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चक्रव्‍यूह : मनोरंजन के साथ-साथ सोच और विचार

मयंक शेखर | Oct 24, 2012, 22:27PM IST
Genre: सोशल
Director: प्रकाश झा
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Plot: मूवी रिव्यू : पढ़िए दैनिकभास्कर.कॉम से जुड़े फिल्म क्रिटिक मयंक शेखर द्वारा लिखा गया रिव्यू।

एक सशस्‍त्र माओवादी कैम्‍प में हाजिरी के दौरान लाइन में लगते समय नए रंगरूट कबीर (अभय देओल, अद्भुत अभिनेता, जिन्‍हें कम आंका गया है) को समझ में आ जाता है कि उसके साथियों को 20 के बाद की गिनती भी नहीं आती। 1 से 20 तक गिनने के बाद वे फिर 1 पर लौट आते हैं। वह सोचने लगता है कि यह बेपढ़ फौज माओ, लेनिन और मार्क्‍स के बारे में भला कितना समझ पाती होगी। आखिर किस आधार पर उन्‍होंने बंदूक उठाने और अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देने का फैसला किया है? हम कह सकते हैं कि विकास की ही तरह शिक्षा समस्‍या भी है और समाधान भी। पिस्‍तौल भी हमेशा एक समस्‍या ही सिद्ध होती है।


हम छत्‍तीसगढ़ के जंगलों में हैं, जिसे आजादी के 65 सालों के बाद भी भारत के नक्‍शे पर जगह नहीं मिल पाई है। इन इलाकों का नागरिक राज्‍यसत्‍ता का दुश्‍मन है, जिस कारण सरकार को अपने ही लोगों से लड़ने के लिए फौज बुलानी पड़ी हैं। स्‍थानीय रहवासी, जिनमें बड़ी तादाद आदिवासियों की है, की सहानुभूति सैन्‍य गुरिल्‍ला समूहों के साथ है। इन्‍हीं समूहों में से एक की अगुआई राजन (मनोज बाजपेई, जिन्‍होंने कमाल की महीन परफॉर्मेंस दी है) करता है। कबीर का सबसे अच्‍छा दोस्‍त है आदिल (अर्जुन रामपाल, जिनके अभिनय में अब गजब का निखार आ गया है), जिसे इस इलाके में एसपी बनाकर भेजा जाता है। यहां स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं न के बराबर हैं और पुलिस वाले लगातार दहशत के साये में जीते हैं। उन्‍हें लगता है कि यदि वे नक्‍सलवादियों की गोली से बच गए तो मलेरिया उनकी जान ले लेगा।


कबीर आदिल के अनधिकृत मुखबिर के रूप में माओवादी समूह में शामिल होता है। जाहिर है, वह जोखिम मोल ले रहा है। आप कल्‍पना कर सकते हैं कि यह व्‍यक्ति यहां अपने सबसे अच्‍छे दोस्‍त की जान बचाने के लिए अपनी गर्दन खतरे में फंसा रहा है। लेकिन यह बात हजम नहीं होती कि उसके जैसा एक मामूली आदमी, जो सेलफोन बनाकर रोजी-रोटी कमाता है, पहले तो पुलिस वालों की बंदूक की गोली या थर्ड डिग्री टॉर्चर और फिर जंगल में जाकर नक्‍सलियों से भी अपना कुछ-कुछ ऐसा ही हाल करवाने का जोखिम उठाने को तैयार हो जाता है।


कबीर खुद एक पुलिस वाला हो सकता था। वह ट्रेनिंग अकादमी से आया है। चुस्‍त-दुरुस्‍त है। आदिल की पत्‍नी भी पुलिस में काम करती है (इस भूमिका के लिए ईशा गुप्‍ता का चयन करना कतई समझदारी भरा नहीं कहा जा सकता। दर्शकों को आखिर यही समझ में नहीं आता कि वह पुलिस वाली है या कोई मॉडल)। अपने दोस्‍त की मदद करने की कोशिश में कबीर माओवादियों के सरोकारों का हिमायती हो जाता है और राज्‍यसत्‍ता के खिलाफ खड़ा हो जाता है। आदिल इसे एक धोखा मानता है। यह कहानी सुनकर दर्शकों को राजेश खन्‍ना, अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍म 'नमक हराम' (1973) की याद आ सकती है।


लेकिन वास्‍तव में यह मुख्‍यधारा की एक ऐसी बॉलीवुड फिल्‍म है, जो कई बार अतिशयोक्तियों की शिकार होने के बावजूद नक्‍सल समस्‍या की अच्‍छी-खासी पड़ताल करती है। इस फिल्‍म के दृश्‍य उन घटनाओं से प्रेरित हैं, जो हाल-फिलहाल  सुर्खियों में छाई रही थीं। यहां तक कि इस फिल्‍म में उपयोग किए गए नाम भी अखबारों की सुर्खियों का हिस्‍सा लगते हैं, जैसे नंदीग्राम की याद दिलाने वाला नंदीगढ़, औद्योगिक घराने वेदांता की याद दिलाने वाला महंता, कम्‍युनिस्‍ट इंटेलेक्‍चुअल गोविंद सूर्यवंशी (ओम पुरी), जिसका चरित्र चित्रण शायद कोबाद घांदी से प्रेरित है। फिल्‍म के निर्देशक प्रकाश झा हैं। इससे पहले गंगाजल, अपहरण, राजनीति, आरक्षण जैसी फिल्‍में निर्देशित कर चुके प्रकाश झा बेशक भारत के लोकप्रिय फिल्‍मकारों में राजनीतिक रूप से सबसे ज्‍यादा सचेत हैं।


हर उद्योग की ही तरह बॉलीवुड भी दक्षिणपंथी रुझान रखता है। झा की फिल्‍म संतुलित तो है, लेकिन उसका विचारधारागत झुकाव वामपंथ की ओर लगता है। हालांकि, आरक्षण की तुलना में यह कम नाटकीय और अधिक चुस्‍त फिल्‍म है। एक तरफ जहां यह माओवादी रैंक्‍स में मौजूद बलप्रयोग की प्रवृत्ति और महत्‍वाकांक्षाओं की पड़ताल करती है, वहीं दूसरी तरफ वह उन राजनेताओं और उद्योगपतियों में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार और भाई-भतीजावाद का भी भंडाफोड़ करती है, जो भारतीय राज्‍यसत्‍ता के प्रतिनिधि की हैसियत से जनता के सामने आते हैं।


जाहिर है, यहां खनिज पदार्थों से भरपूर जमीन दांव पर लगी है। हालांकि फिल्‍म में नायक-खलनायक के बीच स्‍पष्‍ट विभाजन नहीं है। दर्शक के रूप में हम कबीर को नायक की तरह नहीं देखते। हम इस बात को समझते हैं कि हिंसा की वारदातों पर लगाम लगाने के लिए राज्‍य का एकाधिकार जरूरी है और यह जरूरी नहीं कि उस पर लगाम लगाने के लिए नॉन-स्‍टेट एक्‍टर्स ही आगे आएं। आदिल भी फिल्‍म का नायक नहीं है। निश्चित ही इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि कुछ लोगों का सालों से शोषण किया जा रहा है और उनकी ओर हमारा ध्‍यान केवल तभी जाता है, जब वे हथियार उठा लेते हैं। इस मायने में फिल्‍म के दोनों ही प्रमुख किरदार अपनी-अपनी जगह सही हैं। लेकिन समस्‍या हमेशा की तरह जटिल बनी रहती है।


यह बौद्धिक ईमानदारी ही इस फिल्‍म की सबसे अच्‍छी बात है। फिल्‍मकार यह सुनिश्चित करता है कि दर्शक एक मसाला, एक्‍शन थ्रिलर फिल्‍म से बंधे रहें, लेकिन मनोरंजन के साथ ही वह हमारे सामने एक सूचनात्‍मक और विचारोत्‍तेजक फिल्‍म भी रखता है। इस तरह की फिल्‍में ही हमारे वक्‍त का एक दस्‍तावेज तैयार करती हैं और इसीलिए यह जरूरी है कि उन्‍हें देखने वाले दर्शक महज ओपनिंग वीकेंड में ही न उमड़ें।

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