअल केमिस्ट्री है कि फिल्ममेकर को फिल्म में एक ऐसा दृश्य डालना पड़ा, जिसमें वे दोनों यह साफ करते हैं कि वे गे नहीं हैं। क्यों?क्योंकि वे दोनों एक ही लड़की में इंट्रेस्टेड हैं। यह बॉलीवुड स्टा‍इल है। पूरी तरह से फैशन डिजाइनर फिल्ममेकर करन जौहर के मार्के की फिल्म ।
 
लड़की को इस नए लड़के से प्यार हो जाता है। इंटरवल से ठीक पहले एक खूबसूरत सीक्वेंस में केवल आई कॉन्टैक्ट्स के मार्फत यह जता दिया जाता है। लेकिन यह फिल्म उस खूबसूरत सीक्वेंस की बराबरी नहीं कर पाती। मेरे ख्याल से किसी फिल्म को खुद को हिट ऑफ द ईयर साबित करने के लिए ओल्ड-बॉलीवुड साउंडट्रैक की झलक देने वाले आधा दर्जन गानों और म्यूजिक वीडियो और इतने ही बेतरतीब दृश्यों की दरकार होती है। यह सब बहुत नाटकीय होना चाहिए। यदि कोई फिल्मकार जरा भी बारीकी बरतने की कोशिश करता है तो उस फिल्म के पैसे कमाने की संभावनाएं घट जाती हैं। यह असुरक्षा की भावना हमारी फिल्मों में अमूमन दिखाई देती है।
 
जरा याद करें, करन जौहर की ही फिल्‍म 'कभी खुशी कभी गम' में करीना कपूर का इंट्रोडक्‍शन सीन (द 'पू' सॉन्‍ग!)। इस फिल्‍म में पूरे समय कुछ ऐसा ही नजारा रहता है। यह हाईली ट्रेंडी शहरी युवाओं की फिल्‍म है। हम उम्‍मीद कर सकते हैं कि इस मार्केटिंग प्रोडक्‍ट की टारगेट ऑडियंस इससे पर्याप्‍त संतुष्‍ट होगी।

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